संपादकीय: सोनम वांगचुक का 17वें दिन अनशन, लोकतंत्र की परीक्षा !
सोनम वांगचुक का अनशन 17वें दिन भी जारी है। लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षाविद्, जलवायु कार्यकर्ता और रामन माग्सेसे पुरस्कार विजेता इस समय दिल्ली के जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' के आंदोलन का समर्थन करते हुए अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं।
नीट यूजी परीक्षा में हुई कथित पेपर लीक और अन्य अनियमितताओं को लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ ही लद्दाख की जनजातीय सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और छठी अनुसूची में शामिल करने की पुरानी मांगें भी उनके इस संघर्ष से जुड़ी हुई हैं। उनके स्वास्थ्य की स्थिति चिंताजनक है—8 किलो से अधिक वजन घट चुका है, ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल खतरनाक स्तर पर पहुंच गए हैं, फिर भी सरकार बेफिक्र दिख रही है। यह उदासीनता केवल एक व्यक्ति की जान की परवाह न करने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और युवाओं के भविष्य के प्रति सरकार की उदासीनता का प्रतीक है।
नीट जैसी परीक्षा करोड़ों छात्रों का भविष्य तय करती है। जब पेपर लीक, ग्रेस मार्किंग और सिस्टम में सेंधमारी की खबरें आती हैं, तो केवल कुछ गिरफ्तारियों से काम नहीं चलता। पूरे सिस्टम की जवाबदेही तय करनी पड़ती है। एक मंत्री का इस्तीफा नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने का प्रतीक होता है, न कि कमजोरी। लेकिन सत्ता पक्ष इसे अपनी विफलता मानकर चुप्पी साधे बैठा है। सोनम वांगचुक कोई सामान्य प्रदर्शनकारी नहीं हैं।
उन्होंने लद्दाख में बर्फ के स्टूप बनाकर जल संरक्षण का मॉडल दिया, पर्वतीय इलाकों में पर्यावरण-अनुकूल शिक्षा का बीड़ा उठाया और ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ आवाज उठाई। उनका संघर्ष हमेशा अहिंसक और सत्याग्रही रहा है। आज जब वे 17 दिन से बिना अन्न ग्रहण किए सड़क पर बैठे हैं, तो सवाल यह उठता है कि क्या सरकार को केवल उग्र आंदोलन या आर्थिक नुकसान की स्थिति में ही संवाद की याद आती है? शांतिपूर्ण, सिद्धांतवादी आवाजों को अनसुना करना लोकतंत्र के लिए घातक है।
लद्दाख की मांगें भी कम महत्वपूर्ण नहीं। 2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन के बाद लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बना, लेकिन वहां की जनजातीय संस्कृति, पर्यावरण और सीमावर्ती सुरक्षा की चिंताएं अनसुलझी हैं। छठी अनुसूची की मांग इन क्षेत्रों को विशेष संरक्षण देने की है। खनन, पर्यटन के अंधाधुंध विस्तार और जलवायु परिवर्तन से हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में है। वांगचुक जैसे कार्यकर्ता इन मुद्दों को राष्ट्रीय पटल पर लाते हैं, लेकिन सरकार इन्हें 'क्षेत्रीय' मुद्दे मानकर टाल देती है। यह अनशन युवा वर्ग की निराशा का भी दर्पण है।
शिक्षा व्यवस्था में भरोसा टूटने से लाखों छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। जब सिस्टम में पारदर्शिता नहीं रहेगी, तो मेरिट पर आधारित सपने कैसे पूरे होंगे? वांगचुक का संघर्ष इन युवाओं की आवाज बन गया है। महुआ मोइत्रा समेत कुछ नेताओं ने उन्हें अनशन समाप्त करने की अपील की है, जो सही भी है क्योंकि उनकी जान कीमती है। लेकिन अपील सरकार को भी करनी चाहिए—वार्ता कीजिए, समाधान निकालिए। सरकार को समझना चाहिए कि अनशन कोई राजनीतिक चाल नहीं, बल्कि अंतिम हथियार है। गांधीजी के सत्याग्रह की परंपरा में यह नैतिक बल का प्रदर्शन है।
वांगचुक कहते हैं वे कोई 'आधुनिक गांधी' नहीं, बस एक साधारण नागरिक हैं। लेकिन यही साधारण नागरिक असाधारण साहस दिखा रहे हैं। समय आ गया है कि केंद्र गंभीरता से नीट सुधार, शिक्षा मंत्री की जवाबदेही और लद्दाख की मांगों पर संवाद शुरू करे। अनशन को 18वें, 20वें दिन पहुंचने देने से पहले समाधान निकालना चाहिए। अन्यथा यह उदासीनता न केवल वांगचुक की सेहत, बल्कि लोकतंत्र की सेहत के लिए खतरा बन जाएगी। जनता देख रही है, क्या सत्ता केवल वोट और सत्ता के खेल तक सीमित है, या वह वास्तविक समस्याओं का समाधान भी कर सकती है?
लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
