कोटेदारों और बिचौलियों के चंगुल में फंसा पूर्ति महकमा, लाभार्थी परेशान
दो बार ऑनलाइन प्रक्रिया के बावजूद कार्ड जारी नहीं
मोहम्मद अय्यूब
उतरौला (बलरामपुर)। पूर्ति महकमा पात्र लोगों के राशनकार्ड जारी करने, मृतकों का नाम हटाने व नये लोगों के नाम जोड़ने में हीलाहवाली कर रहा है। बिचौलियों और कोटेदारों के हस्तक्षेप के बिना कोई काम नहीं होता है। स्थिति यह है कि दो-दो बार आनलाईन कराने के बाद न तो पात्रों का कार्ड जारी होता है न नाम घटाने-बढ़ाने की.प्रक्रिया ही हो रही है।
बिचौलिए और कोटेदार जरूरतमंदों का आर्थिक शोषण भी पूर्ति कार्यालय के नाम पर करते हैं। नया राशनकार्ड बनवाने की रकम एक हजार रुपये, यूनिट बढ़वाने की फीस पांच सौ रुपये बिचौलियों ने तय कर रखी है। अब इसमें कितनी रकम अधिकारियों को जाती है और कितनी रकम बिचौलियों के पास रहती है इसका जवाब सिर्फ महकमे के अधिकारी-कर्मचारी ही दे सकते हैं।
पोर्टल पर लंबित पड़े नये राशनकार्डों और यूनिट बढ़वाने के आवेदन आवेदकों की शिकायतों का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। नामित सभासद मोलहू राम बताते हैं कि उन्होंने अपनी पत्नी के निधन के बाद लगभग एक साल पहले उनका नाम हटाकर पुत्रवधू का नाम जोड़ने का आवेदन किया था। हर महीने पूर्ति कार्यालय का चक्कर काट रहे हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। उतरौला ग्रामीण निवासी सेबी, सुनीता समेत दर्जनों लोग पूर्ति कार्यालय का चक्कर लगाकर थक चुके हैं, हर तीन महीने बाद नया आनलाईन करवाने की सलाह दे दी जाती है लेकिन राशनकार्ड मे बच्चों का नाम नहीं बढ़ाया जा रहा है।
हैरानी की बात यह है कि अगर इसी काम के लिए किसी खास कोटेदार को तयशुदा रकम दे दी जाए तो फिर हफ्ते भर में ही काम पूरा हो जाता है। अधिकारी इसके लिए बाहरी कर्मचारियों से काम करवाने की दलील देकर सुविधा शुल्क लेने-देने को गलत भी नहीं मानते हैं। हर महकमे मे पारदर्शी और जन हितकारी काम होने के दावों की हकीकत उच्च अधिकारियों को धरातल पर जांचने की जरुरत है।
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लेखक के बारे में
हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
