यूपी में घुमंतू समाज को नई पहचान देगा विकास बोर्ड
शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोजगार पर जोर
लखनऊ। कभी राजाओं की सेनाओं के साथ चलने वाले, लोककला और पारंपरिक कौशल से गांव-गांव जीवन का रंग भरने वाले घुमंतू समुदाय इतिहास के लंबे दौर में धीरे-धीरे हाशिये पर चले गए।
आज वही समाज उत्तर प्रदेश में नई पहचान की दहलीज पर खड़ा दिखाई दे रहा है। योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश घुमंतू विकास बोर्ड के गठन को मंजूरी देकर एक ऐसा कदम उठाया है जिसे सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में ऐतिहासिक निर्णय माना जा रहा है।
घुमंतू जनजाति परिषद के प्रदेश संगठन मंत्री राजेश कुमार पांडेय ने हिन्दुस्थान समाचार से खास बातचीत में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभार जताते हुए कहा कि घुमंतू विकास बोर्ड केवल प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि घुमंतू एवं विमुक्त समाज को पहचान, प्रतिनिधित्व और योजनाओं से जोड़ने का माध्यम बनेगा।
बोर्ड शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, आजीविका, सामाजिक सुरक्षा, पुनर्वास और जातीय अभिलेखों की एकरूपता जैसे मुद्दों पर समन्वित कार्य करेगा।
इससे राशन कार्ड, आवास, आयुष्मान कार्ड, पेंशन, भूमि पट्टा और रोजगार योजनाओं तक पहुंच आसान होगी तथा लंबे समय से भटकते समुदायों को स्थायी पहचान और सम्मानजनक जीवन का अवसर मिलेगा।
उन्होंने बताया कि भारत में विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों की अनुमानित आबादी लगभग 10 से 12 करोड़ है। वहीं उत्तर प्रदेश में इन समुदायों की आबादी दो करोड़ है।
1857 से 2014 तक घुमंतू समाज की लंबी यात्रा
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि घुमंतू एवं विमुक्त समाज के इतिहास में कई महत्वपूर्ण पड़ाव जुड़े हैं। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संघर्ष में सक्रिय समुदायों पर दमन तेज किया।
1871 के क्रिमिनल ट्राइब एक्ट के तहत अनेक घुमंतू जातियों को क्रिमिनल ट्राइब घोषित कर सामाजिक कलंक दिया गया। स्वतंत्र भारत में डा. भीमराव अम्बेडकर ने इस अन्याय को समाप्त करने की दिशा में पहल की।
समाज प्रतिनिधियों ने बताया कि 1967 में भी जाति प्रमाणपत्र न मिलने जैसी समस्याएं बनी रहीं। स्वतंत्रता के 78 वर्षों बाद आखिरकार लंबे समय से चली आ रही मांग पूरी हुई है।
मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि 2014 में सबका साथ, सबका विकास की नीति के साथ इस समाज को योजनाओं से जोड़ने की प्रक्रिया को गति मिली।
लोक धरोहर से उपेक्षा तक की यात्रा
नट, बंजारा, सपेरा, कंजर और अन्य विमुक्त-घुमंतू समुदाय सदियों तक भारतीय लोकजीवन का जीवंत हिस्सा रहे। मेलों, उत्सवों और यात्राओं में उनकी कला, संगीत, नृत्य और पारंपरिक हुनर समाज की सांस्कृतिक धरोहर माने जाते थे।
लेकिन, समय बदला, जीवन शैली बदली और ये समुदाय स्थायी बसावट, शिक्षा और प्रशासनिक पहचान से दूर होते चले गए। कई परिवारों की पीढ़ियां बिना जमीन, बिना नियमित रोजगार और बिना सामाजिक सुरक्षा के जीवन बिताती रहीं।
नीति और समाज की साझेदारी से बदलेगी तस्वीर
अब तस्वीर बदलती दिख रही है। राज्य सरकार का नया बोर्ड शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, सामाजिक सुरक्षा, कौशल विकास और रोजगार जैसे मुद्दों पर विशेष कार्ययोजना बनाएगा। इससे उन परिवारों तक योजनाओं की पहुंच बढ़ने की उम्मीद है जो अब तक सरकारी तंत्र से पर्याप्त रूप से नहीं जुड़ पाए थे।
डेरों से डिजिटल पहचान और आत्मनिर्भरता तक
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि बोर्ड की योजनाएं प्रभावी ढंग से लागू हुईं तो आने वाले वर्षों में बड़ा बदलाव दिख सकता है। घुमंतू बच्चों की स्कूलों में नियमित उपस्थिति बढ़ेगी। युवाओं को कौशल प्रशिक्षण और स्वरोजगार के अवसर मिलेंगे।
महिलाओं के स्वयं सहायता समूह आर्थिक आत्मनिर्भरता का आधार बन सकते हैं। परिवारों को पहचान पत्र, बैंक खाते, स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ना आसान होगा। लोककला और पारंपरिक कौशल को पर्यटन और सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा सकता है।
बड़ा संदेश
घुमंतू विकास बोर्ड का गठन एक बड़ा संदेश है कि विकास तब पूर्ण होता है जब इतिहास की उपेक्षा को वर्तमान की संवेदना और भविष्य की योजना से जोड़ा जाए।
यह पहल केवल एक समुदाय की नहीं, बल्कि उस भारत की कहानी है जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सम्मान देते हुए हर नागरिक को समान अवसर देना चाहता है।
सदियों की भटकन के बाद यदि घुमंतू समाज शिक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ता है तो यह उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश के लिए सामाजिक परिवर्तन का ऐतिहासिक अध्याय साबित हो सकता है।
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लेखक के बारे में
माही खान एक उभरती हुई कंटेंट राइटर हैं और वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ से जुड़कर डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए समाचार अपडेट का कार्य कर रही हैं। वह खबरों की प्रस्तुति पर विशेष ध्यान देती हैं और मीडिया क्षेत्र में सीखते हुए अपने लेखन कौशल को लगातार विकसित कर रही हैं।
