व्यंग्य: जुगाड़ के अस्तबल में रेशमी गधे
डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'
वह जो नुक्कड़ वाले शर्मा जी हैं न, उनके चेहरे पर कल सुबह से एक अजीब सी रूहानी चमक तैर रही है। कल ही उनके सुपुत्र को शहर के सबसे नामी कॉलेज में 'सहानुभूति कोटे' से दाखिला मिला है। दाखिला तो खैर क्या मिला, विधाता ने उनकी सात पीढ़ियों के पाप एक झटके में धो दिए। शर्मा जी लाठी टेककर गली-गली इस तरह इठलाते घूम रहे हैं जैसे उन्होंने मुग़ल सल्तनत का आखिरी किला फतह कर लिया हो। उनका सीना छप्पन इंच से बढ़कर सीधे कुतुब मीनार की ऊंचाई को छूने लगा है। समाज का दस्तूर भी बड़ा कातिल है हुजूर, जब तक जेब में सिक्का खनकता नहीं, तब तक लोग आपकी खंकार को भी बदतमीजी मान लेते हैं। मगर आज वही शर्मा जी जब सरेराह पान की पीक थूकते हैं, तो मोहल्ले के बुद्धिजीवी उसमें भी कलात्मकता और आधुनिक विद्रोही चेतना की तलाश करने लगते हैं। यह नए जमाने का नया शास्त्र है, जहां असफलता को यदि चाशनी में डुबोकर बेचा जाए, तो लोग उसे ईश्वरीय प्रसाद मानकर माथे से लगा लेते हैं।
हमारे देश में तरक्की का पैमाना अब अक्ल से नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि आप अपनी बेअक्ली को कितने ऊंचे सुर में गा सकते हैं। जिस लड़के ने जीवन भर सिर्फ मोबाइल की स्क्रीन पर अंगूठे घिसे हों, वह अचानक ज्ञान का ऐसा कल्पवृक्ष बन जाता है कि बड़े-बड़े धुरंधर उसके सामने पानी भरने लगते हैं। डिग्रियों के इस थोक बाजार में मेधावी बच्चे दीवारों पर सिर पटक रहे हैं और जुगाड़ू लोग मलाई काट रहे हैं। कुम्हार का गधा भी अगर रेशमी झूल ओढ़ ले, तो लोग उसे अस्तबल का सबसे शरीफ घोड़ा मानने को मजबूर हो जाते हैं। व्यवस्था की मेज पर बैठे हुक्मरान ऐसी फाइलें तैयार करते हैं जिनमें भुखमरी का इलाज केवल विज्ञापनों की रंगीन तस्वीरों में ढूंढ लिया जाता है। असलियत यह है कि जब तक आम आदमी की रीढ़ की हड्डी को तोड़कर उसे सीधा खड़ा होने का हुनर सिखाया जाएगा, तब तक ऐसी ही चमत्कारिक सफलताएं चौराहों पर नाचती रहेंगी।
चाय की टपरी पर बैठे मुंशी जी कल कह रहे थे कि कलयुग में सच बोलना वैसा ही है जैसे जलती भट्टी में नंगे बदन कूद जाना। उनकी बात में जो कड़वाहट थी, वह दरअसल उनके अपने अनुभवों की सड़ी हुई फसल थी। आज के दौर में ईमानदारी एक ऐसा पुराना सिक्का बन चुकी है जिसे भिखारी भी लेने से मना कर देता है। अगर आपको इस रंगमंच पर टिकना है, तो अपने जमीर को किसी कबाड़ी की दुकान पर गिरवी रखना ही होगा। जो जितना बड़ा बगुला भगत है, उसकी कद्र उतनी ही ज्यादा है। गंगा नहाने से पाप धुलते हैं या नहीं, यह तो विधाता जाने, पर हां, सफेद कुर्ते-पाजामे की क्रीज अगर दुरुस्त हो, तो समाज आपके हर काले कारनामे को शिष्टाचार का नाम दे देता है। लोग भेड़चाल के इस कदर आदी हो चुके हैं कि अगर आगे वाला कुएं में कूदेगा, तो पीछे वाले अपनी बारी के लिए बकायदा कतार में खड़े होकर कूपन कटवाएंगे।
बचपन में पढ़ा था कि मेहनत का फल मीठा होता है, पर बड़े होकर मालूम हुआ कि वह फल दरअसल सिर्फ उन्हीं को मिलता है जो पेड़ की रखवाली करने वालों की चमचागिरी में माहिर होते हैं। आज का युवा किताबों के पन्ने नहीं पलटता, वह तो बस रील की दुनिया में अपने वजूद के चीथड़े उड़ा रहा है। अंगूठे के एक स्वाइप से जिंदगी की दिशा तय हो रही है। देश की सबसे बड़ी अदालतें और दफ्तर चाहे जो कहें, पर असली फैसले तो अब सोशल मीडिया की उन संकरी गलियों में होते हैं जहां नफरत मुफ्त में बंटती है और समझदारी पर टैक्स लगा दिया जाता है। कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढे बन माहि वाली हालत इस पूरे तंत्र की हो चुकी है। हम बाहर की चकाचौंध में उस अंधेरे को भूल चुके हैं जो धीरे-धीरे हमारी अगली नस्लों के भीतर घर करता जा रहा है।
