संपादकीय: नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, अंधकार में शिक्षा व्यवस्था!

क्या एक शिक्षक से संभव है नई शिक्षा नीति 2020 के लक्ष्यों की प्राप्ति?

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भारतीय शिक्षा व्यवस्था की नींव पर एक गंभीर दरार उभरकर सामने आई है। शिक्षा मंत्रालय की डेटा संग्रहण एवं रिपोर्टिंग सिस्टम की रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार, देशभर में 1,04,125 स्कूल केवल एक शिक्षक पर निर्भर हैं, जो करीब 33.77 लाख छात्रों को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। औसतन 34 छात्र प्रति स्कूल। 

अधिकांश ये स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में हैं, जहां बुनियादी सुविधाएं भी सीमित हैं। यह आंकड़ा न केवल शिक्षक कमी को उजागर करता है, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के सपने को भी चुनौती देता है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का लक्ष्य समावेशी और बहु-आयामी शिक्षा का है, लेकिन जब एक शिक्षक सभी कक्षाओं और विषयों को संभाल रहा हो, तो यह लक्ष्य कैसे साकार होगा? साथ में जनगणना, चुनाव ड्यिूटी, यहो तक गाय के लिये भूसा जुटाने की जिम्मेदार भी, इन्ही शिक्षकों की होगी तो पढ़ाई का काम धरा रहा जाता है। 

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एक शिक्षक वाले स्कूलों की समस्या पुरानी है, परंतु आज भी यह जस की तस बनी हुई है। एक शिक्षक को प्राथमिक से लेकर उच्च प्राथमिक स्तर तक की पढ़ाई, मूल्यांकन, गतिविधियां और प्रशासनिक काम संभालने पड़ते हैं। परिणामस्वरूप छात्रों को व्यक्तिगत ध्यान नहीं मिल पाता। बहु-कक्षीय शिक्षण की चुनौतियां और भी बढ़ जाती हैं, जिससे सीखने का स्तर गिरता है। पठन-पाठन की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिसके चलते छात्रों में बुनियादी कौशल की कमी देखी जाती है। 

स्वतंत्र नागरिक-आधारित रिपोर्ट भी बार-बार यही इंगित करती रही हैं कि ग्रामीण भारत में बड़ी संख्या में बच्चे उम्र के अनुरूप सीख नहीं पा रहे। इस संकट के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण शिक्षकों की भर्ती और तैनाती में अनियमितता है। कई राज्यों में शिक्षक पद खाली पड़े हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में अतिरिक्त शिक्षक होते हैं। 

ग्रामीण-क्षेत्रों में पोस्टिंग से बचने की मानसिकता, दूरस्थ इलाकों में आवास की कमी, परिवहन सुविधाओं का अभाव और कम वेतन संरचना शिक्षक पेशे को कम आकर्षक बनाती है। उत्तर प्रदेश, झारखंड, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में यह समस्या सबसे गंभीर है। नई शिक्षा नीति 2020 में शिक्षकों को केंद्र में रखा गया है, फिर भी क्रियान्वयन में कमी साफ दिखती है। शिक्षा व्यवस्था सुधारने के उपायसुधार की दिशा में बहुआयामी प्रयास जरूरी हैं। सबसे पहले, शिक्षक भर्ती को तेज करना होगा। 

केंद्र और राज्य सरकारों को संयुक्त अभियान चलाकर रिक्त पदों को भरना चाहिए। क्लस्टर सिस्टम अपनाया जा सकता है, जिसमें निकटवर्ती स्कूलों के शिक्षक आपस में शेयर किए जाएं। प्रौद्योगिकी का उपयोग महत्वपूर्ण हैभारत सरकार के डिजिटल शिक्षा अभियान के प्रमुख स्तंभ और स्मार्ट क्लासरूम्स से एक शिक्षक की क्षमता बढ़ाई जा सकती है। दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षक-शेयरिंग मॉडल और वॉलंटियर टीचिंग प्रोग्राम  का विस्तार मददगार साबित हो सकते हैं। स्कूलों का तार्किक विलय भी एक विकल्प है, लेकिन सावधानीपूर्वक। 

छोटे स्कूलों को बंद करने से पहले परिवहन और नए स्कूलों की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी, अन्यथा छात्र ड्रॉपआउट बढ़ सकते हैं। साथ ही, शिक्षक प्रशिक्षण को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है। बहु-कक्षीय शिक्षण की विशेष ट्रेनिंग, निरंतर व्यावसायिक विकास और बेहतर वेतन-भत्ते शिक्षकों का मनोबल बढ़ाएंगे। शिक्षा में समाज की भूमिका भी कम नहीं। स्थानीय समुदाय, पंचायतें और अभिभावक सक्रिय होकर स्कूलों की निगरानी करें। 

सीएसआर फंडिंग को शिक्षक आवास और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगाया जाए। शिक्षा में निवेश बढ़ाना होगा। जीडीपी का 6% शिक्षा पर खर्च करने का पुराना वादा अब पूरा करना चाहिए। एक शिक्षक वाले स्कूल शिक्षा की असमानता का प्रतीक हैं। जब तक हम इन स्कूलों को बहु-शिक्षक, सुसज्जित संस्थानों में नहीं बदलते, देश का शिक्षित समाज के सपने अधूरे रहेंगे। बच्चे देश का भविष्य हैं। यदि उनका भविष्य ही कमजोर आधार पर टिका है, तो राष्ट्र का विकास कैसे संभव? तत्काल, ठोस और सतत प्रयासों से ही शिक्षा व्यवस्था सुधर सकती है। समय अब इंतजार नहीं कर सकता।

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लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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