अनूपपुर: हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा रद्द कर दो आरोपियों को किया बरी

Published By Mahi Khan
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अनूपपुर। मप्र उच्च न्यायालय की जबलपुर खंडपीठ ने अनूपपुर जिले का एक चर्चित मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए उम्रकैद की सजा काट रहे दो आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।

न्यायालय ने अनूपपुर जिला अदालत के फैसले को निरस्त करते हुए आधार सिंह और पूरन सिंह को सभी आरोपों से बरी करने के आदेश सोमवार का दिया।

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि बृजेश सिंह की मौत एक सुनियोजित हत्या थी।

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अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों से यह भी संभव है कि घटना एक सड़क दुर्घटना रही हो। ऐसे में आरोपियों को संदेह का लाभ दिया जाना न्यायसंगत है।

2013 में हुई थी घटना
मामला वर्ष 2013 का है। जानकारी के अनुसार घटना वाले दिन दो मोटरसाइकिलों पर चार लोग घर लौट रहे थे। पहली बाइक पर आधार सिंह और पूरन सिंह सवार थे, जबकि दूसरी बाइक पर बृजेश सिंह और कैलाश मौजूद थे।

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रास्ते में पान नदी के पास खड़े एक ट्रक से बाइक टकरा गई। हादसे में कैलाश घायल हो गया, जबकि बृजेश सिंह की मौके पर ही मौत हो गई।

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पुलिस ने अंतिम बार साथ देखे जाने के आधार पर आधार सिंह और पूरन सिंह को हिरासत में लेकर हत्या का मामला दर्ज किया था। जांच के बाद दोनों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 201 के तहत चालान पेश किया गया।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद
अनूपपुर जिला अदालत ने 26 जून 2019 को सुनवाई पूरी करते हुए दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया था। अदालत ने हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोप में दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

इसके बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। 11 मई 2026 को जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस ए.के. सिंह की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया।

अदालत ने कहा कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था और कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह मौजूद नहीं था।

मेडिकल रिपोर्ट पर उठा सवाल
बचाव पक्ष के अधिवक्ता अभिषेक पांडेय ने कोर्ट में तर्क दिया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का स्पष्ट कारण दर्ज नहीं था। डॉक्टरों ने भी स्वीकार किया कि मृतक के शरीर पर मिली चोटें सड़क दुर्घटना में लगने वाली चोटों जैसी हो सकती हैं।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने माना कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपियों और मृतक के बीच कोई पुरानी रंजिश थी या जानबूझकर टक्कर मारकर हत्या की गई थी।

हाईकोर्ट ने दिए रिहाई के आदेश
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि घटनास्थल, वाहन जांच और गवाहों के बयान अभियोजन की कहानी को पूरी तरह समर्थन नहीं देते। कई महत्वपूर्ण गवाहों के बयानों में विरोधाभास पाए गए।

अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोष तभी सिद्ध माना जाता है जब आरोप संदेह से परे प्रमाणित हों। पर्याप्त और ठोस साक्ष्य के अभाव में दोनों आरोपियों को बरी किया जाता है। करीब 13 वर्ष तक जेल में रहने के बाद अब आधार सिंह और पूरन सिंह की रिहाई का रास्ता साफ हो गया है।

 

 

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माही खान एक उभरती हुई कंटेंट राइटर हैं और वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ से जुड़कर डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए समाचार अपडेट का कार्य कर रही हैं। वह खबरों की प्रस्तुति पर विशेष ध्यान देती हैं और मीडिया क्षेत्र में सीखते हुए अपने लेखन कौशल को लगातार विकसित कर रही हैं।

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