जेपीसी का ब्लूप्रिंट तैयार, दो चरणों में लागू होगी एक देश-एक चुनाव व्यवस्था! 

2029 से शुरू होगी नई चुनावी व्यवस्था, विधानसभाओं का कार्यकाल बड़े पैमाने पर घटाने-बढ़ाने से बचने की कोशिश

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प्रतिभा सिन्हा 

  • 2029 में लोकसभा के साथ करीब 20 राज्यों के चुनाव कराने की तैयारी

नई दिल्ली। देश की चुनावी व्यवस्था में आजादी के बाद के सबसे बड़े सुधार की दिशा में केंद्र सरकार ने अपनी रणनीति को नया आकार देना शुरू कर दिया है। ‘एक देश-एक चुनाव’ की अवधारणा को व्यवहारिक धरातल पर उतारने के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) अब ऐसे संक्रमणकालीन मॉडल पर काम कर रही है, जिसके जरिए पूरे देश को बिना किसी बड़े राजनीतिक या संवैधानिक टकराव के साझा चुनावी चक्र में शामिल किया जा सके। 

सूत्रों के अनुसार समिति का झुकाव दो चरणों वाले ऐसे मॉडल की ओर है, जो राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल में बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप किए बिना इस महत्वाकांक्षी योजना को लागू करने का रास्ता खोल सकता है। जानकारी के मुताबिक जेपीसी ने जिस प्रारूप पर गंभीर मंथन शुरू किया है, उसे ‘टू-फेज ट्रांजिशन मॉडल’ का नाम दिया गया है। इस मॉडल का मूल उद्देश्य चुनावी कैलेंडर को व्यवस्थित करना है ताकि देश को हर कुछ महीनों में किसी न किसी चुनावी प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़े। लगातार चुनावों के कारण प्रशासनिक मशीनरी, सुरक्षा बलों और सरकारी योजनाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करना भी इस पहल का प्रमुख लक्ष्य माना जा रहा है।

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समिति की अवधि मानसून सत्र 2026 तक बढ़ाए जाने के बाद अब रिपोर्ट को अंतिम रूप देने का काम तेज हो गया है। उम्मीद है कि मानसून सत्र के अंतिम चरण में जेपीसी अपनी सिफारिशें संसद के समक्ष रखेगी। रिपोर्ट में चुनावी चक्र के पुनर्गठन, संवैधानिक संशोधनों और राज्यों के कार्यकाल के सीमित समायोजन से जुड़े विस्तृत सुझाव शामिल हो सकते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सरकार इस मुद्दे पर व्यापक सहमति बनाकर आगे बढ़ना चाहती है ताकि सुधार प्रक्रिया विवाद के बजाय सहमति का विषय बने। प्रस्तावित योजना के अनुसार पहला चरण वर्ष 2029 में लागू किया जा सकता है। उस समय होने वाले लोकसभा चुनावों के साथ देश के लगभग 20 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव भी कराए जाने का प्रस्ताव है। इसके लिए कुछ राज्यों के कार्यकाल में सीमित वृद्धि या कमी की जा सकती है, लेकिन प्रयास यही रहेगा कि किसी राज्य की लोकतांत्रिक अवधि पर बड़ा असर न पड़े। यही वजह है कि इस मॉडल को ‘सुरक्षित संक्रमण’ का नाम भी दिया जा रहा है।

दूसरे चरण में शेष राज्यों को वर्ष 2034 तक इस चुनावी चक्र में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। यदि यह प्रक्रिया सफल रहती है तो देश में लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव लगभग एक साथ कराए जा सकेंगे। इससे चुनावी खर्च में कमी, प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग और नीति निर्माण में निरंतरता जैसे कई लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है।  

भारत में शुरुआती दशकों में लोकसभा और राज्यों के चुनाव एक साथ ही होते थे। वर्ष 1967 के बाद राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता, सरकारों के समयपूर्व पतन और बाद में लोकसभा के समय से पहले भंग होने जैसी घटनाओं ने इस चुनावी तालमेल को तोड़ दिया। इसके बाद देश स्थायी रूप से अलग-अलग चुनावी चक्रों में बंट गया। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाले उच्चस्तरीय पैनल ने भी अपने व्यापक अध्ययन में चुनावों के समन्वय को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए लाभकारी बताया था।
 
संवैधानिक विशेषज्ञों का मत है कि संविधान के दायरे में रहते हुए चरणबद्ध क्रियान्वयन का रास्ता निकाला जा सकता है। अब निगाहें जेपीसी की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं। संसद में रिपोर्ट पेश होने के बाद इस पर व्यापक बहस होगी और राजनीतिक दलों का रुख तय करेगा कि देश चुनावी इतिहास के इस बड़े बदलाव की ओर कितनी तेजी से बढ़ता है। यदि सहमति का रास्ता बनता है तो वर्ष 2034 भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नए चुनावी युग की शुरूआत का प्रतीक बन सकता है।

लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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