अलीगंज कोचिंग अग्निकांड: 15 जिंदगियों का दर्द, एक मां का शोक और एक अफसर की बहादुरी की कहानी
भीषण कोचिंग अग्निकांड ने सिर्फ 15 जिंदगियां नहीं छीनीं, बल्कि कई घरों की हंसी भी
आदित्य की मां कल्पना श्रीवास्तव के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे
लखनऊ । यूपी की राजधानी के अलीगंज में हुआ भीषण कोचिंग अग्निकांड अब सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि कई घरों के टूटने और कई जीवन बदल जाने की कहानी बन चुका है। इस हादसे ने 15 युवाओं की जान ले ली, लेकिन इसके साथ ही कई परिवारों के सपने और भविष्य भी हमेशा के लिए राख में बदल गए।
हादसे के बाद शहर में मातम पसरा हुआ है। हर तरफ चीख-पुकार, आंसू और सवाल हैं—आखिर यह सब टाला जा सकता था या नहीं? इसी बीच दो तस्वीरें इस पूरे घटनाक्रम को सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं—एक एक मां का दर्द और दूसरी इंसानियत की मिसाल।
“मेरा बेटा वापस लौटा दो…” – मां की टूटी हुई दुनिया
हादसे में जान गंवाने वाले छात्र आदित्य की मां कल्पना श्रीवास्तव का दर्द शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। वह अपने बेटे की तस्वीर को सीने से लगाए बैठी हैं और हर आने वाले से बस एक ही सवाल पूछती हैं—“क्या मेरा बेटा वापस आ सकता है?”
ये खबर भी पढ़े : अवैध कोचिंग संस्थानों के खिलाफ पूरे प्रदेश में जारी रहेगा विशेष अभियान : उच्च शिक्षा मंत्रीकल्पना श्रीवास्तव बार-बार उस दिन को याद करती हैं जब आदित्य घर से पढ़ाई के लिए निकला था। उन्हें क्या पता था कि वह आखिरी बार होगा। उनकी आंखों के सामने आज भी वही मंजर घूमता है—इमारत से उठता काला धुआं, मदद के लिए चीखते बच्चे और बाहर खड़े बेबस लोग।
वह गुस्से और दर्द में कहती हैं कि अगर दमकल समय पर पहुंचती, अगर सुरक्षा इंतजाम सही होते, तो आज उनका बेटा जिंदा होता। “मेरा बेटा अगर घायल भी हो जाता, तो मैं उसे जीवनभर संभाल लेती, लेकिन वह मेरे साथ होता,” यह कहते हुए उनकी आवाज भर्रा जाती है।
सरकारी मुआवजे की बात पर उनका दर्द और गहरा हो जाता है। वह कहती हैं—“कोई पैसा मेरे बच्चे की जगह नहीं ले सकता। हमें सिर्फ हमारा बच्चा चाहिए था।”
उनका यह दर्द केवल आदित्य की मां का नहीं, बल्कि उन सभी परिवारों का है, जिन्होंने इस हादसे में अपने बच्चों को खो दिया।
धुएं के बीच फरिश्ता बना अफसर
जहां एक तरफ दर्द और चीखें थीं, वहीं दूसरी तरफ उसी हादसे में इंसानियत की एक मिसाल भी देखने को मिली। राज्यपाल के पर्सनल सिक्योरिटी अफसर समरजीत सिंह उस समय ड्यूटी से लौट रहे थे, जब उन्होंने अलीगंज की कोचिंग बिल्डिंग से उठता धुआं और बच्चों की मदद की पुकार सुनी।
भीड़ मौके पर थी, लेकिन लोग या तो वीडियो बना रहे थे या दूर खड़े थे। लेकिन समरजीत सिंह ने एक पल भी नहीं गंवाया और सीधे बचाव कार्य में जुट गए।
उन्होंने बिना किसी सुरक्षा उपकरण की परवाह किए इमारत के पास जाकर फंसे छात्रों को बाहर निकालने में मदद की। कई बच्चों को गिरने से बचाया, कुछ को दीवार और तारों के सहारे सुरक्षित बाहर लाया गया।
धुएं से भरे अंदरूनी हिस्से में जाकर उन्होंने छह छात्रों को सुरक्षित बाहर निकालने में सफलता हासिल की। बाद में उन्होंने कहा—“उस समय सिर्फ एक ही बात दिमाग में थी कि बच्चों को बचाना है। मैं उन्हें छोड़कर नहीं जा सकता था।”
एक हादसा, दो सच्चाइयाँ
अलीगंज अग्निकांड सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि दो अलग-अलग भावनाओं की कहानी है। एक तरफ मां का वह दर्द है जो अपने बच्चे को खोकर भी न्याय और जवाब मांग रहा है, और दूसरी तरफ वह बहादुरी है जिसने अनजान बच्चों की जान बचाई।
यह हादसा एक बड़ा सवाल भी छोड़ जाता है—अगर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होती, अगर समय पर राहत मिलती, तो क्या इतने घर उजड़ते?जांच जारी है, लेकिन आदित्य की मां का एक वाक्य इस पूरे हादसे की सबसे बड़ी सच्चाई बन गया है—
“मेरा बेटा अपाहिज भी हो जाता, तो भी मैं उसे सीने से लगाकर रखती… बस वह जिंदा होता।”
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पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।
