सपनों की इमारत बनी मौत का मंजर: अलीगंज अग्निकांड में 15 छात्रों की दर्दनाक मौत, चीखों और धुएं में बुझ गईं जिंदगियां
मंजर देखने के बाद लोगों को कांप उठा कलेजा, अब सिस्टम की बड़ी परीक्षा
लखनऊ। यह सिर्फ एक हादसा नहीं था, यह एक ऐसा मंजर था जिसने राजधानी लखनऊ की रफ्तार को कुछ घंटों के लिए रोक दिया और कई घरों की दुनिया हमेशा के लिए उजाड़ दी। अलीगंज के सेक्टर-डी में स्थित एक तीन मंजिला इमारत, जहां रोज़ाना कोचिंग की आवाजें, कंप्यूटर लैब की हलचल और एनीमेशन क्लासेज की रौनक गूंजती थी, वह सोमवार को कुछ ही मिनटों में आग और चीखों के बीच मौत के सन्नाटे में बदल गई।

दोपहर करीब ढाई बजे का वक्त था। इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित पेट शॉप और उसके वेयरहाउस में अचानक धुआं उठना शुरू हुआ। किसी को समझने का मौका नहीं मिला कि यह धुआं सामान्य नहीं था। कुछ ही मिनटों में यह धुआं आग की लपटों में बदल गया और फिर वह लपटें इतनी तेज़ी से ऊपर की मंजिलों तक पहुंचीं कि पूरे भवन को अपनी गिरफ्त में ले लिया। दूसरी और तीसरी मंजिल पर चल रहे 3D एनीमेशन सेंटर और कोचिंग क्लास में उस समय दर्जनों छात्र-छात्राएं अपने भविष्य को संवारने में जुटे थे।लेकिन उन्हें नहीं पता था कि कुछ ही पलों में यह इमारत उनका अंतिम ठिकाना बन जाएगी।
आग का फैलना और फंसी हुई जिंदगियां
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आग इतनी तेजी से फैली कि किसी को बाहर निकलने का समय ही नहीं मिला। इमारत के अंदर धुआं भर गया और सांस लेना मुश्किल हो गया। कई छात्र-छात्राएं सीढ़ियों की ओर दौड़े, लेकिन वहां तक पहुंचना भी मुश्किल हो गया था। कुछ ने खिड़कियों की ओर रुख किया, लेकिन आग की लपटें वहां तक पहुंच चुकी थीं।कई छात्रों ने जान बचाने के लिए इमारत से नीचे छलांग लगा दी। यह दृश्य इतना भयावह था कि आसपास मौजूद लोग भी कुछ पल के लिए सन्न रह गए। कुछ लोग मौके पर घायल होकर गिर पड़े। कुछ ने अंदर फंसे अपने दोस्तों को आवाज लगाई, लेकिन आग की गूंज में वह आवाजें दब गईं।

रेस्क्यू ऑपरेशन: देर से शुरू हुई जंग
घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय लोगों ने दमकल विभाग को फोन किया, लेकिन आरोप है कि मदद पहुंचने में काफी देर लग गई। करीब 40 मिनट बाद पहली फायर ब्रिगेड मौके पर पहुंची, तब तक आग विकराल रूप ले चुकी थी। एक-एक कर इमारत की सभी मंजिलें आग से घिर चुकी थीं।पुलिस, दमकल और एसडीआरएफ की टीमों ने तुरंत रेस्क्यू शुरू किया, लेकिन हालात इतने भयावह थे कि अंदर जाना आसान नहीं था। धुआं, आग और गिरते मलबे ने राहत कार्य को बेहद कठिन बना दिया। हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म की मदद से लोगों को निकालने की कोशिश की गई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद जब आग पर काबू पाया गया, तब तक 15 जिंदगियां इस इमारत में हमेशा के लिए खामोश हो चुकी थीं।

