परम्परा की वेदी पर बलि चढ़ते मासूम पौधेः शादियों में मंडप के नाम पर अंधाधुंध कटान, वन विभाग बेबस

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रमेश यादव

दुद्धी (सोनभद्र)। भारत में शादियों का सीजन आते ही हर तरफ शहनाइयों की गूंज सुनाई देने लगती है। लेकिन इस मांगलिक उत्सव के पीछे पर्यावरण विनाश की एक डरावनी तस्वीर भी छिपी है। सनातन परंपरा और सगुन के नाम पर हर साल हजारों हरे-भरे और अविकसित पौधों की बेरहमी से बलि दी जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक, केवल एक जोड़े की शादी के लिए लगभग 28 छोटे-बड़े पौधों को काट दिया जाता है। शादी के मंडप और मड़वे को सजाने के लिए इन मासूम पौधों की लकड़ियों का इस्तेमाल होता है, जिसके कारण हमारा पर्यावरण लगातार खोखला हो रहा है।
परंपरा की आड़ में पर्यावरण से खिलवाड़
शादी-विवाह में मड़वा गाड़ने की रस्म बेहद पुरानी है। ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में आज भी यह मान्यता है कि मंडप के लिए जंगल से ताजी हरी लकड़ियां और महुए, सिधौत या बांस के नवजात पौधे लाना शुभ होता है। इसी अंधविश्वास और तथाकथित श्सगुनश् के फेर में लोग जंगलों का रुख करते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि मंडप बनाने के लिए उन पौधों को निशाना बनाया जाता है जो अभी पूरी तरह विकसित भी नहीं हुए हैं। जिन पौधों को बड़ा होकर विशाल पेड़ बनना था और पर्यावरण को ऑक्सीजन देनी थी, उन्हें शादी के चंद घंटों के परम्परा निर्वहन के लिए काट कर फेंक दिया जाता है।
अकेले सोनभद्र में हजारों पौधों की श्बलिश् 
सोनभद्र जिला अपनी प्राकृतिक संपदा और घने जंगलों के लिए जाना जाता है। लेकिन शादियों के सीजन में यहां के जंगलों पर चैतरफा हमला होता है। दुद्धी समेत आसपास के क्षेत्रों में हर साल हजारों शादियां होती हैं। यदि एक शादी में 28 पौधों के कटान का औसत निकाला जाए, तो केवल एक सीजन में ही लाखों अविकसित पेड़-पौधे नष्ट कर दिए जाते हैं। शादी संपन्न होने के बाद इन हरी लकड़ियों को कबाड़ या ईंधन की तरह जला दिया जाता है। यह परंपरा के नाम पर पर्यावरण के साथ किया जा रहा एक गंभीर अपराध है।
वन विभाग की लाचारी और बेबसी- 
जंगलों की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाला वन विभाग इस कुप्रथा के सामने पूरी तरह बेबस नजर आता है। अधिकारियों का कहना है कि यह मामला सीधे तौर पर लोगों की धार्मिक भावनाओं और सामाजिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। जब वन कर्मी किसी को हरी लकड़ी काटते हुए पकड़ते हैं, तो श्शादी का सगुनश् और श्मांगलिक कार्यश् का वास्ता देकर लोग विवाद करने पर उतारू हो जाते हैं। स्थानीय दबाव और लोक-लाज के कारण विभाग कड़ी कार्रवाई नहीं कर पाता, जिसका फायदा उठाकर लकड़ी माफिया और आम लोग धड़ल्ले से जंगलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
विकल्प मौजूद, बस सोच बदलने की जरूरत- 
सिविल बार एसोसिएशन दुद्धी सोनभद्र के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सत्यनारायण यादव एवं पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इस विनाश को रोकने के लिए अब कड़े कदम उठाने और जन जागरूकता फैलाने की सख्त जरूरत है। कृत्रिम और लोहे के मंडपरू आधुनिक दौर में शादियों के लिए लोहे, फाइबर या सजे-धजे टेंट के रेडीमेड मंडप आसानी से उपलब्ध हैं। इनका उपयोग बार-बार किया जा सकता है।
सूखी लकड़ियों का इस्तेमालरू
 यदि धार्मिक कारणों से लकड़ी का मंडप जरूरी ही है, तो जीवित पौधों को काटने के बजाय सूखी या गिरी हुई लकड़ियों का उपयोग किया जाना चाहिए।
‘एक शादी, पांच पौधे’ का संकल्परू
 वरिष्ठ अधिवक्ता सत्यनारायण यादव का कहना हैं कि विवाह के बंधन में बंधने वाले जोड़ों को मंडप के नाम पर पौधे काटने के बजाय, अपनी नई जिंदगी की शुरुआत पांच नए पौधे लगाकर करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर हम आज भी परंपरा के नाम पर आंखें मूंदकर प्रकृति का सीना चीरते रहे, तो आने वाली पीढ़ियों के पास सांस लेने के लिए शुद्ध हवा भी नहीं बचेगी। प्रशासन, सामाजिक संस्थाओं और जागरूक नागरिकों को आगे आकर इस कुप्रथा पर तुरंत रोक लगानी होगी, ताकि शादियों की खुशी प्रकृति के लिए मातम न बने।

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