व्यंग्य: गिरगिट! तुम बेवजह बदनाम हो, तुमसे आगे नेता हैं

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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'

एक पेड़ की झुकी हुई डाल पर बैठा बाघा गिरगिट बड़ी देर से सड़क किनारे खड़े इंसानों की महफ़िल देख रहा था। उसे अपनी पुश्तैनी रगों पर, अपने खानदानी हुनर पर बड़ा नाज़ था। जब चाहा, धानी पत्तों के बीच पन्ना बन गया; जब चाहा, सूखी टहनियों पर बैठ कत्थई चोला ओढ़ लिया। पर आज इंसानों की यह चुनावी और सामाजिक बैठकी देखकर उसकी पूंछ शर्म से दोहरे घेरे में मुड़ गई। उसने एक गहरी सांस ली, अपनी बाईं आंख को नब्बे डिग्री उत्तर और दाईं आंख को एक सौ अस्सी डिग्री दक्षिण में घुमाया और सोचने लगा कि विधाता ने उसे रंग बदलने की जो कला बख्शी थी, इंसानों ने तो उसका पूरा का पूरा कॉरपोरेट साम्राज्य ही खड़ा कर दिया है।

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बाघा ने हवा में उड़ते एक झींगुर को लपकने के लिए जीभ निकाली, पर फिर उसे लगा कि आज भोजन करने से ज़्यादा ज़रूरी आत्मनिरीक्षण है। वह समझ गया कि गिरगिट तो बस एक बदनाम विधा है, असली उस्ताद तो दो पैरों पर चलने वाला यह जीव है। गिरगिट तो केवल त्वचा का रंग बदलता है, इंसान तो अंतरात्मा का भूगोल ही बदल देता है। गिरगिट जब रंग बदलता है, तो उसका मक़सद बहुत सीधा और पाकीज़ा होता है, या तो पेट की आग बुझाना या फिर किसी शिकारी की बाज़ नज़रों से अपनी खाल बचाना। इसमें कोई मक्कारी नहीं, कोई कपट नहीं, विशुद्ध आत्मरक्षा का प्राकृतिक नियम है। इसके विपरीत, इंसान जब रंग बदलता है, तो वह किसी को गर्त में गिराने, किसी की जेब काटने या फिर सत्ता की सीढ़ी चढ़ने के लिए बदलता है। गिरगिट का रंग बदलना एक कला है, इंसान का रंग बदलना एक सोची-समझी साज़िश है।

पेड़ के नीचे बैठे नेताओं और चेलों की बातचीत बाघा के कानों में पिघले सीसे की तरह उतर रही थी। एक कुर्ताधारी भाईसाहब कल तक जिस पार्टी को देश का कलंक कह रहे थे, आज उसी का पटका पहनकर उसे राष्ट्र का तारणहार बता रहे थे। बाघा ने अपनी गर्दन ऊपर-नीचे हिलाकर एक ठंडी आह भरी। उसने सोचा, हम गिरगिट कितने सीधे हैं! हम कभी इतिहास नहीं बदलते, कभी वादे नहीं तोड़ते, और कभी किसी दूसरे गिरगिट की पीठ में छुरा नहीं घोंपते। हम जब हरे से लाल होते हैं, तो पूरी ईमानदारी से होते हैं, हमारी नीयत में कोई खोट नहीं होता। इंसान तो महफ़िल देखकर अपनी ज़बान, अपनी वफ़ादारी और अपने जमीर का रंग बदल लेता है। उसकी नज़रों का पानी कब तेज़ाब बन जाए और कब गंगाजल, इसका अंदाज़ा तो यमराज भी नहीं लगा सकते।

