TMC का नाम-निशान फ्रीज, दोनों गुटों को झटका

उपचुनाव से पहले चुनाव आयोग का अंतरिम फैसला, ममता और अरूप रॉय गुट नए नाम-चिह्न के साथ उतरेंगे

Published By Shishir Patel
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नई दिल्ली । इस साल बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है। पहले सत्ता हाथ से निकली, उसके बाद पार्टी में टूट और विधायक-सांसदों के बंटवारे के बाद अब ‘नाम और निशान’ भी फिलहाल छिन गई है। अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (एआईटीएमसी) पर दावे को लेकर जारी विवाद के बीच चुनाव आयोग ने बड़ा अंतरिम फैसला सुनाते हुए पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह दोनों को फ्रीज कर दिया है। 

भारत निर्वाचन आयोग एआईटीएमसी के नाम और उसके आधिकारिक चुनाव चिह्न ‘फूल और घास’ के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी। आयोग ने अपने अंतरिम आदेश में साफ किया कि ममता बनर्जी और अरूप रॉय के नेतृत्व वाले दोनों ही गुट आगामी उपचुनावों में मूल पार्टी के नाम और निशान का उपयोग नहीं कर सकेंगे। चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को 18 सितंबर 2026 की सुबह 11 बजे तक अपनी प्राथमिकता के आधार पर तीन नए नामों और तीन फ्री सिंबल्स के विकल्प पेश करने का निर्देश जारी किया है।

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बता दें कि तृणमूल कांग्रेस के दो प्रतिद्वंद्वी गुट आमने-सामने हैं। इसमें एक गुट की कमान पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हाथ में है। वहीं दूसरे गुट का नेतृत्व अरूप रॉय कर रहे हैं। दोनों ही खेमे खुद को असली और वैध तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं। अब चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि दोनों गुट अपने-अपने लिए अलग नाम चुन सकते हैं। यदि वे चाहें तो अपने नाम के साथ मूल पार्टी 'एआईटीएमसी' से संबंध का जिक्र भी कर सकते हैं। साथ ही दोनों गुटों को चुनाव आयोग की ओर से अधिसूचित मुक्त चुनाव चिन्हों (फ्री सिंबल्स) की सूची में से अलग-अलग चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाएंगे।

आगामी उपचुनावों में दोनों गुट दिखेंगे दो नए नाम और निशान

तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह पर अधिकार को लेकर दोनों गुटों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है। दोनों पक्ष खुद को पार्टी का वास्तविक प्रतिनिधि बता रहे हैं और पार्टी के संगठन तथा चुनाव चिन्ह पर दावा कर रहे हैं। चुनाव आयोग के इस फैसले के बाद अब आगामी उपचुनावों में दोनों गुट अलग-अलग नाम और अलग-अलग चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरेंगे। फिलहाल आयोग के फैसले के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि दोनों गुट नए नाम और चुनाव चिन्ह के रूप में क्या विकल्प चुनते हैं?

1998 से शुरू हुआ तृणमूल कांग्रेस का सफर

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस का सफर 1998 से शुरू हुआ था। कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनाई। पार्टी को उसका नाम और चुनाव चिन्ह मिला और उसी साल लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस पहली बार मैदान में उतरी। करीब तीन दशक तक बंगाल के मतदाताओं ने तृणमूल को इसी नाम और इसी निशान के साथ देखा। चुनावी पोस्टर से लेकर ईवीएम तक यही पहचान पार्टी और उसके उम्मीदवारों को बाकी दलों से अलग करती रही। लेकिन आज 2026 में उसी मूल नाम और निशान के साथ चुनाव लड़ने की स्थिति फिलहाल नहीं है।

 

 

लेखक के बारे में

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पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।

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