वो चेहरे जो अब सिर्फ याद रह गए
मलबे से जब एक-एक कर शव बाहर निकाले गए तो हर किसी की आंखें नम थीं। किसी की उम्र 18 साल थी, किसी की 27। कोई अपने माता-पिता का इकलौता सहारा था, तो कोई अपने परिवार की उम्मीदों का केंद्र।इन मृतकों में लखनऊ, सीतापुर, बाराबंकी, कानपुर और अन्य जिलों के युवा शामिल थे, जो अपने सपनों को पंख देने इस शहर में आए थे। कोई कोचिंग कर रहा था, कोई एनिमेशन सीख रहा था, तो कोई गेमिंग डिजाइन में अपना भविष्य तलाश रहा था।अब वे सभी सिर्फ नाम बनकर रह गए हैं—सुखमनी (24), लखनऊ, आदित्य श्रीवास्तव (24), बिसवां, सीतापुर, मोहम्मद अम्मार (24) लेखपड़ा बाग, बाराबंकी, नीलेश (27), निवासी हजरतगंज, लखनऊ, अब्दुल रहमान (24), बिसवां, सीतापुर, संयम विज (27) कानपुर, शहजान सिद्दीकी (18) बीकेटी, लखनऊ, अनुक्षा (24), अवध शिल्पग्राम शांतिनगर, सागर (28), लखनऊ
ज्योति (26), निवासी ज्ञान विहार कॉलोनी कमता लखनऊ , जैनिल (26), अनूपपुर भालुमुड़ा मध्य प्रदेश , सौमाल्या (24), निवासी द्वारिका नगर नमखाना साउथ , भविष्य (23), निवासी अलीगंज ,सूरज सिंह (27), निवासी गोविंद नगर कानपुर , अनामिका। अब इनके घरों में अब सिर्फ सन्नाटा है। फोन लगातार बज रहे हैं, लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं है। ये गंभीर रूप से जयंत, लवप्रीत, मो. आसिफ, भुवन श्रीवास्तव, पंकज, शैलेंद्र, अभिषेक, पंकज जोशी, गौरव कुमार है, जिनका उपचार चल रहा है।
प्रशासन की दौड़ और जिम्मेदारी का सवाल
हादसे की सूचना मिलते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने कार्यक्रम को बीच में छोड़कर लखनऊ लौट आए। उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया और राहत कार्यों की समीक्षा की। इसके बाद वे सीधे केजीएमयू पहुंचे, जहां घायलों का इलाज चल रहा था।रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी दिल्ली से लखनऊ पहुंचे और घायलों से मुलाकात की। अस्पताल में उन्होंने परिजनों से बात की और भरोसा दिलाया कि सरकार हर संभव मदद करेगी।मुख्यमंत्री ने इस पूरे मामले में उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए और विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया, जिसे सात दिनों में रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। साथ ही चार अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।

गिरफ्तारी और कार्रवाई
पुलिस ने इस मामले में तेजी दिखाते हुए बिल्डिंग मालिक, कोचिंग और पेट शॉप संचालक सहित चार लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। एफआईआर में छह लोगों को नामजद किया गया है, जबकि दो अन्य आरोपी अभी फरार हैं।यह भी सामने आया है कि इमारत में सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई थी। फायर सेफ्टी सिस्टम, आपातकालीन निकास और अन्य सुरक्षा व्यवस्थाएं या तो अनुपस्थित थीं या निष्क्रिय थीं।
देरी जिसने बढ़ा दिया दर्द
स्थानीय लोगों का आरोप है कि अगर दमकल समय पर पहुंच जाती तो शायद कुछ जिंदगियां बच सकती थीं। आग लगने के बाद 40 मिनट की देरी ने हालात को और भयावह बना दिया। एंबुलेंस सेवाओं में भी देरी और आपसी समन्वय की कमी ने राहत कार्य को प्रभावित किया।लोगों का कहना है कि यह सिर्फ आग नहीं थी, बल्कि सिस्टम की एक बड़ी परीक्षा थी, जिसमें कई स्तरों पर विफलता सामने आई।

पोस्टमार्टम और अंतिम विदाई
अब तक 13 शवों का पोस्टमार्टम किया जा चुका है, जिनमें से कई को परिजनों को सौंप दिया गया है। हर शव के साथ एक कहानी खत्म हो रही है, और हर घर में एक सपना टूट रहा है।अस्पतालों और शवगृहों के बाहर परिजनों की चीखें और आंसू इस हादसे की सबसे दर्दनाक तस्वीर बन चुके हैं।

एक सवाल जो रह गया है
इस पूरे हादसे ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या हमारी इमारतें सुरक्षित हैं? क्या नियम सिर्फ कागजों पर हैं? और क्या समय पर प्रतिक्रिया किसी भी बड़ी त्रासदी को रोक सकती थी?आज अलीगंज की वह इमारत सिर्फ एक ढांचा नहीं रही, वह 15 अधूरी कहानियों का स्मारक बन गई है।उन छात्रों के सपने, उनकी किताबें, उनके बैग, उनके परिवारों की उम्मीदें—सब कुछ उस आग में जल गया जिसने कुछ ही मिनटों में एक पूरे शहर को झकझोर दिया।और अब रह गई है सिर्फ एक चुप्पी… जो शायद लंबे समय तक जवाब ढूंढती रहेगी।
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लेखक के बारे में
पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।
