भारत में असहमति के लिए जगह सिमट रही, शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का मौलिक अधिकार : जस्टिस उज्जल भुइयां
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि गंगा नदी के ऊपर चिकन खाने पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं है। उन्होंने इफ्तार के दौरान नाव पर चिकन बिरयानी खाने के आरोप में युवाओं की गिरफ्तारी का जिक्र करते हुए कहा कि "मुझे पूरा विश्वास है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। यह अपराध हो ही नहीं सकता। फिर भी उन्हें इसी वजह से गिरफ्तार किया गया और तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा।"
राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय (NLIU), भोपाल में आयोजित चौथे जस्टिस जी.पी. सिंह स्मृति व्याख्यान में जस्टिस भुइयां ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और असहमति की अभिव्यक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन आज सामान्य नागरिक गतिविधियों को भी अपराध की तरह देखा जाने लगा है।
उन्होंने कहा, "अपनी बात रखने का अधिकार और शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करने का अधिकार नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रताएं हैं। बहस और असहमति लोकतंत्र का सार हैं। दुर्भाग्य से, आज सामान्य गतिविधियों को भी अपराध बनाया जा रहा है।"
पर्यावरण कार्यकर्ताओं और छात्रों का किया जिक्र
जस्टिस भुइयां ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की मांग करने वाले लोगों के साथ कई बार अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर चिंता जताने वाले लोगों को भी खदेड़ दिया जाता है, मानो वे अपराधी हों।
उन्होंने विश्वविद्यालय परिसरों में विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों की स्थिति पर भी चिंता जताई। उनके अनुसार, कई मामलों में छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें 30 से 40 दिनों तक जमानत नहीं मिलती। इतना ही नहीं, कई छात्रों को निलंबित भी कर दिया जाता है, जिसके बाद उन्हें अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए अदालतों का सहारा लेना पड़ता है।
जमानत की सख्त शर्तों पर उठाए सवाल
जस्टिस भुइयां ने कहा कि अदालतें अंततः जमानत तो दे देती हैं, लेकिन कई बार इसमें अनावश्यक देरी होती है। उन्होंने कहा कि इससे भी अधिक चिंता की बात जमानत के साथ लगाई जाने वाली कठोर शर्तें हैं। उन्होंने सवाल उठाया, "क्या ऐसी प्रतिबंधात्मक जमानत शर्तों के जरिए अदालतें अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों को अपनी असहमति व्यक्त करने से हतोत्साहित कर रही हैं?"
उन्होंने कहा कि कई मामलों में जमानत पाने वाले लोगों को सार्वजनिक सभाओं में शामिल होने या सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से भी रोका जाता है। उनके अनुसार, ऐसी शर्तें नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आजादी को गंभीर रूप से कमजोर करती हैं।
'बुलडोजर न्याय' पर फैसले का किया जिक्र
जस्टिस भुइयां ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2024 के उस फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें दंडात्मक कार्रवाई के रूप में बुलडोजर चलाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई गई थी। उन्होंने कहा कि यह फैसला स्वागतयोग्य था, लेकिन "यह दो साल देर से आया।"
फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन पर भी टिप्पणी
उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार किया गया था। उन्होंने कहा कि अदालत की यह टिप्पणी उन्हें "काफी अजीब" लगी, जिसमें पूछा गया था कि लोग गाजा की घटनाओं पर प्रदर्शन क्यों करना चाहते हैं, भारत के मुद्दों पर क्यों नहीं। उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से फिलिस्तीन को मान्यता देता रहा है और नई दिल्ली में फिलिस्तीनी दूतावास भी मौजूद है।
सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीशों की राजनीतिक भूमिका पर चिंता
जस्टिस भुइयां ने सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के राजनीति में जाने के मुद्दे पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जब कोई पूर्व मुख्य न्यायाधीश यह कहता है कि वह न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच की दूरी कम करने के लिए राज्यसभा जा रहा है, तो यह मूल रूप से गलत सोच है। उनके अनुसार, इस तर्क में बुनियादी खामी है।
कानून के छात्रों से की आलोचनात्मक सोच अपनाने की अपील
अपने संबोधन के अंत में जस्टिस भुइयां ने कानून के छात्रों से कहा कि वे न्यायपालिका सहित सभी संस्थाओं पर सवाल उठाने का साहस रखें। उन्होंने कहा कि न्यायालय के फैसलों का गंभीरता से अध्ययन होना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर उनकी आलोचना भी की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा, "किसी फैसले की आलोचना करना न्यायाधीश की आलोचना करना नहीं होता।"
जस्टिस भुइयां ने यह भी कहा कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता स्वयं उसके दावों से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से तय होती है। उन्होंने विश्वास जताया कि आज की नई पीढ़ी के वकील और कानून के छात्र संविधान और कानून के शासन के प्रति पहले की पीढ़ियों की तुलना में अधिक प्रतिबद्ध हैं।
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