बचाएगी यह खास तकनीक बारिश के मौसम में  गलने से मक्का की फसल को 

Published By Subhash Pandey
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मक्का की खेती: खरीफ सीजन में मक्का किसानों के लिए एक बेहद मुनाफे वाली फसल मानी जाती है. लेकिन इसके साथ सबसे बड़ी चुनौती मानसून की भारी बारिश होती है. मक्के के पौधे को बढ़ने के लिए पानी की जरूरत तो होती है. मगर खेत में ज्यादा देर तक पानी का जमा होना इसकी जड़ों के लिए जहर जैसा काम करता है. जलभराव के कारण अक्सर मक्के के पौधे गल जाते हैं.  पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और पूरी की पूरी फसल बर्बाद हो जाती है.

इसी बड़ी समस्या का एक बेहद स्मार्ट और मॉडर्न सॉल्यूशन है मेढ़ विधि यानी बेड प्लांटिंग तकनीक. कृषि विशेषज्ञों की ओर से किसानों को मानसून के दौरान इसी खास तकनीक से मक्के की बुवाई करने की सलाह दी जा रही है. यह तरीका न सिर्फ आपकी फसल को जलभराव से पूरी सुरक्षा देता है. बल्कि बेहद कम लागत में रिकॉर्ड तोड़ पैदावार की गारंटी भी देता है.

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मेढ़ विधि से जलभराव की टेंशन होगी खत्म 
इस आधुनिक तकनीक के तहत मक्के के बीजों को समतल खेत में बोने के बजाय ट्रैक्टर या बेड मेकर की मदद से उठी हुई क्यारियों (बेड्स) या मेढ़ों पर लगाया जाता है. ऐसा करने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि मानसून में जब भी मूसलाधार बारिश होती है. तो एक्स्ट्रा पानी मेढ़ों के बीच बनी नालियों में आसानी से इकट्ठा हो जाता है और पौधों की जड़ों के पास वॉटरलॉगिंग नहीं होती.

 

मक्के की जड़ें पानी में डूबने से बच जाती हैं जिससे उन्हें हवा और ऑक्सीजन प्रॉपर मिलती रहती है और फसल गलने से पूरी तरह सुरक्षित रहती है. नालियों में जमा हुए इस पानी को खेत से बाहर निकालना भी बेहद आसान हो जाता है. जिससे पौधों की ग्रोथ बिना किसी रुकावट के लगातार और बहुत शानदार तरीके से होती रहती है.

कम लागत में मिलेगी बंपर पैदावार
बेड प्लांटिंग या मेढ़ विधि सिर्फ पानी से बचाने का तरीका नहीं है. बल्कि यह किसानों के इनपुट कॉस्ट को कम करने का एक बेहतरीन जरिया भी है. इस विधि से बुवाई करने पर परंपरागत तरीकों के मुकाबले करीब 20 से 30 परसेंट तक पानी की बचत होती है. क्योंकि सिंचाई सिर्फ नालियों में करनी पड़ती है. इसके साथ ही जब आप मेढ़ों पर खाद या फर्टिलाइजर्स डालते हैं. तो वे सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचते हैं और पानी के साथ बहकर वेस्ट नहीं होते.

बढ़ जाता है मुनाफा
सही दूरी और संतुलित पोषण मिलने के कारण मक्के के भुट्टे बड़े साइज के और दानों से पूरी तरह भरे हुए तैयार होते हैं. कम लागत में हाई-क्वालिटी प्रोडक्शन मिलने की वजह से मंडी में किसानों को इसके बहुत शानदार दाम मिलते हैं और उनका मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है.

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लेखक के बारे में

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सुभाष पांडेय एक सीनियर और अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें मीडिया क्षेत्र में 32 वर्षों का समृद्ध अनुभव है। अपने लंबे करियर के दौरान उन्होंने समाचार लेखन, संपादन और रिपोर्टिंग के विभिन्न आयामों में कार्य करते हुए पत्रकारिता को मजबूत दिशा दी है।

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