पश्चिम बंगाल पर टिकी सबकी निगाहें, आखिर क्यों रहा चर्चा में है ये राज्य
नई दिल्ली। आज चार राज्यों- तमिलनाडु, असम, केरल, पश्चिम बंगाल और केंद्र शासित पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे आने वाले हैं। हर जगह का चुनाव उतना ही अहम है, जितना दूसरे का, इसके बावजूद सभी की नजरें पश्चिम बंगाल पर हैं, तो इसका कारण है कि सबसे ज्यादा यही राज्य सुर्खियों में रहा है। और इसकी ज्यादातर वजह तनाव, टकराव और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हैं।
हर कदम टकराव:
पश्चिम बंगाल में इस बार ऐतिहासिक मतदान हुआ, लेकिन इसके साथ विवाद भी ऐतिहासिक हुए, जो अभी तक जारी हैं। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन से लेकर चुनाव कर्मियों की तैनाती तक, हर कदम पर टकराव देखने को मिला। कई जगह TMC और चुनाव आयोग आमने-सामने आए। मतगणना कर्मचारियों की नियुक्ति से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। इसके पहले भी शीर्ष अदालत को कुछ बातों को लेकर दखल देना पड़ा। चुनावी प्रक्रिया के दौरान किसी दल और चुनाव आयोग के बीच ऐसा अविश्वास ठीक नहीं है।
हिंसा का इतिहास:
इस बार राज्य में चुनाव के दौरान हिंसा और गड़बड़ियों की छिटपुट शिकायतें मिलीं। आयोग ने दो चरणों के लिए केंद्रीय बलों की 24 सौ कंपनियां तैनात की थीं। इसके चलते पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार कुछ शांति रही, पर राज्य में चुनाव परिणाम के बाद भी हिंसा का पुराना इतिहास है। 2021 के विधानसभा चुनाव बाद हत्या, आगजनी, तोड़फोड़ और डराने-धमकाने के सैकड़ों मामले सामने आए थे। तमाम जगह राजनीतिक बदले की भावना से हिंसा हुई। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 1900 से ज्यादा मामलों की जांच की थी और स्थानीय पुलिस-प्रशासन पर गंभीर सवाल उठाए थे।
पुलिस-प्रशासनिक लापरवाही:
आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, कई जगह पुलिस ने लापरवाही बरती और शिकायतें दर्ज नहीं की गईं। कमोबेश ऐसी ही स्थिति लोकसभा और पंचायत चुनावों के दौरान व बाद में भी रही है। 2023 के पंचायत इलेक्शन को बंगाल के सबसे हिंसक चुनावों में एक माना जाता है। चुनाव बाद हिंसा की इसी आशंका को देखते हुए आयोग ने तय किया है कि केंद्रीय बलों की 700 कंपनियां बाद में भी तैनात रहेंगी।
आयोग की जिम्मेदारी:
सुरक्षाबलों की मौजूदगी आम जनता में भरोसा जगाती है, लेकिन असली शांति तभी संभव है जब सभी पक्ष इसके लिए प्रयास करें। बंगाल को राजनीतिक हिंसा के इतिहास से बाहर निकलना होगा। चुनाव परिणाम जो भी हो, उसे सभी को स्वीकार करना चाहिए। चुनावी प्रक्रिया और परिणाम पर भरोसा बहाल करने की जिम्मेदारी आयोग पर भी है।
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