हाईकोर्ट की टिप्पणी से छिड़ी नई बहस: एक फैसला, कई सवाल और कठघरे में सिस्टम!
पुलिस की कार्यशैली पर अदालत की टिप्पणी से सियासी हलचल बढ़ी
विवेक श्रीवास्तव
- इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी ने पुलिस व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर छेड़ी नई बहस
- ट्रांसफर-पोस्टिंग से पुलिसिंग तक, उठे कई असहज सवाल
लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले ने उत्तर प्रदेश की राजनीति, पुलिस व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यसंस्कृति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। गाजियाबाद के एक परिवार के खिलाफ दर्ज गैंगस्टर एक्ट की कार्यवाही रद्द करते हुए न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने जो टिप्पणियां कीं, वे अब कानूनी दायरे से निकलकर सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी हैं।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्रदेश में कई अधिकारियों की निष्ठा संविधान के बजाय सत्ताधारी व्यवस्था के प्रति दिखाई देती है। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि ट्रांसफर-पोस्टिंग की व्यवस्था को अधिकारी अच्छी तरह समझते हैं और कई बार उसी के अनुरूप अपने व्यवहार और निर्णय तय करते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि चुनिंदा कार्रवाई, गैंगस्टर एक्ट जैसे कठोर कानूनों का इस्तेमाल और कानून के शासन को लेकर समय-समय पर न्यायालयों को हस्तक्षेप करना पड़ा है।
ये खबर भी पढ़े : "पहले दामाद, फिर पति! सास-दामाद की कथित शादी का वीडियो वायरल, लोग बोले- ये क्या हो गया?"दरअसल, पूरा मामला गाजियाबाद के एक परिवार से जुड़ा था, जिसके तीन सदस्यों पर उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एवं असामाजिक गतिविधियां (निवारण) अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि विवाद मूल रूप से दीवानी प्रकृति का था और उसे संगठित अपराध का स्वरूप देकर गैंगस्टर एक्ट लगाया गया। पर्याप्त आधार नहीं मिलने पर न्यायालय ने पूरी कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
हालांकि फैसले की सबसे बड़ी चर्चा कानूनी निष्कर्षों से ज्यादा उन टिप्पणियों को लेकर हो रही है, जिनमें अदालत ने प्रदेश की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। न्यायालय ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारी तंत्र की जवाबदेही किसी राजनीतिक दल या सरकार के प्रति नहीं, बल्कि संविधान और कानून के प्रति होनी चाहिए। यही टिप्पणी अब बहस का केंद्र बन गई है।
ये खबर भी पढ़े : जनता को मंहगाई से राहत देने की बजाय पूंजीपतियों की तिजोरी भर रही है मोदी सरकार- प्रमोद तिवारीविशेषज्ञों का मानना है कि अदालत ने जिस मुद्दे को उठाया है, वह नया नहीं है। पुलिस सुधार, राजनीतिक हस्तक्षेप, अधिकारियों की स्वतंत्रता और ट्रांसफर-पोस्टिंग की संस्कृति पर वर्षों से चर्चा होती रही है। विभिन्न आयोगों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी समय-समय पर पुलिस सुधारों की जरूरत बताई जाती रही है। लेकिन जब किसी उच्च न्यायालय के आदेश में ऐसी टिप्पणियां दर्ज होती हैं, तो उनका प्रभाव सामान्य बहस से कहीं अधिक व्यापक हो जाता है।
अदालत ने अपने आदेश में बिकरू कांड का भी उल्लेख किया और संस्थागत जवाबदेही पर चिंता व्यक्त की। न्यायालय का संकेत था कि प्रशासनिक विफलताओं पर यदि प्रभावी जवाबदेही तय नहीं होगी तो व्यवस्था में सुधार की अपेक्षा करना कठिन होगा। इस टिप्पणी को भी फैसले के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक रूप से भी यह मामला अहम माना जा रहा है। विपक्षी दल इसे सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था पर न्यायपालिका की गंभीर टिप्पणी के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि सरकार समर्थक पक्ष का तर्क है कि अदालत की टिप्पणियां एक विशेष मामले के संदर्भ में की गई हैं और उन्हें पूरे सिस्टम पर अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। इसके बावजूद यह तथ्य अपनी जगह कायम है कि फैसले ने पुलिसिंग और प्रशासनिक निष्पक्षता पर बहस को नई गति दी है।
दरअसल, इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश किसी एक सरकार या अधिकारी से जुड़ा नहीं है। अदालत ने मूल रूप से उस सिद्धांत को रेखांकित किया है जिस पर लोकतांत्रिक शासन टिका होता है...कानून का राज और संविधान सर्वोपरि। यदि किसी भी स्तर पर यह धारणा कमजोर पड़ती है कि सरकारी तंत्र की निष्ठा केवल संविधान के प्रति होनी चाहिए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
यही कारण है कि कुछ दिन पुराना होने के बावजूद यह फैसला अब भी चर्चा में है। यह केवल गैंगस्टर एक्ट के एक मामले का निर्णय नहीं, बल्कि शासन, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों पर एक बड़े विमर्श का आधार बन गया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बहस अदालत के आदेशों तक सीमित रहती है या फिर पुलिस सुधार और प्रशासनिक जवाबदेही के मुद्दों पर कोई ठोस पहल भी सामने आती है।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
