भातखण्डे विवि में एक दिवसीय कथक का आयोजित
— रायगढ़ घराने की वरिष्ठ नृत्यांगना ने विद्यार्थियों में अपने अनुभव को किया साझा

लखनऊ। भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय में बुधवार को एक दिवसीय कथक नृत्य का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विशेषज्ञ वक्ता के रूप में डॉ. सुचित्रा हरमलकर, रायगढ़ घराने की वरिष्ठ नृत्यांगना, गुरु एवं विभागाध्यक्ष, नृत्य विभाग,महारानी लक्ष्मीबाई महिला महाविद्यालय, इंदौर उपस्थित रहीं।
डॉ. सुचित्रा हरमलकर ने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए रायगढ़ घराने के प्रवर्तक महाराजा चक्रधर सिंह की कला-साधना एवं उनके योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने “ श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् ” तथा “ स्वान्तः सुखाय ” की अवधारणा की व्याख्या करते हुए विद्यार्थियों को कला के प्रति श्रद्धा, समर्पण एवं निरंतर साधना के लिए प्रेरित किया।उन्होंने अपने कला-साधना एवं व्यक्तिगत अनुभवों को विद्यार्थियों के साथ साझा करते हुए कहा कि एक कलाकार के लिए नियमित रियाज़ के साथ-साथ खान-पान एवं दिनचर्या पर ध्यान देना भी आवश्यक है। उन्होंने कला के क्षेत्र में समर्पण, अनुशासन और निरंतरता को सफलता का मूल मंत्र बताते हुए विद्यार्थियों को निरंतर अभ्यास करने के लिए प्रेरित किया।
डॉ. हरमलकर ने कथक में प्रचलित ‘टुकड़े’ को रायगढ़ घराने की विशिष्ट शैली में ‘त्रोटक’ के रूप में समझाते हुए बताया कि रायगढ़ घराने की अनेक बंदिशों एवं बोलों में प्रकृति से प्रेरित ध्वनियों और भावों का सुंदर समावेश देखने को मिलता है। उन्होंने विद्यार्थियों को रायगढ़ घराने की इस विशिष्ट परंपरा एवं शैलीगत विशेषताओं से अवगत कराया। विश्वविद्यालय के कुलसचिव एसपी. सिंह ने कहा कि कथक जैसी समृद्ध शास्त्रीय नृत्य परंपरा को समझने के लिए केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि गुरुजनों से प्रत्यक्ष प्रशिक्षण एवं निरंतर अभ्यास भी आवश्यक है।
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