झीरम घाटी कांड में आत्मसमर्पित नक्सलियों पर उठे सवाल, HC जाएगा मामला

दोबारा जांच की मांग

Published By Mahi Khan
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जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में एनआईए की विशेष न्यायालय के फैसले के बाद सर्व आदिवासी समाज ने प्रभावित परिवारों के साथ बैठक कर फैसले पर असंतोष जताया है।

समाज के पदाधिकारियों का कहना है कि मामले में गिरफ्तार और सजा पाए कुछ लोग निर्दोष हैं तथा कई आरोपित नक्सली आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौट चुके हैं, इसके बावजूद उन्हें न्यायालय के फैसले में फरार बताया गया है।

समाज ने झीरम घाटी कांड की पूरी साजिश और इसमें शामिल लोगों की भूमिका की दोबारा जांच की मांग की है। साथ ही फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने और कानूनी लड़ाई के लिए समाज के स्तर पर आर्थिक सहयोग जुटाने का निर्णय लिया गया है।

दरअसल, छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में एनआईए की विशेष न्यायालय ने कुल 39 लोगों को आरोपित बनाया है।

इनमें एक आरोपित की मौत हो चुकी है, जबकि 10 आरोपितों को अदालत ने मौत की सजा सुनाई है। 16 सितंबर 2026 को सुनाए गए फैसले में 27 नक्सलियों का भी उल्लेख किया गया है, जिन्हें फरार बताया गया है।

आत्मसमर्पण कर चुके 14 आरोपित भी फरार बताए गए
न्यायालय के फैसले में उन नक्सलियों का भी उल्लेख किया गया है, जिन्होंने आत्मसमर्पण किया है या जो मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं। मामले में फरार घोषित किए गए 27 आरोपितों की वर्तमान स्थिति में बदलाव हो चुका है।

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इनमें से 14 आरोपित आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौट चुके हैं, जबकि नौ की मुठभेड़ में मौत हो चुकी है। इस तरह वर्तमान में चार आरोपित ऐसे बताए जा रहे हैं, जिनकी तलाश जारी है।

इसके बावजूद आत्मसमर्पण कर चुके 14 आरोपितों को भी एनआईए विशेष न्यायालय के फैसले में फरार बताया गया है।

27 फरार आरोपितों में कई नाम शामिल
झीरम घाटी मामले में एनआईए न्यायालय द्वारा फरार घोषित किए गए 27 आरोपितों में सोमा सोढ़ी उर्फ सुरेन्द्र उर्फ सुरिन्दर, बारसे सुक्का उर्फ देवा उर्फ देवन्ना, सप्पो हुंगा उर्फ विनोद, कुम्मे मोडियाम.

पाका हनुमंथ उर्फ गणेश उईके, वैुगुला अरूणा उर्फ माधवी उर्फ माधवक्का, मोडियम रमेश उर्फ लच्छु, तेलाम आयतु उर्फ आयतु डोड़ी, गीता पुनेम उर्फ गीता पोटाम, मंगली कोसा, मड्डा मड़ाकामी, सन्नु वेट्टी.

भगत हेमला उर्फ बदरू, कामेश कवासी, कोरसा सन्नी उर्फ सन्नी कोरसाम, कोरसा सन्नु, सोमी पोट्टाम उर्फ सोनी पोट्टाम, कुरसाम सन्नी उर्फ कोसी उर्फ लच्छी, लक्खू पुनेम उर्फ गंगा पुनेम, कोरसा लक्खू, बदरू मोडियाम उर्फ मंगतु.

