शिंदे की बढ़ी ताकत, बदले महाराष्ट्र के समीकरण, लोकसभा में 13 सांसदों के साथ बढ़ेगा कद!
2029 की तैयारी में भाजपा-शिवसेना के नए समीकरण उभरे
हरि गोविंद
- उद्धव खेमे के छह सांसदों की बगावत से नई सियासी तस्वीर
- मंत्रिमंडल विस्तार और सीट बंटवारे में बढ़ेगी सौदेबाजी
नई दिल्ली/मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल आया है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे खेमे में जाने की तैयारी ने न केवल राज्य की राजनीति का गणित बदल दिया है, बल्कि इसका असर राष्ट्रीय राजनीति और केंद्र की सत्ता के समीकरणों पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। इस घटनाक्रम के बाद लोकसभा में शिंदे गुट की ताकत बढ़कर 13 सांसदों तक पहुंचने वाली है, जिससे वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली भूमिका में आ जाएगा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह केवल दल-बदल की घटना नहीं, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी का शुरूआती संकेत है। छह सांसदों के आने के बाद शिंदे की शिवसेना महाराष्ट्र में कांग्रेस के बराबर लोकसभा प्रतिनिधित्व हासिल कर लेगी। वहीं भाजपा, जो राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानी जाती है, लोकसभा सीटों के लिहाज से सहयोगी दलों के बीच नई चुनौतियों का सामना कर सकती है।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर केंद्र की राजनीति में दिखाई देने की संभावना है। वर्तमान में शिंदे गुट को केंद्र सरकार में सीमित प्रतिनिधित्व मिला हुआ है, लेकिन सांसदों की संख्या बढ़ने के बाद वह मंत्रिपरिषद में अधिक हिस्सेदारी की मांग कर सकता है। एनडीए के अन्य सहयोगी दलों को मिले प्रतिनिधित्व का उदाहरण सामने रखकर शिंदे खेमा कैबिनेट स्तर तक अपनी दावेदारी मजबूत कर सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद के आगामी सत्रों में केंद्र सरकार जिन महत्वपूर्ण विधेयकों और संवैधानिक संशोधनों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है, उनके लिए मजबूत संख्याबल की आवश्यकता होगी। ऐसे में सहयोगी दलों की भूमिका और महत्व दोनों बढ़ जाते हैं। यही वजह है कि महाराष्ट्र में हुए इस घटनाक्रम को केवल क्षेत्रीय राजनीति के नजरिए से नहीं देखा जा रहा।
उधर महाराष्ट्र में भी इसका व्यापक असर पड़ सकता है। स्थानीय निकायों से लेकर विधानसभा चुनावों तक शिंदे खेमा अपने संगठन का विस्तार करने में जुटा है। पार्टी नेतृत्व ग्रामीण क्षेत्रों में पकड़ मजबूत करने के साथ-साथ मुंबई महानगर क्षेत्र में भी प्रभाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में शिवसेना के भीतर नेतृत्व और राजनीतिक विरासत को लेकर भी नई बहस तेज हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि 2029 के चुनावों में सीटों के बंटवारे को लेकर भाजपा और शिंदे गुट के बीच नई बातचीत की जमीन तैयार हो रही है। जिन सांसदों के शिंदे खेमे में आने की चर्चा है, वे भविष्य में अपनी-अपनी सीटों पर दावेदारी भी बनाए रखना चाहेंगे। ऐसे में महायुति के भीतर सीटों का संतुलन साधना आसान नहीं होगा।
कुल मिलाकर, उद्धव खेमे में हुई इस बड़ी टूट ने महाराष्ट्र की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। इससे एकनाथ शिंदे का राजनीतिक कद बढ़ा है, जबकि भाजपा और अन्य सहयोगी दलों को भी भविष्य की रणनीति नए सिरे से तय करनी होगी। आने वाले महीनों में यह घटनाक्रम राज्य ही नहीं, राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण कारक साबित हो सकता है।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
