इमोजी दिवस पर स्वामी चिदानन्द का आह्वान- चेहरे की मुस्कान नहीं, कर्मों में दिखे संवेदना
आज आवश्यकता इमोजी से आगे इमोशन और इमोशन से आगे एक्शन की: चिदानन्द सरस्वती
- अन्तर्राष्ट्रीय न्याय दिवस एवं विश्व इमोजी दिवस पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती का संदेश- केवल चेहरों पर मुस्कान के इमोजी नहीं, जीवन में न्याय, करुणा और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व भी व्यक्त करें
ऋषिकेश। अन्तर्राष्ट्रीय न्याय दिवस और विश्व इमोजी दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, परमार्थ पीठाधीश्वर, स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि आज दुनिया भावनाओं को व्यक्त करने के लिये इमोजी का भरपूर उपयोग करती है, लेकिन समय की मांग है कि हमारी संवेदनाएँ केवल मोबाइल स्क्रीन तक सीमित न रहें, बल्कि हमारे व्यवहार में भी दिखाई दें। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने परमार्थ निकेतन दर्शनार्थ आने वाले श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि धरती के प्रति न्याय ही मानवता के प्रति न्याय है और जैव विविधता की रक्षा करना आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा करना है।
अन्तर्राष्ट्रीय न्याय दिवस स्मरण कराता है कि न्याय केवल हमारे लिए नहीं, बल्कि हमारी धरती, नदियों, वनों, पर्वतों, जल, वायु और आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी हमारा नैतिक दायित्व है। प्रकृति का अंधाधुंध दोहन, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि भविष्य के साथ अन्याय है। आज समय की पुकार है कि हम विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करें, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करें और पृथ्वी को वही सम्मान दें जो हम अपने जीवन को देते हैं। धरती सुरक्षित होगी, तभी न्याय, शांति और मानवता का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।
स्वामी जी ने कहा, एक मुस्कुराता हुआ इमोजी तभी सार्थक है जब हमारे व्यवहार से किसी के जीवन में मुस्कान आए। जुड़े हुए हाथों का इमोजी तभी पूर्ण है जब हमारे भीतर विनम्रता और सेवा का भाव हो। हरे वृक्ष का इमोजी तभी जीवंत है जब हम वास्तव में पौधे लगाएँ और प्रकृति की रक्षा करें। पृथ्वी का इमोजी तभी सार्थक है जब हम धरती के प्रति अपने दायित्व निभाएँ।
उन्होंने कहा कि न्याय केवल न्यायालयों तक सीमित नहीं है। वास्तविक न्याय वह है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक जीव, प्रत्येक नदी, प्रत्येक वन और स्वयं पृथ्वी के अधिकारों का सम्मान हो। यदि नदियाँ प्रदूषित हैं, वन नष्ट हो रहे हैं, जलवायु संकट गहरा रहा है और भविष्य की पीढ़ियों से स्वच्छ पर्यावरण छिन रहा है, तो यह भी अन्याय का ही एक स्वरूप है।
स्वामी जी ने कहा कि आज आवश्यकता इमोजी से आगे इमोशन और इमोशन से आगे एक्शन की है। हमारी डिजिटल अभिव्यक्ति तभी सार्थक होगी जब वह सामाजिक उत्तरदायित्व, पर्यावरण संरक्षण और मानवीय मूल्यों में परिवर्तित हो।
उन्होंने कहा कि यदि दुनिया नए इमोजी बनाए, तो उनमें केवल भावनाएँ नहीं बल्कि न्याय, जल संरक्षण, स्वच्छ नदियाँ, वृक्षारोपण, करुणा, शांति और पृथ्वी की सुरक्षा के प्रतीक भी प्रमुख स्थान प्राप्त करें। ऐसे इमोजी आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देंगे कि विकास और तकनीक का उद्देश्य केवल संवाद नहीं, बल्कि संवेदनशील और उत्तरदायी समाज का निर्माण भी है।
स्वामी जी ने सभी से आह्वान किया कि इस अवसर पर एक संकल्प लें, हम केवल न्याय की बात नहीं करें, बल्कि न्यायपूर्ण जीवन जिएँ; केवल प्रकृति के इमोजी साझा नहीं करें, बल्कि प्रकृति की रक्षा भी करें; केवल शांति का संदेश नहीं भेजें, बल्कि अपने विचारों, व्यवहार और निर्णयों में भी शांति, करुणा और न्याय को स्थान दें।
उन्होंने कहा, दुनिया को आज ऐसे इमोजी की आवश्यकता है जो केवल चेहरे की भावनाएँ नहीं, बल्कि मानवता का चरित्र दर्शाएँ। जब हमारे हाथ सेवा में, हमारे हृदय करुणा में और हमारे एक्शन न्याय में बदलेंगे, तभी सच्चे अर्थों में मानवता मुस्कुराएगी।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
