प्रतापगढ़। जिला उद्यान अधिकारी सुनील कुमार शर्मा ने जनपद के किसानों को सब्जियों की फसल में लगने वाले विभिन्न हानिकारक कीटों से बचाव के लिए आवश्यक सावधानियां एवं समेकित कीट प्रबंधन के उपाय अपनाने की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि कद्दूवर्गीय फसलों जैसे लौकी, कद्दू, करेला, तोरई, खीरा, ककड़ी, खरबूजा आदि में फल मक्खी प्रमुख हानिकारक कीट है। फल मक्खी की मादा फलों की त्वचा के नीचे अंडे देती है और उनसे निकलने वाली सूंडी फल के अंदर प्रवेश कर गूदे को खाती है, जिससे फल की गुणवत्ता एवं बाजार योग्य उत्पादन प्रभावित हो सकता है। जिला उद्यान अधिकारी ने बताया कि फल मक्खी के प्रकोप की पहचान फलों की सतह के नीचे अंडे देने के स्थान पर छोटे-छोटे धब्बों अथवा छेद से की जा सकती है। प्रभावित फल समय के साथ सड़ने लगते हैं और बाजार में बिक्री योग्य नहीं रह जाते। किसानों को सलाह दी गई है कि फसल में फल लगने के समय से नियमित निरीक्षण करें तथा विशेष रूप से कोमल एवं विकसित हो रहे फलों की सतह को ध्यानपूर्वक देखें।
उन्होंने बताया कि फल मक्खी से प्रभावित, गिरे हुए एवं सड़े फलों को खेत में न छोड़ें। इन्हें नियमित रूप से एकत्र कर गहरे गड्ढे में दबाकर अथवा स्थानीय रूप से स्वीकृत सुरक्षित विधि से नष्ट करें। फसल समाप्त होने के बाद खेत की गहरी जुताई करने से मिट्टी में मौजूद फल मक्खी के प्यूपा को बाहर लाने तथा प्राकृतिक रूप से नष्ट होने में सहायता मिल सकती है।
समेकित कीट प्रबंधन के अंतर्गत फल मक्खी की निगरानी एवं नियंत्रण के लिए प्रजाति-विशिष्ट आकर्षक ट्रैप/ल्योर का प्रयोग करने की सलाह दी गई है। विभागीय सलाह के अनुसार कद्दूवर्गीय सब्जियों में फल मक्खी के यांत्रिक नियंत्रण हेतु क्यो ल्योर फेरोमोन ट्रैप 15-20 ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाने तथा नीम सीड कर्नेल स्टैªक्ट 3-5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
जिला उद्यान अधिकारी ने बताया कि बैंगन की फसल में तना एवं फल बेधक एक प्रमुख हानिकारक कीट है। प्रारम्भिक अवस्था में इसकी इल्ली कोमल तनों एवं शाखाओं में प्रवेश कर नुकसान पहुंचाती है तथा बाद में विकसित हो रहे फलों में छेद कर अंदर प्रवेश करती है। इससे फसल की वृद्धि, फल की गुणवत्ता और बाजार योग्य उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। किसानों को सलाह दी गई है कि सप्ताह में कम से कम दो बार फसल का निरीक्षण करें। जिन टहनियों के शीर्ष भाग मुरझाए हुए दिखाई दें, उन्हें काटकर खेत से बाहर निकालकर नष्ट करें। छेद वाले, क्षतिग्रस्त अथवा सड़े हुए फलों को भी नियमित रूप से तोड़कर नष्ट करना चाहिए। तना एवं फल बेधक की निगरानी के लिए फेरोमोन ट्रैप का प्रयोग किया जा सकता है। साथ ही खेत एवं मेड़ों पर अनावश्यक खरपतवार को नियंत्रित रखने तथा फसल अवशेषों को खेत में अनावश्यक रूप से न छोड़ने की सलाह दी गई है।
उन्होंने बताया कि सफेद मक्खी बैंगन, मिर्च एवं टमाटर की फसल में पत्तियों की निचली सतह पर रहकर पौधों को नुकसान पहुंचाती है। इसके प्रकोप से पत्तियों का पीला पड़ना, मुड़ना एवं सिकुड़ना, पौधों की सामान्य वृद्धि प्रभावित होना तथा अधिक प्रकोप की स्थिति में पौधों की वृद्धि रुकने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। सफेद मक्खी कुछ वायरस जनित रोगों के प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। किसानों को फसल की नियमित निगरानी करते हुए प्रारम्भिक अवस्था में ही आवश्यक नियंत्रण उपाय अपनाने की सलाह दी गई है। विभागीय निर्देश के अनुसार यांत्रिक नियंत्रण के लिए नीला चिपचिपा जाल एवं पीला चिपचिपा जाल 35-40 टैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाने तथा नीम तेल 3-5 मिलीलीटर प्रति लीटर हल्के गर्म पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
जिला उद्यान अधिकारी ने किसानों से कीटनाशकों का प्रयोग करते समय विशेष सावधानी बरतने की अपील की है। कीटनाशक की डिब्बियों को बच्चों एवं जानवरों की पहुंच से दूर रखने, छिड़काव के समय दस्ताने, मुंह का मास्क एवं आंखों पर चश्मा पहनने तथा हवा की विपरीत दिशा में खड़े होकर छिड़काव न करने की सलाह दी गई है। खाली कीटनाशक पैकेट/डिब्बों को मिट्टी में दबाकर नष्ट करने को कहा गया है। जिला उद्यान अधिकारी सुनील कुमार शर्मा ने किसानों से अपील की है कि फसल में कीट प्रकोप के प्रारम्भिक लक्षण दिखाई देते ही नियमित निगरानी करते हुए समेकित कीट प्रबंधन के उपाय अपनाएं, जिससे फसल की गुणवत्ता एवं उत्पादन को होने वाले नुकसान से बचाया जा सके।