जीएसटी राशि जमा करने में देरी के मामले में हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

--बीएनएस के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही निरस्त

Published By Shishir Patel
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प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह व्यवस्था दी है कि यदि किसी मामले में आरोप केवल जीएसटी अथवा टीडीएस कटौती के बाद उसकी समय से जमा न करने तक सीमित हो और उसमें गबन, धोखाधड़ी, जालसाजी या सरकारी धन के दुरुपयोग जैसे आरोप न हों, तो ऐसे मामले में भारतीय न्याय संहिता की सामान्य दंडात्मक धाराओं के अंतर्गत आपराधिक मुकदमा चलाना विधिसम्मत नहीं होगा। न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों के लिए जीएसटी एक्ट, 2017 स्वयं एक पूर्ण और विशेष कानून है, जिसमें दंड, ब्याज, अभियोजन एवं अन्य वैधानिक कार्यवाही की संपूर्ण व्यवस्था उपलब्ध है।

यह महत्वपूर्ण आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव द्वारा धारा 528 बीएनएसएस के अंतर्गत दाखिल आवेदन संख्या 18970/2026 में पारित किया गया, जिसमें आवेदक तनवीर अशरफ ने अपने विरुद्ध दाखिल चार्जशीट, संज्ञान आदेश तथा सम्पूर्ण आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी।

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मामले के अनुसार आवेदक उस समय ग्राम पंचायत सचिव के पद पर कार्यरत थे। ग्राम सभा के विकास कार्यों के भुगतान के दौरान काटी गई जीएसटी/ टीडीएस राशि को समय से सरकारी खाते में जमा न करने की शिकायत लोकायुक्त के समक्ष की गई थी। शिकायत पर जांच हुई और जांच रिपोर्ट के आधार पर जिला प्रशासन ने एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए। इसके फलस्वरूप 19 अक्टूबर 2024 को थाना नगर, जनपद बस्ती में मुकदमा अपराध संख्या 215/2024 पंजीकृत किया गया। बाद में विवेचना पूर्ण कर पुलिस ने 1 सितम्बर 2025 को चार्जशीट दाखिल कर दी, जिस पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बस्ती ने 2 अप्रैल 2026 को संज्ञान लेते हुए समन जारी कर दिया।

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आवेदक की ओर से प्रस्तुत तर्कों में कहा गया कि पूरे मामले में विवाद केवल रूपये 8,629 की जीएसटी /टीडीएस राशि के समय से जमा न होने तक सीमित था। यह भी बताया गया कि जैसे ही उक्त त्रुटि की जानकारी हुई, सम्पूर्ण राशि सरकारी खाते में जमा कर दी गई और उसकी रसीदें भी सक्षम अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत कर दी गईं। इसलिए किसी प्रकार की बेईमानी, सरकारी धन हड़पने या व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

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सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने न्यायालय के समक्ष तर्क रखा कि पूरा मामला जीएसटी एक्ट , 2017 के दायरे में आता है, जो कर कटौती, विलंबित जमा, ब्याज, दंड तथा अभियोजन की संपूर्ण व्यवस्था प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि जब एक विशेष अधिनियम किसी विषय को पूरी तरह नियंत्रित करता है, तब सामान्य आपराधिक कानून का सहारा नहीं लिया जा सकता। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कथित घटना वर्ष 2017-18 की है, जबकि भारतीय न्याय संहिता, 2023 बाद में लागू हुई है, इसलिए बाद में लागू दंड कानून को पूर्व प्रभाव से लागू करना संविधान एवं विधि के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है।

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने जीएसटी एक्ट 2017 की विभिन्न धाराओं का विस्तृत परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि अधिनियम की धारा 50 विलंबित भुगतान पर ब्याज, धारा 51 कर कटौती एवं जमा करने की प्रक्रिया, धारा 122 दंड, धारा 126 सामान्य अनुशासन तथा धारा 138 अपराधों के कम्पाउंडिंग की व्यवस्था प्रदान करती है।

अदालत ने कहा कि जब संसद ने जीएसटी संबंधी विवादों के निस्तारण, दंड और अभियोजन के लिए अलग से एक विस्तृत वैधानिक तंत्र स्थापित कर रखा है, तब सामान्य आपराधिक कानून का सहारा तभी लिया जा सकता है जब आरोपों में स्वतंत्र रूप से गबन, जालसाजी, धोखाधड़ी, कूटरचना अथवा व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करने जैसे अपराधों के आवश्यक तत्व मौजूद हों।

न्यायालय ने एफआईआर और चार्जशीट का अवलोकन करने के बाद पाया कि उनमें कहीं भी सरकारी धन के गबन, निजी उपयोग, फर्जी अभिलेख तैयार करने, कूटरचना करने, धोखाधड़ी अथवा किसी प्रकार के अनुचित लाभ प्राप्त करने का आरोप नहीं लगाया गया है। पूरा मामला केवल कर राशि के विलंबित जमा होने से संबंधित है, जो सीधे-सीधे जीएसटी एक्ट के दायरे में आता है। इसलिए बीएनएस की धारा 316(5) के तहत चलाया गया अभियोजन प्रथम दृष्टया अस्थिर और कानून के विपरीत प्रतीत होता है।

न्यायालय ने मामले के दूसरे महत्वपूर्ण पहलू पर भी विचार किया। अदालत ने पाया कि कथित घटना वित्तीय वर्ष 2017-18 की है, जबकि भारतीय न्याय संहिता, 2023 बाद में लागू हुई। इसके बावजूद एफआईआर, चार्जशीट और संज्ञान सभी बीएनएस की धारा 316(5) के अंतर्गत लिए गए।

न्यायालय ने कहा कि किसी भी अभियोजन की वैधता का परीक्षण उस समय प्रभावी कानून के आधार पर किया जाना चाहिए, जो कथित घटना की तिथि पर लागू था। बाद में लागू हुई दंडात्मक विधि को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2017-18 की कथित घटना के लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 316(5) के अंतर्गत अभियोजन चलाना न केवल स्थापित विधिक सिद्धांतों के विपरीत है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 20(1) द्वारा प्रदत्त संरक्षण का भी उल्लंघन है। अतः ऐसा अभियोजन संवैधानिक एवं विधिक दृष्टि से अस्थिर और अस्वीकार्य है।

उपरोक्त तथ्यों और कानूनी स्थिति पर विचार करने के बाद न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि आवेदक के विरुद्ध चल रही आपराधिक कार्यवाही न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इसे जारी रखना उचित नहीं होगा। इसलिए न्यायालय ने 1 सितम्बर 2025 की चार्जशीट, 2 अप्रैल 2026 के संज्ञान/समन आदेश तथा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बस्ती की अदालत में लंबित समस्त आपराधिक कार्यवाही को आवेदक के संबंध में निरस्त कर दिया।

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पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।

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