कुशीनगर को कृषि विश्वविद्यालय, अब देवरिया को राज्य विश्वविद्यालय क्यों नहीं?
मुख्यमंत्री योगी देवरिया को मानते हैं अपना ह्रदय तो यह उपेक्षा क्यों?
1954 में बाबा राघव दास की कर्मस्थली पर खड़ा हुआ शिक्षा का यह केंद्र आज भी इंतजार में; पंडित दीप नारायण मणि के अथक प्रयासों से स्थापित कॉलेज के विकास पर सवाल
देवरिया। जिस देवरिया की धरती बाबा राघव दास की कर्मस्थली रही, उसी महान संत के नाम पर वर्ष 1954 में बाबा राघव दास पीजी कॉलेज की नींव पड़ी थी। कॉलेज की स्थापना में पंडित दीप नारायण मणि के अथक प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आगरा विश्वविद्यालय से शुरू हुई संबद्धता के बाद 1958 में गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ कॉलेज उससे संबद्ध हुआ। लेकिन सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह ऐतिहासिक शिक्षण संस्थान अपने विस्तार और विश्वविद्यालय के दर्जे के लिए शासन की ओर देख रहा है।
अब देवरिया में सवाल और बड़ा हो गया है। कृषि विश्वविद्यालय की मांग यहां कोई नई मांग नहीं थी। लंबे समय से देवरिया में कृषि विश्वविद्यालय स्थापित किए जाने की आवाज उठती रही। लेकिन जब प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही के प्रयासों से कुशीनगर में कृषि विश्वविद्यालय स्थापित हो गया, तो देवरिया के इस ऐतिहासिक महाविद्यालय को राज्य विश्वविद्यालय का दर्जा देने की मांग और प्रासंगिक हो गई है। सवाल यह है कि कृषि शिक्षा की पुरानी मांग रखने वाले देवरिया को अब राज्य विश्वविद्यालय का हक कब मिलेगा?
बीआरडी पीजी कॉलेज में कृषि विषय की पढ़ाई के लिए दूसरे राज्यों तक से विद्यार्थी आते हैं। ऐसे में इसे विश्वविद्यालय के रूप में विकसित करने की संभावनाओं को लेकर छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों में उम्मीद है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत कॉलेज को राज्य विश्वविद्यालय बनाने का प्रस्ताव शासन में होने की बात भी सामने आती रही है, लेकिन जमीन पर तस्वीर अब भी इंतजार की है।
कॉलेज की जर्जर इमारतें, आधारभूत सुविधाओं की कमी और कॉलेज की भूमि पर कथित कब्जे के आरोप इस इंतजार को और गंभीर बनाते हैं। भूमि पर दबंगों और एक सपा नेता के कथित कब्जे की बात कही जा रही है। हालांकि इन आरोपों की निष्पक्ष प्रशासनिक एवं राजस्व जांच से ही वास्तविक स्थिति साफ हो सकती है।
कॉलेज के प्राचार्य डा.पीएन सिंह का कहना है कि कॉलेज के विकास और विश्वविद्यालय की मांग को आगे बढ़ाने में क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की अहम भूमिका है। उन्होंने सदर विधायक डॉ. शलभ मणि त्रिपाठी, सांसद शशांक मणि और कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही को इस दिशा में पहल करने की जरूरत बताई परन्तु इन जन प्रतिनिधियों की उपेक्षा के कारण छात्रों के मंसूबो पर पानी फिर गया है। पूर्व प्राचार्य महेंद्र विक्रम शाही भी कॉलेज की उपेक्षा के लिए पूर्व व वर्तमान जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल उठा चुके हैं।
कुशीनगर के बाद देवरिया की बारी क्यों नहीं?
जब सरकार एक जिले में कृषि विश्वविद्यालय स्थापित कर सकती है, तो 1954 से उच्च शिक्षा की अलख जगा रहे बाबा राघव दास के नाम से स्थापित इस कॉलेज को राज्य विश्वविद्यालय बनाने की पहल क्यों नहीं हो सकती? देवरिया की मांग अब सिर्फ कृषि विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रह गई है। कुशीनगर को कृषि विश्वविद्यालय मिलने के बाद देवरिया के लिए राज्य विश्वविद्यालय का रास्ता खोलने की मांग और मजबूत हो गई है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ देवरिया को अपना हृदय बताते हैं, लेकिन जिले के इस ऐतिहासिक कॉलेज की हालत और विश्वविद्यालय की लंबित मांग अब सरकार से सीधा सवाल पूछ रही है—अगर 1954 में पंडित दीप नारायण मणि जैसे लोगों के प्रयास से यहां उच्च शिक्षा की नींव रखी जा सकती थी, तो 2026 में उसी संस्थान को विश्वविद्यालय का मुकाम देने में सरकार के कदम क्यों ठिठक रहे हैं?
अब देवरिया सिर्फ आश्वासन नहीं, विश्वविद्यालय का निर्णय चाहता है।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय प्रेम शकर मणि वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में देवरिया व्यूरो के रूप में कार्यरत हैं। सटीक भाषा, तथ्यपरक संपादन और समाचारों को संतुलित रूप देने की उनकी क्षमता उनकी पहचान है।