बाजार ने हमारे रिश्तों की ऐसी बोलियां लगाई हैं कि अब सगे भाई भी एक-दूसरे से मिलने का समय बकायदा डायरी देखकर तय करते हैं। संवेदनाएं अब केवल शोक संदेशों के व्हाट्सएप स्टेटस तक सिमट कर रह गई हैं। रोने के लिए भी अब रुदालियों की जरूरत नहीं पड़ती, बस एक दुखद इमोजी भेजिए और अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से मुक्त हो जाइए। कफन बेचने वाले भी अब लाश की लंबाई देखकर कफन का कपड़ा तय करते हैं कि कहीं मुनाफा कम न रह जाए। इस अंधी दौड़ में जो पीछे छूट गया, वह सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाता है, जिसे सरकारी आंकड़ों की फाइलों में बहुत करीने से दफन कर दिया जाता है। जब तक इंसानियत का तकाजा पैसे की खनक से तौला जाएगा, तब तक कोई भी कबीर या तुलसी इस समाज की सूखी चेतना को दोबारा हरा नहीं पाएगा।
नेताओं की रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ को देखकर अक्सर सोचता हूं कि क्या वाकई इन लोगों को देश की चिंता है? पर जब करीब जाकर देखो, तो मालूम पड़ता है कि वहां तो सिर्फ पचास रुपये और एक पैकेट पूड़ी-सब्जी का खेल चल रहा था। भूखे पेट को देश की संप्रभुता से ज्यादा रोटी के गोल आकार में दिलचस्पी होती है। सिंहासन पर बैठे लोग जानते हैं कि जब तक जनता को बुनियादी जरूरतों के जाल में उलझाए रखोगे, तब तक वे कभी बड़े सवाल पूछने की जुर्रत नहीं करेंगे। भेड़ें कभी अपने चरवाहे से यह नहीं पूछतीं कि उन्हें कसाईखाने क्यों ले जाया जा रहा है, वे तो बस इस बात से खुश रहती हैं कि रास्ते में थोड़ी हरी घास चबाने को मिल गई। प्रजातंत्र का यह तमाशा हर पांच साल बाद सजता है, जहां मदारी बदल जाते हैं पर बंदरों का नाच वही पुराना रहता है।
एक दफ्तर के बाबू से जब मैंने पूछा कि भाई साहब, मेरी फाइल आगे क्यों नहीं खिसक रही, तो उन्होंने चश्मे के ऊपर से देखते हुए बड़े दार्शनिक अंदाज में कहा कि हुजूर, फाइलों के भी पैर होते हैं, इन्हें जब तक लक्ष्मी का स्पर्श नहीं मिलता, ये एक इंच आगे नहीं बढ़तीं। उनकी इस बात ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। भ्रष्टाचार अब कोई बुराई नहीं, बल्कि हमारे प्रशासनिक तंत्र का अनिवार्य लुब्रिकेंट बन चुका है। इसके बिना पहिए जाम हो जाते हैं। ईमानदारी की दुहाई देने वाले लोग अक्सर एकांत में बैठकर अपनी रेट लिस्ट तय कर रहे होते हैं। चौपायों की इस बस्ती में अगर आप दो पैरों पर सीधे चलने की जिद करेंगे, तो लोग आपको चिड़ियाघर का कोई अजूबा समझकर आपकी लाचारी पर हंसेंगे और तालियां बजाएंगे।
हम सब इस बहती गंगा में हाथ धोने के इतने आदी हो चुके हैं कि अब हमें पानी का मटमैलापन ही उसका असली रंग लगने लगा है। जमीर की अदालत में जब गवाह ही मुकर जाएं, तो जज भी क्या फैसला सुनाए। शर्मा जी का बेटा अब एक बड़ी कंपनी में अफसर बन चुका है और मुंशी जी की चाय की दुकान कर्ज के बोझ तले बंद हो चुकी है। यही इस युग का सबसे बड़ा सत्य है। इस सड़ी हुई व्यवस्था के मलबे पर बैठकर जो लोग आज भी क्रांतियों के गीत गा रहे हैं, वे दरअसल खुद को तसल्ली देने के अलावा और कुछ नहीं कर रहे। जब तक हम इस पाखंड की चादर को फाड़कर फेंक नहीं देते, तब तक हिंदी साहित्य क्या, साक्षात सरस्वती भी आकर हमारा उद्धार नहीं कर सकतीं।
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