मदनापुर पुलिस पर मनमानी का आरोप, एफआईआर में बदली कहानी
नाबालिग बेटी का अपहरण, तीन लाख की डकैती, लेकिन पुलिस का फरमान,पहले सबूत लाओ फिर ढूंढेंगे
संवाददाता/ अजीत मिश्रा
जलालाबाद/शाहजहांपुर। शाहजहांपुर पुलिस अधीक्षक सौरभ दीक्षित ने मदनापुर थाने के हालात सुधारने के लिए विश्वप्रताप सिंह को हटाकर खुदागंज के अनुभवी थाना प्रभारी सत्यप्रकाश सिंह के हाथों में कमान सौंपी थी। मंशा थी कि कानून का इकबाल बुलंद होगा। लेकिन मदनापुर पुलिस का रवैया देखकर लगता है कि कप्तान साहब ने सिर्फ चेहरे बदले हैं, थाने की कार्यशैली और साहबों की मनमानी आज भी पुराने ढर्रे पर ही दौड़ रही है। पीड़ित पिता आज भी न्याय के लिए कप्तान दफ्तर के चक्कर काट रहा है, लेकिन अफसोस कि न्याय का दरवाजा पुलिस कप्तान के दफ्तर में भी बंद ही नजर आ रहा है।
तहरीर के वो सच... जिन पर मदनापुर पुलिस ने फेर दिया लीपापोती का पोछा...
पत्र में पीड़ित पिता महेश पाल (निवासी ग्राम केशवपुर गोटिया, थाना मदनापुर) ने जो आपबीती लिखकर दी है, वह किसी भी संवेदनशील इंसान के रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है, लेकिन मदनापुर पुलिस के संवेदनशील दिल पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।
घटना 28 जुलाई 2026 की रात करीब 10 बजे की है। जब पूरा गांव सो रहा था, तब दबंग घर में घुसे। लेकिन पुलिस के लिए यह शायद कोई आम घटना थी, इसीलिए साहबों को एफआईआर लिखने में अपनी रचनात्मकता दिखाने का पूरा मौका मिल गया।
पीड़ित पिता गिड़गिड़ाता रहा कि उसकी बेटी नाबालिग है जिसकी उम्र लगभग 16-17 साल है। लेकिन कानून के रखवालों ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए पीड़िता को बालिग घोषित कर दिया। आखिर नाबालिग का केस दर्ज करेंगे तो पॉक्सो और कड़ी धाराएं लगानी पड़ेंगी, जिससे कागजी काम बढ़ जाएगा। पुलिस का यह कागजी विकास सचमुच प्रशंसनीय है।
आरोपियों की पूरी फौज, लेकिन पुलिस मेहरबान...
तहरीर में नामजद आरोपियों की लंबी सूची है—राहुल पुत्र पप्पू, विमलेश पुत्र अमर सिंह, शोभा पुत्री रामवीर (निवासी ग्राम नगुआपुर, थाना कमालगंज, फर्रुखाबाद), हेतराम पुत्र केदारनाथ, रामप्रसाद, अंगेष पुत्रगण रामवीर और पप्पू पुत्र अज्ञात (निवासी केशवपुर गोटिया, मदनापुर)। पूरी पलटन एक राय होकर आई, लेकिन पुलिस की नजर में शायद ये सब निर्दोष राहगीर थे।
अपहरण के साथ तीन लाख की डकैती और जेवरों की लूट...
दबंग केवल बेटी को ही जबरन नहीं ले गए, बल्कि घर में रखे तीन लाख रुपये नकद और भारी-भरकम सोने-चांदी के जेवर—दो करधनी, दो खंगौरिया, दो मांग बेंदा, दो बिछुआ, दो जोड़ी कुंडल, एक सोने की चेन, दो जोड़ी झाले—सब लूटकर चंपत हो गए। पीड़ित का खेत बंधक रखकर जुटाया पैसा और जिंदगी भर की कमाई लुट गई, पर मदनापुर पुलिस इसे डकैती मानने को तैयार ही नहीं है।
प्रत्यक्षदर्शियों पर गाड़ी चढ़ाने की कोशिश...
घटना के वक्त गांव के ही मनोज राजपूत और रामगोपाल ने जब मोटरसाइकिल से भाग रहे मुलजिमों को रोकने का प्रयास किया, तो बेखौफ अपराधियों ने उनके ऊपर गाड़ी चढ़ाने की कोशिश की। यानी सरेआम हत्या का प्रयास। लेकिन पुलिस के लिए यह भी शायद कोई मामूली ट्रैफिक नियम का उल्लंघन रहा होगा।
जब मदनापुर थाना प्रभारी सत्यप्रकाश सिंह से सवाल किया, तो उनका जवाब किसी महान दार्शनिक से कम नहीं था—रिपोर्ट दर्ज है, लड़की का सुराग मिले तो बरामद की जाए।
धन्य हैं साहब अब क्या सुराग भी पीड़ित पिता ही ढूंढकर लाए? क्या मुलजिमों को पकड़कर थाने लाने की जिम्मेदारी भी उस लाचार बाप की ही है? अगर सब काम पीड़ित को ही करना है, तो थाने में तैनात भारी-भरकम पुलिस बल और सरकारी गाड़ियां किसलिए हैं?
एक तरफ पीड़ित पिता महेश पाल हाथ में अपनी नाबालिग बेटी की फोटो और गुहार पत्र लेकर दर-दर की ठोकरें खा रहा है, वहीं दूसरी तरफ मदनापुर पुलिस अपराधियों को बचाने के लिए कागजी बाजीगरी में जुटी है। जब जिला कप्तान के कार्यालय से भी न्याय की उम्मीद धूमिल होने लगे, तो आम जनता किस चौखट पर सिर पटके?
मदनापुर पुलिस की इस मनमानी और पीड़ित को न्याय न मिलने की गूंज अब शासन के कानों तक पहुंचेगी। देखना यह है कि कानून के रखवाले अपनी नींद से कब जागते हैं और उस मजबूर बाप को उसकी नाबालिग मासूम बेटी कब तक वापस मिलती है।
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लेखक के बारे में
आफ़वां खान उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जनपद के ब्यूरो प्रमुख हैं। इनकी पत्रकारिता के करीब हर बिन्दुओं पर गहरी पकड़ है।
