अंधाधुंध विकास: ऊपर ग्रीन कारिडोर, नीचे रिवर फ्रंट, गर्त में गोमती!
हाल ही में राजनाथ व योगी ने कारिडोर का शुभारंभ किया, नीचे गोमती पर नजर नहीं पड़ी
रवि गुप्ता
- हनुमात सेतु के नीचे बह रही गोमती में पानी कम, मिट्टी-गारद व जलकुम्भी ज्यादा
- ग्रीन कारिडोर ब्रिज से देखने पर दूर-दूर तक गोमा में नहीं दिखता प्रवाहमान जल
- पर्यावरणविदों का मत, नदी के किनारों का हुआ अतिक्रमण, प्राकृतिक जल स्रोत बंद
लखनऊ। अभी कुछ ही दिन बीता होगा कि जब लखनऊ के सांसद व केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सीएम योगी की मौजूदगी में सूबे की राजधानी के हृदयस्थली यानी हजरतगंज से मात्र चंद मीटर दूर उसके समानांतर बह रही गोमती नदी के ऊपर बहु प्रतीक्षित ग्रीन कारिडोर का भव्य शुभारम्भ किया।
इस दौरान सत्ताधारी दल के दोनों राज नेताओं ने लखनऊ की जनता को सम्बोधित करते हुए यही कहा कि यह केवल आवागमन के लिये एक कारिडोर नहीं बल्कि शहर के बीचोंबीच विकास का ऐसा ब्रिज है जिसके विकास का रास्ता दूर तक जायेगा और इससे आसपास के जनपद भी सीधे राजधानी मुख्यालय के शहरी रोड नेटवर्क से जुड़ जायेंगे और जिसका सीधा लाभ हर खासोआम जन को मिलेगा।
मगर इनमें से एक रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ और मौजूदा मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की नज़रें उक्त ग्रीन कारिडोर शुभारम्भ समारोह के दौरान संंभवत: हनुमान सेतु के नीचे दशकों से बह रही और लखनऊ की जीवन रेखा मानी जाने वाली गोमती नदी पर नहीं पड़ी होगी, कि आज इस सरिता का स्वरूप क्या हो गया। आज की तारीख में यदि उसकी ग्रीन कारिडोर पुल से गुजर रहा कोई भी व्यक्ति, राहगीर या वाहन चालक निकलेगा और कहीं यकायक थोड़ा ठहराव लेते हुए वो नीचे देखने लगा तो उसे वहां नदी का जल कम, बल्कि मिट्टी, गारद, जलकुम्भी व नदी किनारे खर पतवार इत्यादि कहीं ज्यादा दिखेंगे।
शहर वासियों को तो सपने दिखाये जा रहे आने वाले दिनों में इसी नदी में जल परिवहन और नौका पर्यटन (वाटर ट्रांसपोर्ट टूरिज्म) को बढ़ावा दिया जायेगा ताकि लोगों के लिये एक अतिरिक्त मनोरंजन का साधन बन सके। जबकि वहीं दूसरी तरफ पर्यावरणविदों का मत है कि जिस तरीके से शहर के बीचोंबीच बहने वाली गोमती नदी के किनारों पर अलग-अलग तरीकों से अतिक्रमण होता जा रहा और उसी हिसाब से नदी के आसपास जो कंक्रीट के जमीन बनाये जा रहे, ऐसे में नदी से लिंक जमीन के अंदर जो अंदरुनी प्राकृतिक जल स्रोत हैं अब वो भी धीरे धीरेकरके बंद होते जा रहें।
ये खबर भी पढ़े : बुंदेलखंड के महोबा राजकीय वीरभूमि महाविद्यालय में 30 पद स्वीकृत, नए विषयों की होगी पढ़ाईनतीजतन, नदी में आवश्यकतानुसार जितना जल का प्राकृतिक प्रवाह होना चाहिये वो नहीं हो पा रहा और ऊपर से अलग-अलग चैनलों से नदी में सीधे गिर रहे गंदे नाले का पानी गोमती की दशा और दिशा को और अधिक बिगाड़ने का काम कर दे रहा।
गोमती रिवरफ्रंट का गुजराती माडल अधूरा पड़ा...!
बता दें कि साल 2012 में तत्कालीन अखिलेश सरकार का ने गोमती नदी के सौंदर्यीकरण को प्राथमिकता देते अपने पहले रिवर फ्रंट ड्रीम प्रोजेक्ट को लॉन्च किया और इसको डेवलप करने की जिम्मेदारी मुख्यत: दो सरकारी विभागों को दी जिनमें लखनऊ विकास प्राधिकरण और उस दौरान सिंचाई विभाग (जल शक्ति मंत्रालय) को दी थी।
एलडीए टीम ने गुजरात के अहमदाबाद में साबरमती रिवरफ्रंट के समान एक रिवरफ्रंट बनाने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के साथ एक विशेष अध्ययन भी शुरू किया था और उसी तर्ज पर लखनऊ के गोमती रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट को पूरा करने का बीड़ा उठाया।
अच्छा खास बजट भी इस प्रोजेक्ट के संचालन को प्रदेश सरकार द्वारा दिया गया, मगर सूबे में हुक्मरान बदलते ही, काम करने के तौर तरीके भी बदल गये और राजधानी लखनऊ के जीवन दायिनी से जुड़ी यह विकास परियोजना की रफ्तार भी धीमी पड़ती गयी, बाकी इसके अगल-बगल या फिर ऊपर-नीचे मौजूदा सरकार के प्राथमिकता में जो विकास परियोजनायें रहीं, उन्हें पूरा होने में तनिक भी देरी नहीं लगी।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
