क्या न्यायपालिका पर घट रहा है जनविश्वास? -महेन्द्र तिवारी

लेकिन क्या यह आक्रोश अदालत के भीतर अनुशासन तोड़ने का अधिकार दे देता है? 

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आज के समय में न्यायपालिका केवल संविधान की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में नागरिकों के अंतिम विश्वास का केंद्र भी है। जब कार्यपालिका और विधायिका से किसी व्यक्ति को राहत नहीं मिलती, तब उसकी अंतिम उम्मीद न्यायालय से जुड़ती है। 

ऐसे में यदि सर्वोच्च न्यायालय के भीतर ही ऐसी घटना घटे जिसमें एक याचिकाकर्ता न्यायाधीशों को "ज्यूडिशियल सर्वेंट" कहकर संबोधित करे, स्वयं को "सॉवरेन" घोषित करे, न्यायालय को आदेश देने की भाषा बोले, कागज हवा में उछाल दे और मुख्य न्यायाधीश के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करे, तो यह केवल एक व्यक्ति का अनुचित व्यवहार नहीं रह जाता। 

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यह घटना न्यायपालिका, समाज और लोकतंत्र के संबंधों पर गंभीर प्रश्न भी खड़े करती है। हाल में सर्वोच्च न्यायालय में स्वयं पैरवी कर रहे प्रबल प्रताप द्वारा ऐसा व्यवहार किए जाने के बाद अदालत की कार्यवाही बाधित हुई और सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें बाहर ले जाकर स्थिति को सामान्य किया। यह घटना देशभर में चर्चा का विषय बन गई।

 
इस घटना को देखने के दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते हैं। पहला यह कि यह पूरी तरह से न्यायालय की अवमानना और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन है। दूसरा यह कि यह उस गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति है जो वर्षों से लंबित मामलों और न्याय मिलने में होने वाली देरी के कारण समाज के एक वर्ग में पनप रहा है। दोनों दृष्टिकोणों को समझे बिना इस घटना का निष्पक्ष मूल्यांकन संभव नहीं है।

 
भारतीय न्याय व्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी न्यायिक व्यवस्थाओं में से एक है। देश की अदालतों में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। अनेक मामलों में न्याय पाने में वर्षों नहीं बल्कि दशकों का समय लग जाता है। कई बार मुकदमे की शुरुआत करने वाला व्यक्ति अंतिम निर्णय देखने के लिए जीवित भी नहीं रहता। ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जहां अगली पीढ़ी मुकदमा लड़ती रहती है। यह स्थिति स्वाभाविक रूप से लोगों में निराशा पैदा करती है। प्रसिद्ध कहावत है कि विलंबित न्याय, न्याय से वंचित करने के समान होता है। जब नागरिकों को लगता है कि उनकी समस्याओं का समाधान समय पर नहीं हो रहा, तब व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास कमजोर होने लगता है। यही कमजोर होता विश्वास कभी-कभी आक्रोश का रूप भी ले लेता है।

 
लेकिन क्या यह आक्रोश अदालत के भीतर अनुशासन तोड़ने का अधिकार दे देता है? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से नहीं है। लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता है। न्यायिक निर्णयों की आलोचना भी की जा सकती है। पुनर्विचार याचिका दायर की जा सकती है। संविधान ने इसके अनेक कानूनी रास्ते दिए हैं। किंतु न्यायालय के भीतर न्यायाधीशों को आदेश देना, अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना या कार्यवाही बाधित करना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं कहा जा सकता। यदि हर व्यक्ति स्वयं को सर्वोच्च मानकर अदालत को निर्देश देने लगे, तो कानून का शासन समाप्त होकर अराजकता का शासन स्थापित हो जाएगा। न्यायपालिका की आलोचना और न्यायपालिका का अपमान, दोनों अलग बातें हैं। लोकतंत्र पहले की अनुमति देता है, दूसरे की नहीं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि आज का समाज पहले की तुलना में कहीं अधिक अधीर हो गया है। डिजिटल युग में लगभग हर सेवा कुछ ही मिनटों में उपलब्ध हो जाती है। मोबाइल पर भोजन मंगाया जा सकता है, बैंकिंग हो सकती है, टिकट बुक हो सकता है और जानकारी तुरंत मिल जाती है। इसी मानसिकता का प्रभाव न्याय के प्रति अपेक्षाओं पर भी पड़ा है। लोग चाहते हैं कि अदालतें भी तुरंत फैसला सुनाएं। लेकिन न्यायिक प्रक्रिया किसी तकनीकी सेवा की तरह नहीं चल सकती। प्रत्येक मामले में तथ्य, साक्ष्य, गवाह, कानून और दोनों पक्षों की दलीलों का विस्तार से परीक्षण आवश्यक होता है। यदि केवल तेजी के लिए न्यायिक प्रक्रिया को छोटा कर दिया जाए, तो निर्दोष भी दंडित हो सकते हैं और दोषी भी बच सकते हैं। इसलिए त्वरित न्याय आवश्यक है, लेकिन जल्दबाजी में दिया गया न्याय नहीं।

