महेन के बाबा महेंद्रनाथ: जहाँ शिव जड़ हो गए : डॉ. विवेकानंद
देवरिया। क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव, जो स्वयं काल के भी काल हैं, जो सृष्टि के संहारक हैं, वे एक दिन खुद जड़ कैसे हो गए? क्या ऐसा संभव है कि कोई मानवीय भूल स्वयं महादेव को पत्थर में बदल दे? देवरिया जिले के एक सुनसान जंगल में आज भी एक ऐसा शिवलिंग है जो इस असंभव से लगने वाले रहस्य का जीवंत गवाह है। कहा जाता है कि आधी रात के बाद आज भी इसके बंद गर्भगृह से शंख और डमरू की दिव्य ध्वनि सुनाई देती है, और इसके केवल दर्शन मात्र से अकाल मृत्यु का योग भी टल जाता है। यह कोई कल्पना नहीं, यह कहानी है देवरिया-बरहज प्रमुख जिला मार्ग पर भदिला दोयम, महेन गांव, थाना मदनपुर में स्थित बाबा महेंद्रनाथ धाम की, जिसे लोग सिर्फ एक मंदिर नहीं, एक जीवंत चमत्कार कहते हैं। यह धाम पूर्वांचल के उन विरले शिवस्थलों में है जहाँ आज भी भक्तों को यह एहसास होता है कि भगवान यहाँ पत्थर में नहीं, साक्षात विराजमान हैं।
इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य इसके गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग में छिपा है। यह कोई सामान्य शिवलिंग नहीं है। यह भूमि के अंदर से स्वयं प्रकट हुआ स्वयंभू और अद्भुत शिवलिंग है। पुजारियों के अनुसार यह शिवलिंग अर्धनारीश्वर स्वरूप में है। यदि आप इसे ध्यान से देखें तो इसके एक भाग में शिव की जटाओं जैसी प्राकृतिक रेखाएं और दूसरे भाग में माता पार्वती के श्रृंगार जैसी कोमलता दिखाई देती है। भारत में ऐसा शिवलिंग गिने-चुने स्थानों पर ही है। सबसे बड़ा रहस्य यह है कि इस शिवलिंग की ऊंचाई आज भी धीरे-धीरे बढ़ रही है। बुजुर्ग पुजारी बताते हैं कि बीस साल पहले जो जलहरी शिवलिंग को आधी ढकती थी, आज वह और भी नीचे लगती है। दूसरा चमत्कार इस शिवलिंग से जुड़ा है अकाल मृत्यु से मुक्ति का। दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से लोगों को अकाल मृत्यु से मुक्ति मिल जाती है।
स्थानीय लोग बताते हैं कि यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प या अकाल मृत्यु का योग हो, तो यहाँ सच्चे मन से जलाभिषेक करने पर वह दोष कट जाता है। महेन गांव के ही एक परिवार की कथा सुनाई जाती है कि उनका पुत्र गंभीर बीमारी से मृत्यु शय्या पर था, डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। परिवार ने बाबा महेंद्रनाथ का संकल्प लेकर राप्ती तट से जल लाकर लगातार 41 दिन अभिषेक किया और बालक स्वस्थ हो गया। इस धाम की स्थापना की कथा भी किसी रहस्य से कम नहीं है। सैकड़ों वर्ष पूर्व जब यह पूरा क्षेत्र घना जंगल था, जहाँ दिन में भी सियार और जंगली जानवरों की आवाजें गूंजती थीं, उसी जंगल में महेन गांव में ब्राह्मण कुल में लक्ष्मी नारायण दास जी का जन्म हुआ। वे रोज ब्रह्म मुहूर्त में गांव के दक्षिण में बहने वाली राप्ती नदी में स्नान कर उसी पीपल के पेड़ के नीचे तपस्या में लीन हो जाते थे जहाँ आज मंदिर है।
पुजारी कुबेर नाथ भारती जी बताते हैं कि महाकाल भोले शंकर स्वयं अर्धनारीश्वर स्वरूप में प्रकट होकर उन्हें वेदों का गूढ़ ज्ञान देते थे। यह क्रम वर्षों तक चलता रहा। पर एक दिन इस रहस्य पर से परदा उठ गया। उनकी पत्नी को पति का रोज भोर में निकलना और देर शाम लौटना खटकने लगा। एक दिन वह चुपके से साधना स्थली पर पहुंच गईं। उस समय भगवान शिव उपदेश दे रहे थे। पत्नी की आहट से उस दिव्य उपदेश में विघ्न पड़ गया और उसी क्षण भगवान शिव ने कहा - अब कलियुग में ज्ञान को गुप्त ही रहना होगा - और वहीं जड़ हो गए। वही जड़ रूप आज का यह अर्धनारीश्वर शिवलिंग है। लक्ष्मी नारायण दास जी ही आगे चलकर पौहारी महाराज प्रथम के नाम से विख्यात हुए और उन्होंने यहाँ तालाब, गौशाला और यज्ञशाला बनवाई। तीसरा चमत्कार इस स्थान के जल से जुड़ा है। श्रावण मास में कांवरिए सबसे पहले बरहज के सरयू तट से जल भरकर बाबा महेंद्रनाथ का ही जलाभिषेक करते हैं।
मान्यता है कि यदि कोई कांवरिया सीधे किसी और धाम चला जाए तो उसकी यात्रा अधूरी मानी जाती है। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि एक बार कुछ कांवरियों ने महेन को छोड़कर आगे जाने की सोची तो रास्ते में उनकी कांवर इतनी भारी हो गई कि उठाई नहीं गई, जब वे वापस लौटकर महेन में जल चढ़ाकर गए तब कांवर हल्की हो गई। महाशिवरात्रि पर तो यहाँ का नजारा देखते ही बनता है। इस दिन यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है और हजारों श्रद्धालु इस आशा में आते हैं कि उन्हें आधी रात में उस दिव्य शंख और डमरू की ध्वनि का साक्षात्कार हो जाए।
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