हादसे के बाद ही जागेगा क्या प्रशासन, बेसमेंट में तैनात महादेव हॉस्पिटल पर क्यों मेहरबान
संवाददाता/ अजीत मिश्रा
जब कोचिंग में हादसा हुआ तो सिर्फ कोचिंग नापी गई, अस्पताल की बारी कब?
जलालाबाद/शाहजहांपुर। राजधानी लखनऊ के अलीगंज (पुरनिया) में एक कोचिंग सेंटर में हुए दर्दनाक हादसे ने पूरे सूबे को हिलाकर रख दिया था। मासूम बच्चों की असमय मौत पर बड़े-बड़े दावे किए गए, जांच कमेटियां बनीं और बेसमेंट के अवैध कमर्शियल इस्तेमाल के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें हुईं। लेकिन, क्या उस भीषण हादसे से जनपद शाहजहाँपुर के स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन ने कोई सबक लिया? जवाब है—बिल्कुल नहीं.. तहसील जलालाबाद के याक़ूबपुर तिराहे की ओर नजर घुमाइए, जहाँ नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए दर्जनों अस्पताल कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं।
इन्हीं में से एक नायाब नमूना है महादेव हॉस्पिटल(नर्सिंग होम), जो पूरी तरह से धड़ल्ले के साथ एक तंग बेसमेंट में संचालित हो रहा है। वीडियो साक्ष्य साफ बयां करते हैं कि यहाँ न तो पर्याप्त वेंटिलेशन है, न ही आपातकालीन निकास की कोई सुरक्षित व्यवस्था। ऐसा प्रतीत होता है मानो यह अस्पताल नियमों और स्वास्थ्य विभाग को पूरी तरह जूते की नोक पर रखकर चलाया जा रहा है। अब प्रश्न यह है कि यदि कल को इस बेसमेंट वाले अस्पताल में कोई अप्रिय घटना घटित होती है, जलभराव या शॉर्ट सर्किट जैसी अनहोनी होती है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
ये खबर भी पढ़े : विद्युत विभाग में गड़बड़ी उजागर, जांच रिपोर्ट के बाद तीन इंजीनियरों पर गिरी कार्रवाई की गाजक्या स्थानीय मुख्य चिकित्सा अधिकारी इसकी जिम्मेदारी अपने सिर लेंगे?
या सीधे स्वास्थ्य विभाग के मुखिया डिप्टी सीएम बृजेश पाठक जी जवाबदेह होंगे?
या फिर स्थानीय प्रशासन किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार कर रहा है, ताकि बाद में बाबा जी का बुलडोजर चलवाकर अपनी नाकामियों पर पर्दा डाला जा सके?
नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC) और स्वास्थ्य विभाग के क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत बेसमेंट में कमर्शियल गतिविधि, खासकर अस्पताल या क्लीनिक चलाने के लिए बेहद सख्त नियम निर्धारित हैं। लेकिन यहाँ तो अंधेर नगरी, चौपट राजा वाला हाल है। आइए प्रशासन को जगाने के लिए उन नियमों की सूची पर एक नजर डाल लेते हैं- डबल एग्जिट (दोतरफा निकास): बेसमेंट में संचालित किसी भी सार्वजनिक स्थान पर कम से कम दो चौड़े और सीधे निकास द्वार होने अनिवार्य हैं, ताकि आपातकाल में भगदड़ न मचे।
(यहाँ तो एक पतली सी सीढ़ी ही जीवन और मृत्यु का एकमात्र रास्ता है)। फायर फाइटिंग एनओसी : बेसमेंट के लिए फायर ब्रिगेड से विशेष एनओसी, स्प्रिंकलर सिस्टम, फायर अलार्म और पर्याप्त मात्रा में अग्निशामक यंत्र होना अनिवार्य है। मजबूत वेंटिलेशन और एयर-सर्कुलेशन: बेसमेंट में प्राकृतिक हवा नहीं पहुंचती, इसलिए वहां मैकेनिकल वेंटिलेशन का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए ताकि मरीजों का दम न घुटे। जलभराव से बचाव : बारिश या नाली का पानी बेसमेंट में न घुसे, इसके लिए ऑटोमैटिक पंपिंग सिस्टम और वाटरप्रूफिंग अनिवार्य है।
जब कोचिंग में हादसा हुआ तो सिर्फ कोचिंग नापी गई, अस्पताल की बारी कब?
जब हादसा किसी कोचिंग सेंटर में होता है, तो प्रशासन सिर्फ कोचिंग सेंटरों को नापने के लिए फीता लेकर दौड़ पड़ता है। लेकिन क्या स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील मामले में, जहाँ मरीजों की जिंदगी दांव पर लगी होती है, बेसमेंट की चेकिंग करना किसी की जिम्मेदारी नहीं है? नियमों को ताक पर रखकर मौत की इस अंडरग्राउंड सुरंग को हरी झंडी देने वाले जिम्मेदार अधिकारी आखिर कुंभकर्णी नींद में क्यों सो रहे हैं? क्या जिला प्रशासन और सीएमओ शाहजहाँपुर तब जागेंगे जब पानी सिर से ऊपर गुजर जाएगा? इस महादेव हॉस्पिटल और इसके जैसे अन्य अवैध बेसमेंट अस्पतालों पर कानूनी हथौड़ा कब चलेगा।
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आफ़वां खान उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जनपद के ब्यूरो प्रमुख हैं। इनकी पत्रकारिता के करीब हर बिन्दुओं पर गहरी पकड़ है।
