दुनिया में आकर्षण का केंद्र बने यूपी के घड़ियाल, कुकरैल ने रचा संरक्षण का इतिहास

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लखनऊ। प्रदेश में कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके घड़ियाल आज अंतरराष्ट्रीय पहचान बन चुके हैं। घड़ियाल पुनर्वास केन्द्र, कुकरैल के सफल प्रजनन ने पूरी दुनिया को घड़ियाल संरक्षण के रूप में स्वयं को साबित किया। यहां के घड़ियाल अमेरिका, जापान जैसे कई देशों और प्रदेशों में आकर्षण के केंद्र बन रहे हैं।  

पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि वर्ष 1970 में पूरे देश में मात्र 250 से 300 घड़ियाल ही बचे थे। तेजी से घटती संख्या ने वन्यजीव विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी थी। आज कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र में 466 घड़ियाल मौजूद हैं। प्रतिवर्ष लगभग 140 से 160 नए घड़ियाल बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि कुकरैल के घड़ियाल केवल भारत के विभिन्न राज्यों तक ही सीमित नहीं रहे। यहां से भूटान, पाकिस्तान, जापान और अमेरिका के न्यूयॉर्क तक घड़ियाल भेजे गए हैं। इस तरह उत्तर प्रदेश का घड़ियाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार किया जा चुका है। 

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उन्होंने बताया कि कुकरैल में तैयार किए गए घड़ियालों को गंगा, घाघरा, गेरूआ, चम्बल और गंडक जैसी नदियों में छोड़ा जाता है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक आवासों में घड़ियालों की संख्या बढ़ाना और नदियों के पारिस्थितिक संतुलन को मजबूत करना है। प्रतिवर्ष लगभग दो लाख घरेलू और 100 से अधिक विदेशी पर्यटक यहां पहुंचकर घड़ियाल संरक्षण की इस अनूठी यात्रा को करीब से देखते हैं। 

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इनमें प्रमुख स्थल हैं राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य, दुधवा नेशनल पार्क और कतर्नियाघाट वन्यजीव अभ्यारण्य, हस्तिनापुर के साथ ही महराजगंज बाराबंकी  की नदियां, जहां घड़ियाल अच्छी-खासी संख्या में पाए जाते हैं। वन संरक्षक संजय कुमार बिश्वाल ने बताया कि इस वर्ष 500 घड़ियाल अंडों को प्राकृतिक आवास से लाकर कुकरैल में हैच कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। 

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लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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