सरिता काकेम उर्फ मिटकी, कुम्मा गोंदे उर्फ गुड्डु, हेमला मासा उर्फ संजय कवासी, बदरू उर्फ सुखराम उर्फ गद्दाम बदरू, जयलाल मंडावी और शीर्ष नक्सली कैडर तिप्पीरी तिरूपति उर्फ देवजी शामिल हैं।

नौ आरोपितों की मुठभेड़ में हो चुकी है मौत
फरार घोषित 27 आरोपितों में से नौ की मुठभेड़ में मौत हो चुकी है।

इनमें पाका हनुमंथ उर्फ गणेश उईके, जिसे सेंट्रल कमेटी सदस्य और ओडिशा स्टेट कमेटी सचिव बताया गया है, सोमा सोढ़ी उर्फ सुरेन्द्र, सप्पो हुंगा उर्फ विनोद, जयलाल मंडावी, कुम्मे मोडियाम, मोडियम रमेश उर्फ लच्छु, तेलाम आयतु, गीता पुनेम और मंगली कोसा के नाम शामिल हैं।

बचाव पक्ष ने कहा- आत्मसमर्पण करने वालों को अदालत में पेश किया जाना चाहिए था
झीरम घाटी हमले मामले में बचाव पक्ष के अधिवक्ता अरविंद चौधरी ने शनिवार को कहा कि मामले में पहले नौ लोगों को पकड़ा गया था।

इसके बाद दो अन्य लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनके नाम एफआईआर में नहीं थे और उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया।

उन्होंने कहा कि, झीरम घाटी मामले में आरोपित बनाए गए कई नक्सली बाद में आत्मसमर्पण कर चुके हैं। ऐसे लोगों को न्यायालय में पेश किया जाना चाहिए था। उन्हें फरार घोषित कर सुनाया गया फैसला उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी।

सर्व आदिवासी समाज बोला- फैसले से संतुष्ट नहीं
सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने आज शनिवार को बयान जारी कर बताया कि, प्रभावित परिवारों के साथ बैठक की गई है।

उन्होंने कहा कि झीरम हत्याकांड मामले में एनआईए द्वारा सुनाए गए फैसले से समाज संतुष्ट नहीं है। समाज का कहना है कि निर्दोष लोगों को गिरफ्तार कर जेल में बंद किया गया और वे घटना में शामिल नहीं थे।

प्रकाश ठाकुर ने बताया कि, झीरम घाटी मामले में एनआईए विशेष न्यायालय के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी। इसके लिए समाज के स्तर पर आर्थिक सहयोग जुटाया जाएगा।

उन्होंने कहा कि बैठक में झीरम घाटी कांड की पूरी साजिश और इसमें शामिल लोगों की भूमिका की दोबारा जांच की मांग उठाई गई है।

संदिग्ध भूमिका वाले लोगों की निष्पक्ष जांच की मांग
सर्व आदिवासी समाज के पदाधिकारियों ने कहा कि, मामले में जिन लोगों की भूमिका संदिग्ध रही है, उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। इसके साथ ही आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों की भूमिका की भी दोबारा जांच किए जाने की मांग की गई है।

सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष गंगा नाग ने शनिवार को कहा कि, प्रभावित परिवारों से चर्चा के बाद समाज को लगा कि सजा पाए लोग निर्दोष हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि घटना के पीछे जिन लोगों को वास्तविक रूप से जिम्मेदार माना जा रहा है, उनमें से कुछ आज सामान्य जीवन जी रहे हैं। इसी को लेकर समाज ने प्रभावित परिवारों के साथ मिलकर कानूनी लड़ाई लड़ने का निर्णय लिया है।

अब उच्च न्यायालय में कानूनी लड़ाई की तैयारी
शुक्रवार 18 सितंबर 2016 को बैठक के बाद सर्व आदिवासी समाज ने स्पष्ट किया है कि झीरम घाटी मामले में न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया जाएगा।

समाज का कहना है कि मामले में आत्मसमर्पण कर चुके आरोपितों की स्थिति और घटना में उनकी कथित भूमिका समेत पूरे मामले की दोबारा जांच जरूरी है। इसके लिए समाज प्रभावित परिवारों के साथ खड़ा रहेगा और कानूनी लड़ाई में सहयोग जुटाएगा।

 

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माही खान एक उभरती हुई कंटेंट राइटर हैं और वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ से जुड़कर डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए समाचार अपडेट का कार्य कर रही हैं। वह खबरों की प्रस्तुति पर विशेष ध्यान देती हैं और मीडिया क्षेत्र में सीखते हुए अपने लेखन कौशल को लगातार विकसित कर रही हैं।

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