नीट पेपर लीक ने तोड़ी परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता,2024 के बाद 2026 में टूटा सिस्टम

सीकर से शुरू हुआ नेटवर्क, देशभर में फैला संगठित परीक्षा माफिया तंत्र

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रमेश चंद्र

  • केरल कनेक्शन, हस्तलिखित सवाल और 600 अंकों का मेल बना सबसे बड़ा सबूत
  • 2024 के विवादों से सबक नहीं लेने पर 2026 में टूटा पूरा सिस्टम

नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट यूजी-2026 का रद्द होना केवल एक परीक्षा निरस्त होने की घटना नहीं, बल्कि उस जर्जर व्यवस्था की पोल खुलना है जिस पर करोड़ों छात्रों का भविष्य टिका हुआ है। इस बार मामला केवल ‘पेपर लीक’ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जांच में सामने आए तथ्यों ने यह संकेत दिया कि परीक्षा प्रणाली के भीतर तक एक संगठित नेटवर्क अपनी जड़ें जमा चुका है। यही वजह रही कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को अभूतपूर्व फैसला लेते हुए पूरी परीक्षा रद्द करनी पड़ी।

जांच एजेंसियों के अनुसार पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी राजस्थान के सीकर से जुड़ी है। परीक्षा से पहले छात्रों तक पहुंचाए गए एक हस्तलिखित ‘गेस पेपर’ और असली प्रश्नपत्र के बीच चौंकाने वाला मेल मिला। विशेषज्ञों के मुताबिक करीब 150 प्रश्न हूबहू मुख्य परीक्षा से मेल खाते पाए गए, जो कुल 600 अंकों के बराबर हैं। किसी भी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षा में इतना बड़ा मेल सामान्य संयोग नहीं माना जा सकता। यही वह बिंदु था जहां जांच एजेंसियों को स्पष्ट संकेत मिला कि मामला संगठित लीक का है।तफ्तीश में केरल से भी कनेक्शन सामने आया। 

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शुरुआती जांच के मुताबिक एक मेडिकल छात्र द्वारा यह प्रश्न सामग्री राजस्थान भेजी गई थी। इसके बाद यह नेटवर्क कोचिंग संस्थानों, बिचौलियों और छात्रों तक फैला। सोशल मीडिया चैट, कॉल रिकॉर्ड और डिजिटल ट्रांजैक्शन अब जांच का आधार बने हुए हैं। राजस्थान एसओजी अब तक कई संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ कर चुकी है। इनमें कुछ ऐसे लोग भी शामिल बताए जा रहे हैं जिनका शिक्षा और कोचिंग जगत से सीधा संबंध है।

पूरे घटनाक्रम ने एनटीए की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। परीक्षा के बाद शुरूआती दिनों में एजेंसी लगातार स्थिति सामान्य बताती रही, लेकिन जैसे-जैसे सबूत सामने आए, उस पर कार्रवाई का दबाव बढ़ता गया। माना जा रहा है कि 2024 के नीट विवादों से एजेंसी पहले ही आलोचनाओं के घेरे में थी, इसलिए इस बार जोखिम उठाना उसके लिए मुश्किल हो गया। पिछले वर्षों में भी पेपर लीक और ग्रेस मार्क्स जैसे मुद्दों ने परीक्षा की साख को प्रभावित किया था, लेकिन तब व्यापक स्तर पर परीक्षा रद्द नहीं हुई। यही नरमी शायद परीक्षा माफिया के हौसले बढ़ाने का कारण बनी।

हालांकि एनटीए ने छात्रों को राहत देने के लिए दोबारा रजिस्ट्रेशन न कराने, फीस लौटाने और पुराने परीक्षा केंद्र बनाए रखने जैसी घोषणाएं की हैं, लेकिन लाखों अभ्यर्थियों की मानसिक थकान, आर्थिक बोझ और समय की क्षति की भरपाई इन फैसलों से संभव नहीं दिखती। महीनों की तैयारी के बाद परीक्षा देने वाले छात्र अब दोबारा उसी तनावपूर्ण प्रक्रिया से गुजरेंगे।

इस पूरे प्रकरण ने एक बड़ा सच उजागर किया है कि तकनीक आधारित सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद ‘मानवीय सेंध’ अब भी सबसे बड़ा खतरा बनी हुई है। डिजिटल निगरानी, एन्क्रिप्शन और हाई सिक्योरिटी सिस्टम तब बेअसर हो जाते हैं जब अंदरूनी स्तर पर लोग ही सिस्टम से समझौता करने लगें। अब निगाहें सीबीआई जांच पर टिकी हैं। सवाल केवल यह नहीं कि पेपर किसने लीक किया, बल्कि यह है कि क्या देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं को संचालित करने वाली व्यवस्था खुद भरोसेमंद रह गई है या नहीं।

लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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