आरक्षण विवाद से बदलेगा 2029 का सियासी गणित,महिला आरक्षण बना चुनावी मुद्दा

संविधान संशोधन फेल, परिसीमन और सीट संतुलन पर टकराव तेज

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विवेक श्रीवास्तव

  • कांग्रेस-सपा का दबाव: ओबीसी कोटा और तुरंत क्रियान्वयन की मांग
  • दक्षिण बनाम उत्तर: सीट हिस्सेदारी पर नई बहस शुरू
  • सहमति न बनी तो 543 सीटों पर ही होगा चुनाव

लखनऊ। महिला आरक्षण को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है और इसका सीधा असर 2029 के लोकसभा चुनाव के सियासी गणित पर पड़ता दिख रहा है। एक तरफ 2023 में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में कानून बन चुका है और 2026 में उसे अधिसूचित भी कर दिया गया, वहीं दूसरी तरफ इसे लागू करने की पूरी प्रक्रिया ताजा राजनीतिक टकराव में उलझती नजर आ रही है।

सरकार ने हालिया विशेष सत्र में संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा सीटों के विस्तार और परिसीमन का रास्ता साफ करने की कोशिश की थी, ताकि महिला आरक्षण को जमीन पर उतारा जा सके। लेकिन लोकसभा में यह बिल जरूरी बहुमत नहीं जुटा सका और गिर गया। इसके साथ ही वह पूरा ढांचा, जिसके जरिए आरक्षण लागू होना था, फिलहाल रुक गया है।

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असल में 2023 का कानून अपने आप में अधूरा नहीं है, लेकिन उसकी क्रियान्वयन शर्तें उसे जटिल बना देती हैं। इस अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान है कि नई जनगणना और उसके बाद परिसीमन के जरिए सीटों का पुनर्निर्धारण होगा, तभी महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाएगा। 2026 में जारी नोटिफिकेशन ने कानून को औपचारिक रूप से प्रभावी जरूर बना दिया, लेकिन यह अंतिम क्रियान्वयन नहीं था। अब ताजा घटनाक्रम के बाद यह साफ है कि बिना नए परिसीमन के आरक्षण केवल कागजों तक सीमित रहेगा।

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यही वजह है कि यह मुद्दा अब सामाजिक न्याय से आगे बढ़कर राजनीतिक शक्ति संतुलन का केंद्र बन गया है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे दलों ने सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने आरक्षण को परिसीमन से जोड़कर इसे टालने की रणनीति अपनाई है। उनकी मांग है कि महिलाओं के भीतर ओबीसी कोटा सुनिश्चित किया जाए और आरक्षण को बिना देरी लागू किया जाए। यह मांग आगे भी सियासी दबाव बनाए रखेगी।

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दूसरी ओर, दक्षिण भारत के क्षेत्रीय दलों का विरोध इस पूरे विवाद को और जटिल बना रहा है। उनका मानना है कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से उत्तर भारत के राज्यों को ज्यादा सीटें मिलेंगी और दक्षिण की राजनीतिक हिस्सेदारी घट जाएगी। डीएमके सहित कई दल इसे संघीय ढांचे के लिए खतरा मानते हैं। यही कारण है कि अब महिला आरक्षण का मुद्दा ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ के राजनीतिक विमर्श से भी जुड़ गया है।
सत्ता पक्ष के भीतर भी अब रणनीतिक बदलाव के संकेत हैं। सरकार समझ रही है कि संविधान संशोधन के लिए जरूरी विशेष बहुमत बिना व्यापक सहमति के संभव नहीं है। ऐसे में आने वाले सत्रों में संशोधित बिल लाकर विपक्ष की आपत्तियों को समायोजित करने की कोशिश हो सकती है। हालांकि, संयुक्त सत्र का विकल्प न होने और जटिल संवैधानिक प्रक्रिया के कारण यह राह आसान नहीं है।

अगर अगले कुछ वर्षों में जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती है, तो 2029 का लोकसभा चुनाव मौजूदा 543 सीटों पर ही होने की संभावना है। इसका सीधा मतलब होगा कि महिला आरक्षण का लागू होना फिर टल जाएगा और यह मुद्दा एक बार फिर चुनावी वादों तक सीमित रह सकता है।

लेकिन अगर राजनीतिक सहमति बनती है और परिसीमन का रास्ता साफ होता है, तो यह केवल सीटों की संख्या ही नहीं बदलेगा, बल्कि संसद में महिलाओं की भागीदारी और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को भी नए सिरे से परिभाषित करेगा।

कुल मिलाकर, महिला आरक्षण अब केवल एक कानून का सवाल नहीं रह गया है। यह 2029 के चुनावी समीकरण, क्षेत्रीय राजनीति और सामाजिक प्रतिनिधित्व की दिशा तय करने वाला केंद्रीय मुद्दा बन चुका है। जहां हर दल अपनी रणनीति और आधार को ध्यान में रखते हुए अगली चाल चलने की तैयारी में है।

लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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