रवीश कुमार मणि
पटना 01 जूलाई ( तरूणमित्र ) । पीड़ित परिवार के साथ सहानुभूति यहीं हमारी भारतीय संस्कृति है । बिहारी युवा भरत तिवारी की एंकाउंटर/ फ़ेक एंकाउंटर की आवाज़ें एक देश व्यापी मुद्दा बन गया है । निष्पक्ष जांच के लिए हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंच गया है । बिहार सरकार ने निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के लिए रिटायर्ड जस्टिस विनोद कुमार सिन्हा के नेतृत्व में न्यायिक जांच गठित कर दिया है और 6 माह तक जांच का समय निर्धारित किया गया है । भरत तिवारी एंकाउंटर/ फेंक एनकाउंटर मामले में अभी तक तीन - चार एफ़आइआर दर्ज किया गया है । पीड़ित परिवार ने तत्कालीन थानाध्यक्ष, तत्कालीन डीएसपी सहित कई पुलिसकर्मियों को अभियुक्त बनाया है । एफ़आइआर होते ही निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के लिए अविलंब पुलिस मुख्यालय ने डीएसपी राजेश शर्मा को जगदीशपुर से हटा दिया है ।
विधि- व्यवस्था एवं प्रशासनिक दृष्टिकोण से 01 जुलाई को एक साथ थोक भाव में डीएसपी का ट्रांसफर हुआ है । इसी में एक नाम डीएसपी राजेश शर्मा का है जिसका ट्रांसफर मद्य निषेध विभाग में किया गया है । कुछ लोग इसे पुरस्कृत ट्रांसफर का हवाला दें सोशल मीडिया यूनिवर्सिटी पर हो - हल्ला मचाएं हुए है । मालूम हो की भरत तिवारी हत्याकांड की पुलिस मुख्यालय हर पहलू पर मोनिटरिंग कर रही है । बिहार मानवाधिकार आयोग से चार सप्ताह के अंदर रिपोर्ट की मांग की गयी है । इस तरह से भरत तिवारी मामले के आरोपी डीएसपी राजेश शर्मा को पुलिस मुख्यालय में रखना एक सवाल जरूर खड़ा करता , इसलिए पुलिस मुख्यालय ने मद्य निषेध विभाग में ट्रांसफर करना एक उचित कदम है ।
सांसद से लेकर विधायक तक , राजनीति से जुड़े 65% लोगों पर अपराध/ गंभीर अपराध के मामले दर्ज है । भारतीय संविधान/ कानून कहता है की किसी के ऊपर एफ़आइआर हो जाने से वह दोषी/ अपराधी नहीं हो जाता तबतक की सक्षम न्यायलय से उसे दोषी करार नहीं दिया जाता है तबतक वह निर्दोष माना जाता है और संविधान की हर प्रदत्त सुविधाओं का हकदार है । ऐसे में एनकाउंटर/ फेंक एनकाउंटर में मारा गया भरत तिवारी न अपराधी है और न भरत तिवारी मामले में आरोपी बनाया डीएसपी राजेश शर्मा ।