प्रेमचंद का साहित्य स्त्री संघर्ष का जीवंत दस्तावेज: डॉ. योगेंद्र
देवरिया। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर बाबा राघव दास स्नातकोत्तर महाविद्यालय, देवरिया के हिंदी विभाग द्वारा स्त्री अस्मिता और प्रेमचंद का साहित्य विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री चेतना, सामाजिक न्याय और समानता के विभिन्न आयामों पर विस्तार से विचार रखे।
संगोष्ठी का शुभारंभ महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. प्रताप नारायण सिंह तथा मुख्य वक्ता किसान पीजी कॉलेज, तमकुही रोड (कुशीनगर) के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह ने मां सरस्वती एवं प्रेमचंद के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया। आयोजन सचिव एवं हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रद्योत सिंह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि प्रेमचंद का कथा साहित्य समाज के हाशिए पर खड़े वर्गों की पीड़ा और संघर्ष का सशक्त दस्तावेज है। उनकी रचनाओं की महिला पात्र करुणा, आत्मसम्मान, संघर्ष और सामाजिक चेतना का प्रतीक हैं।
ये खबर भी पढ़े : मणप्पुरम ज्वैलर्स के 18.53 किलो सोना गबन मामले में सह-आरोपी गिरफ्तार, चौक पुलिस की बड़ी कार्रवाईमुख्य वक्ता डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि प्रेमचंद से पहले के साहित्य में नारी समस्याओं का चित्रण तो मिलता है, लेकिन उनके समाधान की स्पष्ट दिशा प्रेमचंद के साहित्य में दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों की महिला पात्र सामाजिक बंधनों को चुनौती देती हैं और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती हैं। 'गोदान', 'सेवासदन', 'गबन', 'रंगभूमि', 'कर्मभूमि' जैसे उपन्यासों तथा 'कफन', 'पंच परमेश्वर', 'सद्गति', 'बड़े घर की बेटी' जैसी कहानियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य वास्तव में स्त्री संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है।
बीएड विभाग के सहायक आचार्य डॉ. संजय कुमार ने कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा महिलाओं की प्रगति को समाज की प्रगति का आधार मानने की जो अवधारणा है, उसकी झलक प्रेमचंद के साहित्य में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वहीं अंग्रेजी विभाग के डॉ. अभिषेक तिवारी ने पाश्चात्य साहित्य और प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री अस्मिता की तुलना प्रस्तुत की। जीव विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. सुधीर कुमार ने स्त्री-पुरुष संबंधों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य प्रो. प्रताप नारायण सिंह ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य आज भी समाज की वास्तविक समस्याओं को प्रतिबिंबित करता है और उनके पात्र विपरीत परिस्थितियों में भी मानवीय मूल्यों एवं मर्यादा की रक्षा का संदेश देते हैं।
संगोष्ठी का संचालन डॉ. भावना सिन्हा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो. हरिशंकर गोविंद राव ने दिया। कार्यक्रम में प्रो. केडी तिवारी, प्रो. रजनीश कुमार, प्रो. केके ओझा, डॉ. अमरेंद्र प्रताप सिंह, डॉ. अभिनव सिंह, डॉ. धीरज वर्मा, डॉ. सानिया त्यागी, डॉ. सिकंदर पासवान, डॉ. रोहित कुशवाहा सहित बड़ी संख्या में शिक्षक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
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दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय प्रेम शकर मणि वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में देवरिया व्यूरो के रूप में कार्यरत हैं। सटीक भाषा, तथ्यपरक संपादन और समाचारों को संतुलित रूप देने की उनकी क्षमता उनकी पहचान है।
