सपा के सात बागियों में बढ़ायी भाजपा की टेंशन
टिकट को लेकर शीतयुद्ध शुरु, दिल्ली की परिक्रमा तेज
लखनऊ । चुनाव आयोग का भले ही यूपी के विधानसभा चुनाव का डंका न बजा हो लेकिन यहां पर सरगर्मियां तेज हो गयी है। वहीं माननीय बनने के लिए टिकट को लेकर जोर आजमाइश शुरु हो गयी है। इस चुनौती से न विपक्षी दल बल्कि सत्तासीन भाजपा भी हैरान है। राज्य सभा चुनाव के दौरान सपा को झटका देकर बीजेपी का दामन थामने वाले 7 'बागी' विधायकों की वजह से अब भाजपा के ही खेमे में खलबली मच गई है। यह सभी बागी नेता अपनी-अपनी सीट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते हैं। वहीं भाजपा के पुराने नेता अपना टिकट पक्का कराने के लिए दिल्ली की दौड़ लगा रहे है।
इन बागियों की सीटों को लेकर भाजपा भी हैरान है। बीजेपी इसका हल निकालने का प्रयास कर रही है। मगर यह राह इतनी आसान नहीं। जिन सीटों पर बागी दावेदार हैं, वहां बीजेपी के पुराने और वफादार नेता सालों से पसीना बहा रहे हैं। अब सवाल है कि किसे अपनाए और किसे मनाए ? अमेठी की हाई-प्रोफाइल गौरीगंज सीट पर मुकाबला बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। सपा से आये विधायक राकेश प्रताप सिंह ने राज्यसभा चुनाव में खुलकर बीजेपी का साथ दिया था। उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की है,जो साफ संकेत है कि वे बीजेपी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन बीजेपी के पूर्व प्रत्याशी चंद्र प्रकाश मिश्रा भी इसी सीट पर प्रबल दावेदार हैं। 2022 के चुनाव में चंद्र प्रकाया को राकेश प्रताप से हार का सामना करना पड़ा था। अब बीजेपी बागी राकेश प्रताप पर दांव लगाती है तो अपने पुराने नेता को कैसे मनाएंगे? पार्टी को उन्हें एमएलसी या किसी अन्य पद पर एडजस्ट करना पड़ेगा नहीं तो ब्राह्मण समीकरण गड़बड़ा सकते हैं।
साथ ही अयोध्या की गोसाईगंज सीट पर सपा के टिकट पर जीते अभय सिंह भी शाह से मुलाकात कर बीजेपी टिकट पर दावेदारी पक्की करने की कोशिश कर चुके है। लेकिन यहां बीजेपी के पूर्व विधायक इंद्र प्रताप तिवारी ऊफ खब्बू तिवारी भी जोर लगाये हैं। खब्बू तिवारी ने 2017 में बीजेपी के टिकट पर अभय सिंह को शिकस्त दी थी। कानूनी अड़चनों के कारण 2022 में उनकी पत्नी आरती तिवारी चुनाव लड़ी थीं और दूसरे स्थान पर रही थीं। मिल्कीपुर उपचुनाव में बीजेपी की शानदार जीत के पीछे खब्बू तिवारी की ब्राह्मण वोटरों में मजबूत पकड़ को बड़ा कारण माना गया है।
इसी तरह बदायूं की बिसौली सीट से सपा विधायक आशुतोष मौर्य बीजेपी का कमल थामक मैदान में उतरने को बेताब है। उनके सामने पूर्व विधायक योगेंद्र सागर के बेटे कुशाग्र सागर मजबूत चुनौतीहैं। कुशाग्र ने 2017 में बीजेपी के लिए यह सीट जीती थी और 2022 के बेहद कड़े मुकाबले में वे दूसरे नंबर पर रहे थे। बीजेपी पुराने साथी कुशाग्र पर भरोसा जताये या सपा से आए बागी आशुतोष पर दांव लगाये। कालपी सीट पर असली जंग सपा के बागी विनोद चतुवेर्दी और निषाद पार्टी बीजेपी गठबंधन के उम्मीदवार रहे छोटे सिंह के बीच फंसी है। 2022 के चुनाव में विनोद चतुवेर्दी ने छोटे सिंह को महज 2,800 वोटों के बेहद बारीक अंतर से हराया था। अब जब विनोद चतुवेर्दी खुद बीजेपी के खेमे में आ चुके हैं तो छोटे सिंह की दावेदारी और निषाद पार्टी के गठबंधन गणित को एक साथ संभालना बीजेपी के लिए अग्निपरीक्षा होगी।
जलालपुर सीट से सपा के बागी राकेश पांडे विधायक हैं। हाल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जलालपुर जनसभा में राकेश पांडे नजर नहीं आए लेकिन उनके बेटे रितेश पांडे मंच पर थे। रितेश पांडे 2017 में बीएसपी के टिकट पर विधायक रह चुके हैं और माना जा रहा है कि वे खुद या अपने पिता के लिए बीजेपी टिकट का दावा ठोक रहे हैं। दूसरी तरफ बीजेपी के टिकट पर 2022 का चुनाव लड़ चुके पूर्व सपा विधायक सुभाष चंद्र राय और 2017 में बीजेपी के प्रत्याशी रहे राजेश सिंह रेस में हैं। रायबरेली की ऊंचाहार सीट पर सपा के पूर्व कद्दावर नेता और मौजूदा मंत्री मनोज कुमार पांडे का गहरा प्रभाव माना जाता है। 2022 में उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार अमरपाल मौर्य को 6,000 से ज्यादा वोटों से शिकस्त दी थी। बीजेपी ने अमरपाल मौर्य को राज्यसभा भेज दिया है और बीजेपी ओबीसी मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया है। इससे ऊंचाहार से मनोज कुमार पांडे की राह आसान हो गई है। कौशांबी की चायल सीट पर सपा की बागी विधायक पूजा पाल की दावेदारी मजबूत है। पूजा पाल को भाजपा ने प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी दी है। प्रयागराज और कौशांबी में पूजा पाल का ओबीसी समुदाय के बीच अच्छा-खासा प्रभाव है। 2022 में उन्होंने अपना दल एस के प्रत्याशी नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल को 13,000 से अधिक वोटों से हराया था। ऐसे में बीजेपी उन्हें चुनावी मैदान में उतारकर इस पूरे रीजन में अपनी पकड़ और पुख्ता करना चाहेगी।
इस तरह सपा से आए इन बागियों ने बीजेपी के कुनबे को मजबूती तो दी है, लेकिन ऐन चुनाव के वक्त यही बागी नेता पार्टी के लिए गले की फांस बनते दिख रहे हैं। एक तरफ वे बागी नेता हैं जिन्होंने अहम मौकों पर बीजेपी की मदद की है, तो दूसरी तरफ वे पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ता हैं जो पिछले 5 सालों से अपनी सीटों पर पसीना बहा रहे हैं बीजेपी बागियों को टिकट देती है तो पुराने में भारी असंतोष और बगावत का खतरा है। बागियों को टिकट नहीं मिलता, तो उनका भरोसा टूट जायेगा। बीजेपी हाईकमान को बागियों एवं पुराने नेताओं के बीच चल रहे टिकट युद्ध का हल निकालना किसी चुनौती से कम नहीं है।
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लेखक के बारे में
राजेश कुमार सिंह को पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 26 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बीएससी, एलएलबी और मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। वर्तमान में वह हिंदी दैनिक ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं। राजनीतिक, प्रशासनिक और शासन से जुड़े विषयों पर उनकी गहरी समझ है।
