एनसीआरबी रिपोर्ट: सलाखों के पीछे मौतें, सवालों के घेरे में सिस्टम
एनसीआरबी की रिपोर्ट ने इलाज, जवाबदेही और न्यायिक निगरानी पर खड़े किए गंभीर सवाल
नीरज अवस्थी
- 2024 में देशभर की जेल में हुई 1,960 मौतें, इनमें 1,737 को बताया गया स्वाभाविक
- डॉक्टरों की कमी, भीड़भाड़ और जांच में ढिलाई पर उठे गंभीर प्रश्न
- विशेषज्ञ बोले-विरासत में मौत की हर घटना की निष्पक्ष न्यायिक जांच हो अनिवार्य
नई दिल्ली। देश की जेलों में होने वाली मौतों को लेकर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2024 की रिपोर्ट ने एक असहज बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में भारतीय जेलों में 1,960 बंदियों की मौत हुई। इनमें से 1,737 मौतों को 'स्वाभाविक' माना गया, जबकि केवल 166 मौतें अस्वाभाविक श्रेणी में दर्ज हुईं। सवाल यह है कि क्या हर वह मौत, जो बीमारी के दौरान हुई, वास्तव में स्वाभाविक थी या फिर इलाज में देरी, चिकित्सा सुविधाओं की कमी और प्रशासनिक लापरवाही भी उसकी वजह बनी?
यह बहस इसलिए तेज हुई है क्योंकि हाल के महीनों में कर्नाटक की जेल में बंद सादिक बाशा और अब्दुल खादर जैसे मामलों ने व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। दोनों गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। परिजनों और वकीलों का आरोप है कि बेहतर इलाज और स्वास्थ्य आधार पर अंतरिम जमानत की मांग के बावजूद उन्हें पर्याप्त राहत नहीं मिली। अब आशंका जताई जा रही है कि उनकी मौत भी सरकारी रिकॉर्ड में सामान्य बीमारी से हुई मौत मानकर दर्ज कर दी जाएगी।
एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार प्राकृतिक मौतों में सबसे अधिक मामले हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारी, किडनी और लीवर संबंधी रोग, कैंसर, टीबी तथा अन्य बीमारियों से जुड़े हैं। रिपोर्ट में 35 मौतें नशा या शराब छोड़ने से उत्पन्न स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भी दर्ज हैं। हालांकि रिपोर्ट यह नहीं बताती कि इन कैदियों को समय पर विशेषज्ञ इलाज मिला था या नहीं। यही सबसे बड़ा सवाल है, क्योंकि कई बीमारियां समय रहते उपचार मिलने पर जानलेवा नहीं होतीं।देश की जेलों की स्वास्थ्य व्यवस्था भी चिंता बढ़ाती है।
मेडिकल स्टाफ के 3,827 स्वीकृत पदों में से केवल 2,049 पद ही भरे हुए हैं। कई राज्यों में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी है। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में एक डॉक्टर या मेडिकल कर्मचारी पर सैकड़ों कैदियों की जिम्मेदारी है। ऐसे में गंभीर मरीजों तक समय पर उपचार पहुंचाना मुश्किल हो जाता है।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब जेलों में क्षमता से कहीं अधिक कैदी बंद हों। देश की जेलों का औसत ऑक्यूपेंसी स्तर 112 प्रतिशत है, जबकि कई राज्यों में यह 150 प्रतिशत से भी अधिक है। भीड़भाड़ का सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं और निगरानी व्यवस्था पर पड़ता है। कानून के अनुसार हिरासत में होने वाली प्रत्येक मौत की न्यायिक मजिस्ट्रेट से जांच अनिवार्य है, लेकिन मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि कई राज्यों में यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। यदि हर मौत की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच नहीं होगी, तो यह तय करना मुश्किल होगा कि मौत बीमारी से हुई या इलाज में हुई चूक से।
विशेषज्ञों का मानना है कि जेल में बंद व्यक्ति भी संविधान के तहत जीवन और स्वास्थ्य का समान अधिकार रखता है। ऐसे में मौतों का केवल आंकड़ा दर्ज कर देना पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि हर संदिग्ध मौत की पारदर्शी जांच हो, जेलों में चिकित्सा ढांचा मजबूत किया जाए और अदालतें गंभीर रूप से बीमार बंदियों के मामलों में संवेदनशीलता के साथ निर्णय लें। तभी यह भरोसा कायम हो सकेगा कि जेल की सलाखों के पीछे किसी की जान केवल व्यवस्था की खामियों की भेंट नहीं चढ़ रही है।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
