डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर संघर्ष समिति ने श्रद्धांजलि अर्पित की
डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों के अनुरूप बिजली के निजीकरण निर्णय को वापस लेने की मांग
लखनऊ। भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर आज विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश की ओर से प्रदेश भर में विभिन्न जनपदों में उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। संघर्ष समिति ने कहा कि डॉ. आंबेडकर का स्पष्ट मत था कि बिजली एक बुनियादी आवश्यकता है और इसे सस्ती दरों पर उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए। उन्होंने 1940 के दशक में ही “State Socialism” के तहत बिजली को सार्वजनिक क्षेत्र में रखने और राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत ग्रिड प्रणाली विकसित करने की वकालत की थी, ताकि देश का तीव्र औद्योगिक और आर्थिक विकास सुनिश्चित हो सके।
संघर्ष समिति ने कहा कि डॉ. आंबेडकर ने 1950 में संविधान बनाने के पहले इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई एक्ट 1948 बनाया जिसके तहत पूरे देश में राज्य विद्युत परिषदों का गठन किया गया और बिजली को निजी क्षेत्र से वापस लेकर सार्वजनिक क्षेत्र में रखा गया। राज्य विद्युत परिषद के माध्यम से ही गांव-गांव तक बिजली पहुंचाने का काम हुआ और आज बिजली विकास का रॉ मैटेरियल बनगया है। डॉ आंबेडकर के विचारों के अनुरूप ही देश में केंद्रीय ग्रिड प्रणाली जैसी व्यवस्थाओं की नींव रखी गई, जिसने भारत के विद्युत क्षेत्र को मजबूत आधार प्रदान किया।
संघर्ष समिति ने कहा कि अत्यंत खेद का विषय है कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण की प्रक्रिया चलाई जा रही है, जो डॉ. आंबेडकर के मूल विचारों के पूर्णतः विपरीत है। निजीकरण से बिजली महंगी होगी, सेवा की गुणवत्ता प्रभावित होगी और आम उपभोक्ता, किसान एवं छोटे उद्योगों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।
संघर्ष समिति की प्रमुख मांगें: पूर्वांचल एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण का निर्णय तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए। बिजली क्षेत्र को पूर्णतः सार्वजनिक नियंत्रण में रखते हुए एक इंटीग्रेटेड (एकीकृत) विद्युत प्रणाली स्थापित की जाए। इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई एक्ट 1948 की भावना के अनुरूप पुनः राज्य विद्युत परिषद का गठन किया जाए। डॉक्टर अंबेडकर ने निजी क्षेत्र का अधिग्रहण कर बिजली सार्वजनिक क्षेत्र में किया। यह दुर्भाग्य का विषय आज ठीक उल्टा हो रहा है ।सार्वजनिक क्षेत्र को निजी क्षेत्र को दिया जा रहा है जो अंबेडकर के विचारों के सर्वथा प्रतिकूल है।
संघर्ष समिति ने कहा कि बिजली को लाभ का साधन न बनाकर जनसेवा का माध्यम बनाया जाए, ताकि आम जनता को सस्ती एवं विश्वसनीय बिजली उपलब्ध हो सके। संघर्ष समिति ने चेतावनी दी कि यदि निजीकरण के निर्णय को वापस नहीं लिया गया, तो प्रदेश भर के विद्युत कर्मचारी एवं अभियंता लोकतांत्रिक तरीके से लगातार 502 दिन से चल रहे आंदोलन को और तेज करने के लिए बाध्य होंगे। संघर्ष समिति ने संकल्प लिया कि डॉ. आंबेडकर के सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप बिजली क्षेत्र को सार्वजनिक हित में सुरक्षित रखने के लिए हर स्तर पर प्रयास और संघर्ष जारी रहेगा।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब 03 वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट एडिटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
