मधुबन में बदली सियासत की बिसात: भाजपा छोड़ भरत भैया ने थामा बसपा का हाथ
2027 से पहले गरमाया चुनावी मैदान 17 साल की भाजपा की राजनीति को अलविदा, बसपा के मंच से नई पारी का आगाज; मधुबन में रविवार को शक्ति प्रदर्शन की तैयारी
मऊ/मधुबन। विधानसभा क्षेत्र 353 मधुबन की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा सियासी मोड़ सामने आया है। करीब 17 वर्षों तक भाजपा की राजनीति में सक्रिय रहे वरिष्ठ नेता भरत भैया ने पार्टी से इस्तीफा देकर बहुजन समाज पार्टी का दामन थाम लिया है। रविवार को पांती रोड स्थित गांधी मैदान में सुबह 10 बजे आयोजित होने वाले बसपा सम्मेलन में वह अपने समर्थकों के साथ औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता ग्रहण करेंगे। इसी मंच से बसपा की ओर से उन्हें 2027 विधानसभा चुनाव के लिए प्रभारी प्रत्याशी के रूप में जिम्मेदारी सौंपे जाने की चर्चा ने मधुबन के राजनीतिक तापमान को बढ़ा दिया है।
भाजपा से बसपा तक—17 साल की सियासी यात्रा का नया अध्याय
भरत भैया लंबे समय से मधुबन विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय रहकर जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराते रहे हैं। वर्ष 2009 से क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बताते हुए उन्होंने लगातार जनसंपर्क और संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाने का दावा किया है। अब भाजपा से अलग होकर बसपा में जाने का उनका फैसला केवल दल-बदल नहीं, बल्कि मधुबन की आगामी चुनावी राजनीति में नए समीकरण की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है।
टिकट की उम्मीद, संगठन में उपेक्षा और फिर बगावत का फैसला
भाजपा छोड़ने के बाद भरत भैया ने पार्टी नेतृत्व और टिकट वितरण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि लंबे समय तक जमीनी स्तर पर काम करने और पार्टी के लिए समय तथा संसाधन लगाने के बावजूद उन्हें 2017 से लगातार विधानसभा चुनाव में टिकट से वंचित रखा गया।
उनके आरोपों के मुताबिक पार्टी में अब जमीनी और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अपेक्षा बाहरी चेहरों, वंशवाद और धनबल को अधिक महत्व मिल रहा है। चुनाव के कुछ समय पहले प्रत्याशी तय किए जाने की प्रक्रिया को लेकर भी उन्होंने नाराजगी जताई है। इन्हीं परिस्थितियों को अपने भाजपा छोड़ने की प्रमुख वजह बताते हुए उन्होंने अब बसपा के साथ नई राजनीतिक पारी शुरू करने का फैसला किया है।
कोरोना से बाढ़ तक—जनता के बीच रहने का दावा
भरत भैया का कहना है कि उन्होंने राजनीतिक सक्रियता को केवल चुनाव तक सीमित नहीं रखा। कोरोना महामारी, बाढ़, बिजली, सड़क और अन्य स्थानीय समस्याओं के समय वह जनता के बीच खड़े रहे। उनका दावा है कि जनसेवा और पार्टी की गतिविधियों में उन्होंने अपनी पारिवारिक कमाई का भी बड़ा हिस्सा लगाया।
अब यही राजनीतिक अनुभव और व्यक्तिगत जनसंपर्क उनके लिए बसपा के साथ नई चुनौती का आधार बनेगा। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि वर्षों से तैयार किया गया उनका व्यक्तिगत राजनीतिक नेटवर्क बसपा के संगठन के साथ किस तरह तालमेल बैठाता है।
गांधी मैदान बनेगा नई सियासी पारी का लॉन्चिंग पैड
रविवार को गांधी मैदान में होने वाला सम्मेलन महज सदस्यता कार्यक्रम नहीं माना जा रहा। इसे भरत भैया के लिए राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के तौर पर भी देखा जा रहा है। समर्थकों और बसपा कार्यकर्ताओं की जुटान को लेकर तैयारियां तेज हैं। बड़ी संख्या में लोगों के सम्मेलन में पहुंचने की संभावना के बीच मधुबन की राजनीति में इस कार्यक्रम को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सम्मेलन में बसपा के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में भरत भैया पार्टी की सदस्यता ग्रहण करेंगे। इसके बाद 2027 के चुनाव को लेकर उनकी भूमिका और जिम्मेदारी को लेकर तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।
बसपा के लिए मधुबन में नया चेहरा, भाजपा के लिए चुनौती
