संत कबीर नगर । जनपद संत कबीर नगर के विकास खण्ड हैसर बाजार के ग्राम मलौली निवासी प्रगतिशील कृषक श्री गोविन्द प्रताप चतुर्वेदी जी द्वारा लगभग 1 हेक्टेयर क्षेत्रफल में सुरन की खेती की जा रही है। वहीं, ग्राम कटया, विकास खण्ड हैसर बाजार निवासी प्रगतिशील कृषक श्री दयाराम चौधरी एवं श्री देवानंद जी द्वारा भी लगभग 1-1 एकड़ क्षेत्रफल में सूरन (जिमीकंद) की खेती सफलतापूर्वक की जा रही है। उन्होंने पारंपरिक फसलों के साथ सूरन को अपनाकर फसल विविधीकरण की दिशा में एक सराहनीय पहल की है। सूरन एक महत्वपूर्ण कंद फसल है, जिसकी बाजार में अच्छी मांग रहती है। इसकी खेती से किसान एक ही खेत से अपेक्षाकृत अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही साथ सुरन का बीज भी तैयार कर रहे है।
कृषि वैज्ञानिक डा. देवेश कुमार, कृषि विज्ञान केंद्र, संत कबीर नगर के सलाह से खेती कर रहे है और सूरन की खेती के लिए अच्छी जल निकास वाली बलुई दोमट या दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है। रोपण के लिए सामान्यतः 250 ग्राम से 1 किलोग्राम तक के स्वस्थ कंद अथवा कंद के टुकड़ों का प्रयोग किया जा सकता है। कंद का आकार और रोपण दूरी के अनुसार बीज की मात्रा में अंतर आता है। व्यावसायिक खेती में लगभग 20दृ30 क्विंटल कंद बीज प्रति एकड़ की आवश्यकता होती है। सूरन की फसल लगभग 6 से 8 माह में तैयार हो जाती है। सूरन की खेती में कृषि यंत्रीकरण अपनाने से खेत की तैयारी, रोपण, निराई-गुड़ाई और कंद की खुदाई जैसे कार्य कम समय में किए जा सकते हैं। विशेष रूप से कंद खुदाई के लिए उपयुक्त यंत्रों के प्रयोग से मजदूरी लागत कम करने तथा कंद को क्षति से बचाने में मदद मिल सकती है। आने वाले समय में सूरन जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों में यंत्रीकरण किसानों की आय बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
सूरन (जिमीकंद) में प्रमुख रूप से कार्बाेहाइड्रेट, आहार फाइबर, पोटैशियम, कैल्शियम, फॉस्फोरस, आयरन, मैग्नीशियम तथा विटामिन बी6 और विटामिन सी पाए जाते हैं।
उन्होंने बताया कि एक एकड़ क्षेत्र में सामान्यतः 8-12 क्विंटल स्वस्थ बीज कंद की आवश्यकता हो सकती है। उचित उन्नत तकनीक एवं फसल प्रबंधन अपनाने पर लगभग 100-150 क्विंटल प्रति एकड़ या इससे अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि प्रमाणित एवं स्वस्थ बीज कंद का ही प्रयोग करें और रोपण से पहले बीज कंद का उचित उपचार करें। संतुलित उर्वरक प्रबंधन, समय पर निराई-गुड़ाई, आवश्यकतानुसार सिंचाई तथा रोग एवं कीट प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने से उत्पादन एवं गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।
डा. देवेश कुमार के अनुसार सूरन की खेती में खेत की तैयारी, बीज कंद, जैविक खाद, उर्वरक, मजदूरी, सिंचाई एवं पौध संरक्षण पर खर्च आता है। खेती की लागत बुआई से लेकर कटाई तक एक एकड़ पर लगभग रूपये 45,000-65,000 की कुल लागत आती है। बाजार में अच्छा मूल्य मिलने पर यह फसल किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकती है।
श्री गोविन्द प्रताप चतुर्वेदी जी का कहना है कि “किसानों को केवल पारंपरिक फसलों तक सीमित न रहकर बाजार की मांग के अनुसार लाभकारी फसलों का चयन करना चाहिए। सूरन की खेती में अच्छी संभावनाएं हैं और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर इसका उत्पादन एवं लाभ दोनों बढ़ाया जा सकता है।” फसल विविधीकरण, उच्च मूल्य वाली फसल अपनाने और अतिरिक्त आय अर्जित करने का प्रेरणादायक उदाहरण बन सकती है। ऐसे प्रगतिशील किसानों के अनुभवों को अन्य किसानों तक पहुंचाकर जनपद में लाभकारी एवं टिकाऊ कृषि को बढ़ावा दिया जा सकता है।
इस संबंध में डा. देवेश कुमार, कृषि वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र, संत कबीर नगर ने बताया कि सूरन जैसी उच्च मूल्य वाली कंद फसलों को कृषि प्रणाली में शामिल करने से किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि “सूरन की खेती में वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ कृषि यंत्रीकरण, उचित सिंचाई तथा कटाई-पश्चात प्रबंधन को अपनाकर उत्पादन लागत कम और उत्पाद की गुणवत्ता बेहतर की जा सकती है। किसानों को बाजार की मांग एवं मूल्य को ध्यान में रखते हुए सूरन के प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर भी ध्यान देना चाहिए।