'वन नेशन, वन जर्नलिस्ट': पत्रकारिता, साख पर सवाल, सुधार का बिगुल!
सुरेश गांधी
'वन नेशन, वन जर्नलिस्ट' अभियान का सुझाव—ईमानदार पत्रकारों की प्रतिष्ठा बचाने और पेशे की विश्वसनीयता मजबूत करने के लिए बने स्वतंत्र 'पत्रकारिता आचरण एवं मूल्यांकन समिति'. मतलब साफ है हम समाधान थोप नहीं रहे, राष्ट्रीय विमर्श का आधार प्रस्तुत कर रहे हैं। प्रस्तावित श्वेत पत्र का उद्देश्य किसी अंतिम निर्णय की घोषणा करना नहीं, बल्कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और गरिमा को सुदृढ़ करने के लिए देशव्यापी संवाद शुरू करना है।
अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि किसी पेशे की गरिमा बचानी है तो उसके भीतर आत्मानुशासन और जवाबदेही की व्यवस्था भी होनी चाहिए। डॉक्टरों, वकीलों, चार्टर्ड अकाउंटेंट और अन्य पेशों की तरह पत्रकारिता में भी एक ऐसी व्यवस्था हो सकती है जो शिकायतों की निष्पक्ष जांच करे और सत्य को सामने लाए। प्रस्तावित समिति को पूरी तरह स्वतंत्र बनाने की बात कही गई है। इसमें केवल पत्रकार ही नहीं, बल्कि सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी, विधि विशेषज्ञ, वरिष्ठ एवं निष्पक्ष पत्रकार, शिक्षाविद और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल करने का सुझाव है। इससे किसी एक वर्ग का प्रभाव नहीं रहेगा और निर्णय केवल तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर होंगे
पत्रकारिता लोकतंत्र का वह स्तंभ है, जिसकी ताकत सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में निहित होती है। यही विश्वास किसी पत्रकार की सबसे बड़ी पूंजी होता है। जब कोई पत्रकार सड़क पर उतरकर जनसमस्याओं को सामने लाता है, भ्रष्टाचार का खुलासा करता है, व्यवस्था से सवाल पूछता है और समाज की आवाज़ बनता है, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन समय के साथ पत्रकारिता के सामने एक ऐसी चुनौती भी खड़ी हुई है, जिसने पूरे पेशे की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह चुनौती किसी विचारधारा की नहीं, बल्कि पेशेवर आचरण और जवाबदेही की है।
इसी पृष्ठभूमि में 'वन नेशन, वन जर्नलिस्ट' अभियान के तहत एक महत्वपूर्ण सुझाव सामने आया है। सुझाव यह है कि देश में पत्रकारिता की गरिमा और विश्वसनीयता को मजबूत करने के लिए एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष 'पत्रकारिता आचरण एवं मूल्यांकन समिति' का गठन किया जाए। यह समिति किसी पत्रकार के विचारों या उसकी खबरों का मूल्यांकन नहीं करेगी, बल्कि केवल उन शिकायतों की जांच करेगी जिनमें पत्रकार की पहचान के कथित दुरुपयोग, पेशेवर आचरण या नैतिक मानकों के उल्लंघन का प्रश्न उठता हो।
इस प्रस्ताव के पीछे सोच बेहद स्पष्ट है। देश में आज भी हजारों पत्रकार ऐसे हैं जिनका पूरा दिन घटनास्थलों, अदालतों, सरकारी दफ्तरों, गांवों, मोहल्लों और आम लोगों के बीच बीतता है। उनकी पहचान उनकी खबरें होती हैं, न कि किसी कार्यालय में उनकी मौजूदगी। वे दस्तावेज़ जुटाते हैं, तथ्यों की पुष्टि करते हैं और लगातार जनहित के मुद्दों को सामने लाते हैं। यही पत्रकारिता का मूल स्वरूप है।
दूसरी ओर समय-समय पर ऐसे आरोप भी सामने आते हैं कि कुछ लोग पत्रकार की पहचान का उपयोग निजी प्रभाव, व्यक्तिगत हित या अनुचित लाभ लेने के लिए करते हैं। चाहे ये आरोप सही हों या गलत, लेकिन इनकी चर्चा से पूरे पत्रकार समाज की छवि प्रभावित होती है। सबसे अधिक नुकसान उन पत्रकारों को होता है जो वर्षों से ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ अपना दायित्व निभा रहे हैं।
अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि किसी पेशे की गरिमा बचानी है तो उसके भीतर आत्मानुशासन और जवाबदेही की व्यवस्था भी होनी चाहिए। डॉक्टरों, वकीलों, चार्टर्ड अकाउंटेंट और अन्य पेशों की तरह पत्रकारिता में भी एक ऐसी व्यवस्था हो सकती है जो शिकायतों की निष्पक्ष जांच करे और सत्य को सामने लाए। प्रस्तावित समिति को पूरी तरह स्वतंत्र बनाने की बात कही गई है। इसमें केवल पत्रकार ही नहीं, बल्कि सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी, विधि विशेषज्ञ, वरिष्ठ एवं निष्पक्ष पत्रकार, शिक्षाविद और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल करने का सुझाव है। इससे किसी एक वर्ग का प्रभाव नहीं रहेगा और निर्णय केवल तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर होंगे।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समिति का उद्देश्य किसी पत्रकार को डराना या उसकी स्वतंत्रता सीमित करना नहीं होगा। लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस पर किसी भी प्रकार का अनावश्यक हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं हो सकता। इसलिए समिति केवल उन्हीं मामलों में हस्तक्षेप करे जहाँ पेशेवर आचरण से जुड़ी स्पष्ट शिकायत हो और शिकायत के समर्थन में पर्याप्त तथ्य उपलब्ध हों। प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि किसी भी शिकायत पर एकतरफा कार्रवाई न हो। संबंधित पत्रकार को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिले, दस्तावेज़ प्रस्तुत करने का अधिकार मिले और जांच पूरी तरह पारदर्शी हो। यदि शिकायत झूठी साबित होती है तो शिकायतकर्ता के विरुद्ध भी उचित कार्रवाई का प्रावधान हो। इससे दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर भी रोक लगेगी और ईमानदार पत्रकारों का मनोबल बढ़ेगा।
अभियान के समर्थकों का मानना है कि आज सबसे बड़ी आवश्यकता जनता का विश्वास पुनः मजबूत करने की है। जब समाज यह देखेगा कि पत्रकार समाज स्वयं अपने पेशे की गरिमा और जवाबदेही के लिए पहल कर रहा है, तब पत्रकारिता के प्रति सम्मान भी बढ़ेगा। यह व्यवस्था किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे पेशे के सम्मान के पक्ष में होगी। विशेषज्ञों का भी मानना है कि पत्रकारिता का मूल्यांकन खबरों की निर्भीकता, तथ्यपरकता और जनहित के आधार पर होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत संपर्कों या प्रभाव के आधार पर। लोकतंत्र को ऐसे पत्रकारों की आवश्यकता है जो सत्ता के निकट होने के कारण नहीं, बल्कि सच के निकट होने के कारण पहचाने जाएं।
'वन नेशन, वन जर्नलिस्ट' अभियान का कहना है कि यह पहल किसी विवाद को जन्म देने के लिए नहीं, बल्कि एक सकारात्मक विमर्श शुरू करने के लिए है। यदि पत्रकार समाज स्वयं अपनी आचार संहिता और जवाबदेही की व्यवस्था विकसित करता है, तो बाहरी नियंत्रण की आवश्यकता भी कम होगी और स्वतंत्र पत्रकारिता अधिक मजबूत होगी। अभियान से जुड़े लोगों का विश्वास है कि आने वाले समय में पत्रकार संगठनों, मीडिया संस्थानों, विधि विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और सरकार के बीच इस विषय पर व्यापक संवाद होना चाहिए। संवाद जितना व्यापक होगा, समाधान उतना ही व्यावहारिक और स्वीकार्य होगा।
पत्रकारिता की असली पहचान सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि जनता के बीच बनती है। इसलिए आज आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष पर उंगली उठाने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है जो ईमानदार पत्रकारों को सम्मान, सुरक्षा और विश्वास प्रदान करे तथा पेशे की गरिमा को हर परिस्थिति में अक्षुण्ण बनाए रखे। शायद यही वह रास्ता है, जो पत्रकारिता को फिर से उसी ऊंचाई पर स्थापित कर सकता है, जहां उसकी सबसे बड़ी ताकत केवल एक होती है—सच।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
