हरियाणा की तर्ज पर यूपी में भी पैरेलल लाइसेंस का करे विरोध- समिति
पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस पर समिति ने सरकार और पावर कॉरपोरेशन से की मांग
लखनऊ। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने उत्तर प्रदेश में नोएडा स्थित डेटा सेंटर पार्क के लिए निजी कंपनी को पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस दिए जाने की प्रक्रिया पर उत्तर प्रदेश सरकार और पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन से मांग की है कि वे हरियाणा सरकार की तरह व्यापक जनहित में, विशेषकर किसानों और गरीब उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए, उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग के समक्ष लिखित रूप से इसका विरोध दर्ज कराएं।
संघर्ष ने कहा कि यह इस दृष्टि से भी जरूरी है क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ग्रेटर नोएडा में निजी कंपनी का लाइसेंस रद्द कराने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा लड़ रही है जिससे स्पष्ट है कि निजी कंपनी का काम अच्छा नहीं है। ऐसे में ग्रेटर नोएडा के बगल में नोएडा में ही निजी कंपनी को लाइसेंस देने का सरकार को विरोध करना ही चाहिए। ?
ये खबर भी पढ़े : संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर भाकियू ने तहसील मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर भेजा ज्ञापनसंघर्ष समिति ने कहा कि वह स्वयं भी नियामक आयोग के समक्ष अपना सशक्त विरोध दर्ज कराएगी और प्रदेश के बड़ी संख्या में किसान एवं बिजली उपभोक्ता भी इस लाइसेंस के विरोध में अपनी आपत्तियां दाखिल करेंगे।
संघर्ष समिति ने कहा कि एक डेटा सेंटर पार्क के लिए अलग पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस देने का कोई औचित्य नहीं है। इससे सरकारी विद्युत वितरण निगम के अधिक राजस्व देने वाले उपभोक्ता धीरे-धीरे अलग होते जाएंगे, जिससे वितरण निगम की वित्तीय स्थिति कमजोर होगी और क्रॉस-सब्सिडी का आधार सिकुड़ेगा। इसका सीधा प्रभाव किसानों और गरीब उपभोक्ताओं पर पड़ेगा तथा भविष्य में उन्हें दी जाने वाली सब्सिडी को बनाए रखना भी कठिन हो सकता है।
संघर्ष समिति ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए कहा कि कर्नाटक हो, हरियाणा हो या उत्तर प्रदेश—निजी कंपनियां सरकारी विद्युत वितरण निगम के क्षेत्र में पैरेलल लाइसेंस लेने के लिए क्यों आ रही हैं? पड़ोसी प्रान्त दिल्ली में वर्ष 2002 से निजी वितरण व्यवस्था लागू है, लेकिन लगभग 24 वर्षों में किसी निजी कंपनी ने वहां पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस के लिए आवेदन नहीं किया। इसी प्रकार ओडिशा में वर्ष 1998 से निजीकरण की प्रक्रिया चल रही है और वर्ष 2020 में चारों वितरण कंपनियों का संचालन टाटा पावर को दिया गया, फिर भी वहां पैरेलल लाइसेंस की मांग क्यों नहीं हुई?
संघर्ष समिति ने कहा कि इससे स्पष्ट है कि पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस का उद्देश्य केवल बड़े और लाभकारी उपभोक्ताओं को सरकारी वितरण निगम से अलग कर धीरे-धीरे सरकारी विद्युत वितरण व्यवस्था पर निजी कंपनियों का कब्जा स्थापित करना है। यह निजीकरण की शुरुआत है।
संघर्ष समिति ने स्पष्ट चेतावनी दी कि बिजली वितरण के निजीकरण की इस कोशिश को बिजली कर्मी, किसान और आम उपभोक्ता मिलकर पुरजोर तरीके से रोकेंगे तथा व्यापक जनहित में इसके विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाकर लोकतांत्रिक संघर्ष को तेज किया जाएगा।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