भरत भैया का बसपा में जाना बहुजन समाज पार्टी के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय से विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय किसी राजनीतिक चेहरे को अपने पाले में लाकर बसपा 2027 की लड़ाई में अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।
दूसरी ओर भाजपा के लिए यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि भरत भैया का दावा है कि उन्होंने करीब 17 वर्षों तक संगठन के लिए काम किया। ऐसे में उनके साथ जाने वाले समर्थकों और स्थानीय राजनीतिक प्रभाव का कितना हिस्सा बसपा के पक्ष में जाता है, यह आगामी चुनाव में भाजपा के लिए महत्वपूर्ण सवाल हो सकता है।
मधुबन में जातीय समीकरण भी रहेगा निर्णायक
मधुबन विधानसभा क्षेत्र में चुनावी राजनीति केवल दलों के बीच मुकाबला नहीं होती, बल्कि स्थानीय सामाजिक और जातीय समीकरण भी परिणाम को प्रभावित करते हैं। क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच राजनीतिक प्रभाव और वोटों की गोलबंदी हर चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इसी वजह से जिले के कई प्रमुख राजनीतिक चेहरे मधुबन विधानसभा क्षेत्र को अपनी राजनीतिक संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण मानते रहे हैं। 2027 के चुनाव से पहले बसपा द्वारा भरत भैया जैसे स्थानीय रूप से सक्रिय चेहरे को आगे किए जाने से इन सामाजिक समीकरणों के नए सिरे से आकार लेने की संभावना पर चर्चा शुरू हो गई है।
सिर्फ चेहरा बदला है या वोट का रुख भी बदलेगा?
मधुबन की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा छोड़कर बसपा में आए भरत भैया अपने साथ कितना राजनीतिक आधार लेकर जाते हैं। किसी नेता का व्यक्तिगत प्रभाव चुनावी परिणाम में तभी तब्दील होता है, जब समर्थकों का भरोसा मतदान केंद्र तक भी पहुंचता है।
इसलिए आने वाले महीनों में भरत भैया के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने समर्थक आधार को बसपा संगठन से जोड़ना, बूथ स्तर तक नेटवर्क मजबूत करना और अपने राजनीतिक फैसले को जनता के बीच स्वीकार्य बनाना होगी।
2027 की पटकथा अभी बाकी, लेकिन पहला अध्याय लिख गया
2027 विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन मधुबन में चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। भाजपा के पुराने कार्यकर्ता और लंबे समय से क्षेत्र में सक्रिय रहे भरत भैया का बसपा में जाना निश्चित तौर पर स्थानीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है।
बसपा यदि उन्हें प्रभारी प्रत्याशी के रूप में सक्रिय करती है तो आने वाले दिनों में उनकी राजनीतिक भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है। वहीं भाजपा समेत अन्य दल भी इस घटनाक्रम के बाद अपने संगठन और संभावित प्रत्याशियों को लेकर रणनीति पर नए सिरे से विचार कर सकते हैं।
अब नजर समर्थकों की संख्या पर नहीं, वोटों में तब्दील होने वाले प्रभाव पर
गांधी मैदान में होने वाला सम्मेलन भरत भैया की नई राजनीतिक पारी का पहला बड़ा मंच होगा। भीड़, समर्थकों की मौजूदगी और बसपा संगठन के साथ उनका तालमेल आने वाले चुनावी समीकरणों की पहली झलक दे सकता है।
फिलहाल मधुबन में सियासी सवाल कई हैं—क्या 17 साल की भाजपा की राजनीति का अनुभव बसपा को चुनावी फायदा दिलाएगा? क्या भरत भैया अपने पुराने समर्थकों को नए राजनीतिक झंडे के नीचे लामबंद कर पाएंगे? क्या भाजपा से उनकी नाराजगी वोटों के बदलाव में बदल पाएगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या 2027 में मधुबन की लड़ाई का गणित इस बदलाव से बदल जाएगा?
इन सवालों के जवाब चुनाव के करीब आने के साथ सामने आएंगे। लेकिन इतना तय है कि मधुबन की चुनावी शतरंज में भरत भैया की नई चाल ने 2027 की सियासत का खेल समय से पहले ही गरमा दिया है।
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लेखक के बारे में
आनन्द कुमार मिश्र मऊ जनपद के जाने - माने पत्रकार हैं। आनन्द कुमार को पत्रकारिता का 10 सालों का अनुभव है, यह कई मीडिया संस्थानों अपनी सेवा दे चुके हैं। वर्तमान में तरुणमित्र के मऊ जनपद के ब्यूरो प्रमुख के रुप में कार्यरत हैं।