बाघा को अपनी बिरादरी के वे दिव्य गुण याद आने लगे जो उन्हें इंसान से मीलों आगे, एक ऊंचे पायदान पर खड़ा करते थे। गिरगिट कभी अपनी पहचान का झूठा ढोल नहीं पीटता, वह जैसा है, वैसा ही दिखता है। वह प्रकृति के साथ एकाकार होकर जीता है, जबकि इंसान प्रकृति को नोचकर कंक्रीट के जंगल खड़े करता है और फिर वहां बैठकर पर्यावरण पर भाषण देता है। गिरगिट की आंखों में कोई पाखंड नहीं होता, उसकी दोनों आंखें अलग-अलग दिशाओं में घूमकर सच को तलाशती हैं, जबकि इंसान की आंखें सामने देखते हुए भी बगल वाले की लंगोटी खींचने का जुगाड़ लगाती हैं। गिरगिट कभी गिरगिट का हक नहीं मारता, वह किसी दूसरे की डाल पर कब्ज़ा करने के लिए अदालतों के चक्कर नहीं काटता। उसमें न तो पैसों की हवस है, न ऊंचे पदों की भूख, और न ही तिजोरियां भरने की बीमारी। वह तो बस एक सूखी पत्ती पर बैठकर भी शहंशाहों की तरह मुस्कुरा सकता है।
इंसान के भीतर जो रंग बदलने का वायरस है, वह इतना संक्रामक है कि वह अपनों को भी नहीं बख्शता। सुबह जो भाई पैर छूकर आशीर्वाद ले जाता है, शाम को वही जायदाद के कागज़ात पर अंगूठा लगवा लेता है। गिरगिट में यह गद्दारी कहां! वह तो दुश्मनी भी करता है तो डंके की चोट पर, अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधी रखकर। वह कभी गिरगिट-अधिकार आयोग नहीं बनाता, न ही कभी भाई-भतीजावाद के जाल में फंसता है। उसकी ज़बान भले ही लंबी हो, पर वह किसी की चाटुकारिता में नहीं घिसती, वह केवल अपने भोजन के लिए खुलती है। इंसान की ज़बान तो तलवे चाटने से लेकर ज़हर उगलने तक के सारे सुर-ताल जानती है।

सूरज ढलने को था और बाघा की डाल पर धूप का रंग तांबे जैसा होने लगा था। उसने अपने शरीर को थोड़ा सा सिकोड़ा और एक झटके में अपना रंग हूबहू उस तांबे जैसा कर लिया। उसने महसूस किया कि उसकी यह कला कितनी पवित्र है, इसमें कोई मिलावट नहीं है। इंसान तो चेहरे पर मुखौटा लगाता है, मुखौटे पर रंग लगाता है, और फिर उस रंग के पीछे एक और स्याह चेहरा छुपाकर घूमता है। गिरगिट कभी डिप्रेशन का शिकार नहीं होता, क्योंकि वह जैसा है, खुद को वैसा ही स्वीकार करता है। वह कभी नकली मुस्कान नहीं बिखेरता, न ही कभी अपनी नाकामी का ठीकरा किसी दूसरे के सिर फोड़ता है। वह शांत है, संयमित है और अपनी सीमाओं में रहकर भी ब्रह्मांड के सबसे बड़े सच को जीता है।

नीचे सड़क पर अब महफ़िल बिखर चुकी थी और लोग अपनी-अपनी गाड़ियों में बैठकर अपने-अपने घरौंदों की तरफ निकल रहे थे, जहां वे रात को एक नया रंग ओढ़कर सोएंगे और सुबह एक नया रंग लगाकर जागेंगे। बाघा ने अपनी दुम को एक बार फिर हवा में लहराया, मानो वह इंसानी सभ्यता के इस खोखलेपन पर ज़ोरदार तमाचा मार रहा हो। उसने तय किया कि वह कभी इंसान बनने की दुआ नहीं मांगेगा। वह गिरगिट है, यही उसकी सबसे बड़ी नेमत है। उसने आसमान की तरफ देखा, एक बार ज़ोर से अपनी गर्दन हिलाकर इंसानी चालाकियों को धता बताई और पत्तों के झुरमुट में इस तरह विलीन हो गया जैसे उसका कोई अस्तित्व ही न हो, मगर उसका वह मौन करतब हवा में तैरता रहा, जो चीख-चीख कर कह रहा था कि रंग बदलने के इस खेल में गिरगिट आज भी इंसान के सामने महज़ एक नौसिखिया बच्चा है।

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‘तरुणमित्र’ श्रम ही आधार, सिर्फ खबरों से सरोकार। के तर्ज पर प्रकाशित होने वाला ऐसा समचाार पत्र है जो वर्ष 1978 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जैसे सुविधाविहीन शहर से स्व0 समूह सम्पादक कैलाशनाथ के श्रम के बदौलत प्रकाशित होकर आज पांच प्रदेश (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तराखण्ड) तक अपनी पहुंच बना चुका है। 

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