बिना बिजली-AC के 7 डिग्री तक ठंडा होगा कमरा, मिट्टी वाली तकनीक का कमाल
नई दिल्ली। ऑस्ट्रिया की ग्राज यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी (TU Graz) के रिसर्चर्स ने बिना बिजली और केमिकल के हवा को ठंडा करने वाले 3D प्रिंटेड सिरेमिक क्यूब्स बनाए हैं। यह तकनीक प्राचीन इवैपोरेटिव कूलिंग पर आधारित है, जिसे 3D प्रिंटिंग, मिट्टी, लकड़ी के बुरादे और फंगल कल्चर के इस्तेमाल से आधुनिक और ज्यादा असरदार बनाया गया है।
क्या कोई ऐसी टेक्नोलॉजी है
बिनी बिजली और एसी के ही हवा को ठंडा कर दे? अगर आपके मन में भी यही सवाल आता है तो बता दें कि ग्राज यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी (TU Graz) के रिसर्चर्स ने 3D प्रिंटेड सिरेमिक क्यूब्स बनाए हैं, जो बिना बिजली और एसी के हवा को ठंडा करते हैं। ये क्यूब्स, इवैपोरेटिव कूलिंग टेक्नोलॉजी यानी वाष्पीकरण से ठंडक करने वाले तरीके का इस्तेमाल करते हैं। दरअसल, मिट्टी (सिरेमिक) का बर्तन जब पानी सोखता है, तो वह पानी धीरे-धीरे भाप बनकर उड़ने लगता है और आस-पास की गर्मी को सोख लेता है। गर्मी के दिनों में घर की ऊपरी मंजिल पर किए गए एक प्रयोग में देखा गया कि पानी से भरे इस तरह के एक क्यूब के ठीक पास का तापमान लगभग 7°C (12.6°F) तक कम हो गया।
इवैपोरेटिव कूलिंग टेक्नोलॉजी का किया इस्तेमाल
यह प्रोजेक्ट TU Graz के इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्चर एंड मीडिया का है। रिसर्चर मिलेना स्टावरिक का कहना है कि यह सदियों पुरानी ही टेक्नोलॉजी है, जिसे बस आज की नई तकनीक से बेहतर और आधुनिक तरीके से बनाया गया है। मिट्टी के घड़े और ट्रेडिशनल विंड टावर सदियों से इवैपोरेटिव कूलिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। अब 3D प्रिंटिंग से ऐसे डिजाइन करना मुमकिन हो गया है, जिससे यह असर ज्यादा से ज्यादा हो सके।
हर क्यूब की हर साइड लगभग 9 इंच की होती है। इसे डिजिटल रूप से डिजाइन किया जाता है और मिट्टी के मिश्रण से प्रिंट किया जाता है। प्रिंट की गई मिट्टी को कम तापमान पर पकाया जाता है ताकि एक बहुत ज्यादा पोरस (छिद्रों वाला) मटीरियल बन सके।
3D प्रिंटिंग तकनीक वाला डिजाइन TPMS स्ट्रक्चर
इसकी असली खूबी इसका खास डिजाइन TPMS स्ट्रक्चर है। इस डिजाइन का फायदा यह है कि कम सामान में भी पानी को फैलने के लिए बहुत ज्यादा जगह मिल जाती है। पानी अपने आप मिट्टी (सिरेमिक) के बारीक छेदों में सोख लिया जाता है और पूरे डिजाइन में बराबर फैल जाता है। इसके बाद बड़े हिस्से से पानी लगातार भाप बनकर उड़ता रहता है और आस-पास की हवा की गर्मी को खींचकर माहौल को ठंडा कर देता है।
स्टावरिक ने कहा कि यह तरीका सदियों से काम कर रहा है, चाहे मिट्टी के घड़े हों या ट्रेडिशनल विंड टावर। इसमें सबसे मुख्य बात 3D प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल है, जिसकी मदद से मिट्टी के घोल से बहुत ही बारीकी वाले, बारीक छेदों वाले और ज्यादा असरदार डिजाइन आसानी से बनाए जा सकते हैं।
7°C कम हो जाता है तापमान
टीम ने इस प्रोसेस में बायोलॉजी को भी शामिल किया है। प्रिंटिंग से पहले मिट्टी में फंगल कल्चर और लकड़ी का बुरादा मिलाया जाता है। इसके बाद मटीरियल के अंदर माइसेलियम यानी फंगल फिलामेंट्स का धागे जैसा नेटवर्क पनपता है। फिर क्यूब को पकाया जाता है। इस दौरान फंगल मटीरियल और लकड़ी का बुरादा जलकर खत्म हो जाते हैं। आखिर में सिरेमिक के छोटे और बड़े छिद्रों का एक घना नेटवर्क बचता है। इन छिद्रों से पानी आसानी से फैलता है, जिससे कूलिंग का असर बेहतर होता है। टीम, ऑस्ट्रिया की न्यूसीडल झील की तलछट (sediment) के साथ भी प्रयोग कर रही है। TU Graz में एक कंट्रोल्ड फील्ड टेस्ट में इसके असर को सीधे मापा गया। रिसर्चर्स ने पानी से भरा एक क्यूब गर्म एटिका में रखा और आसपास के तापमान पर नजर रखी। क्यूब के ठीक आसपास की हवा का तापमान लगभग 7°C (12.6°F) कम हो गया।
बिना बिजली, बिना ऐसी के ठंडक
क्रिस्टिजन रिस्टोस्की ने कहा कि पूरे कमरे में कूलिंग का असर साफ महसूस किया जा सकता था। उन्होंने क्यूब्स और पानी की सप्लाई को मिलाकर एक कूलिंग वॉल बनाने पर अपनी मास्टर थीसिस लिखी थी। अब TU Graz के ग्राज स्थित कैंपस न्यू टेक्निक (Campus Neue Technik) में 2 गुणा 2 मीटर (6.6 गुणा 6.6 फीट) की एक डेमो वॉल बनी हुई है। आम लोग इसे देख सकते हैं और इसके असर को खुद महसूस कर सकते हैं। एक दूसरा इंस्टॉलेशन ग्राज के म्यूजियम ऑफ परसेप्शन में भी लगाया गया है।
एयर कंडीशनिंग में बहुत ज्यादा एनर्जी खर्च होती है। इससे पर्यावरण में गर्मी भी निकलती है, जिससे शहरी इलाकों में गर्मी का बढ़ने की समस्या और गंभीर हो जाती है। सिरेमिक इवैपोरेटिव कूलिंग में ऐसा कुछ नहीं होता। इसमें सिर्फ पानी और पैसिव एयरफ्लो की जरूरत होती है।
कहां आ सकते हैं काम?
स्टावरिक ने कहा कि उनका मकसद उन जगहों पर कूलिंग पहुंचाना है जहां लोग गर्मी से सबसे ज्यादा परेशान होते हैं। वे एनर्जी की ज्यादा खपत वाली एयर-कंडीशनिंग टेक्नोलॉजी के बजाय नेचुरल कूलिंग के तरीकों पर भरोसा करते हैं।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
‘तरुणमित्र’ श्रम ही आधार, सिर्फ खबरों से सरोकार। के तर्ज पर प्रकाशित होने वाला ऐसा समचाार पत्र है जो वर्ष 1978 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जैसे सुविधाविहीन शहर से स्व0 समूह सम्पादक कैलाशनाथ के श्रम के बदौलत प्रकाशित होकर आज पांच प्रदेश (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तराखण्ड) तक अपनी पहुंच बना चुका है।