यही कारण है कि न्यायिक सुधार की चर्चा केवल मामलों के निपटारे की गति तक सीमित नहीं होनी चाहिए। न्यायालयों की संख्या बढ़ाना, न्यायाधीशों के रिक्त पद शीघ्र भरना, आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ाना, डिजिटल सुनवाई की व्यवस्था मजबूत करना, अनावश्यक स्थगनों पर नियंत्रण और वैकल्पिक विवाद निवारण प्रणालियों को प्रोत्साहन देना भी उतना ही आवश्यक है। यदि इन क्षेत्रों में सुधार होगा, तो लंबित मामलों की संख्या कम होगी और जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।

इस पूरे प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है कि क्या संस्थाओं का सम्मान केवल संवैधानिक पद के कारण बना रहता है या उसके पीछे कार्यक्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। वस्तुतः दोनों बातें समान रूप से आवश्यक हैं। संविधान न्यायपालिका को स्वतंत्र और सम्मानित स्थान देता है। इस सम्मान की रक्षा प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। साथ ही न्यायपालिका पर यह उत्तरदायित्व भी है कि वह समयबद्ध, पारदर्शी और प्रभावी न्याय प्रदान करे। जनता का विश्वास केवल संवैधानिक व्यवस्था से नहीं, बल्कि उसके अनुभवों से भी निर्मित होता है।

 इतिहास बताता है कि जब भी किसी संस्था और समाज के बीच संवाद कमजोर होता है, तब टकराव की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए इस घटना को केवल अनुशासनहीनता मानकर भुला देना भी उचित नहीं होगा। यह समझना होगा कि आखिर ऐसे व्यवहार की पृष्ठभूमि क्या है। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में मानसिक तनाव, निराशा या न्यायिक प्रक्रिया से उपजे असंतोष के कारण ऐसा करता है, तो यह भी चिंता का विषय है। यदि ऐसा केवल सस्ती लोकप्रियता या प्रचार पाने के लिए किया गया, तब भी यह समाज में बढ़ती सनसनी प्रियता का संकेत है। दोनों ही स्थितियों में समाधान केवल दंड नहीं, बल्कि संस्थागत आत्ममंथन भी है।

 
सोशल मीडिया ने भी इस प्रकार की घटनाओं को नया आयाम दिया है। पहले अदालतों में होने वाली घटनाएं सीमित दायरे में रहती थीं। अब कुछ ही मिनटों में उनका वीडियो और विवरण लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। इससे कई बार तथ्य पीछे छूट जाते हैं और भावनाएं आगे निकल जाती हैं। लोग बिना पूरी जानकारी के पक्ष और विपक्ष में खड़े हो जाते हैं। न्यायपालिका जैसी गंभीर संस्था के संदर्भ में यह प्रवृत्ति और भी चिंताजनक है क्योंकि इससे जनविश्वास प्रभावित हो सकता है।

यह भी याद रखना चाहिए कि न्यायपालिका की आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है। सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों पर समय-समय पर विद्वानों, वकीलों, पत्रकारों और नागरिकों ने असहमति जताई है। लेकिन यह असहमति हमेशा तर्क, कानून और संवैधानिक भाषा के माध्यम से व्यक्त की गई। यही लोकतांत्रिक संस्कृति है। व्यक्तिगत अपमान, अभद्रता और संस्थागत अवमानना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करते हैं।

दूसरी ओर न्यायपालिका को भी यह समझना होगा कि सम्मान केवल अपेक्षा करने से नहीं मिलता, बल्कि निरंतर अर्जित भी करना पड़ता है। जब लोगों को समय पर न्याय मिलता है, फैसले स्पष्ट और तार्किक होते हैं, प्रक्रियाएं पारदर्शी होती हैं और अदालतें आम नागरिक के लिए सुलभ बनती हैं, तब सम्मान स्वतः बढ़ता है। इसलिए न्यायिक सुधार केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास की भी आवश्यकता है।

सर्वोच्च न्यायालय में घटी यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल अदालत के भीतर की घटना नहीं है। यह समाज के भीतर बढ़ती अधीरता, संस्थाओं के प्रति बदलते दृष्टिकोण, सोशल मीडिया के प्रभाव और न्याय व्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों का संयुक्त प्रतिबिंब है। इस घटना की निंदा करना आवश्यक है क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक संस्था की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता। साथ ही इस घटना को एक चेतावनी के रूप में भी देखना चाहिए कि यदि न्यायिक व्यवस्था को अधिक सक्षम, तेज और नागरिक केंद्रित नहीं बनाया गया, तो जनता और संस्थाओं के बीच विश्वास का अंतर और बढ़ सकता है।

लोकतंत्र की सफलता केवल संविधान की पुस्तकों में नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास में निहित होती है। न्यायपालिका उस विश्वास की अंतिम संरक्षक है। इसलिए एक ओर नागरिकों का कर्तव्य है कि वे अदालतों की गरिमा और संवैधानिक मर्यादा का सम्मान करें, वहीं दूसरी ओर न्यायपालिका का दायित्व है कि वह समयबद्ध, सुलभ और प्रभावी न्याय देकर उस सम्मान को और अधिक मजबूत बनाए। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश है। 

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लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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