यूपी पंचायत चुनाव: प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने पर हाईकोर्ट की रोक, अब फैसले को डबल बेंच में चुनौती देगी योगी सरकार
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अगले सप्ताह अपील, सरकार का दावा- कानून अब भी प्रभावी; नवंबर तक ओबीसी आयोग देगा अपनी रिपोर्ट
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर कानूनी और राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ द्वारा ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने पर रोक लगाने के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार अब डबल बेंच या फुल बेंच में अपील करने की तैयारी कर रही है। सरकार का कहना है कि पंचायतीराज अधिनियम में मौजूद प्रावधान अभी भी प्रभावी हैं और इन्हीं के आधार पर अपील की जाएगी।सरकार के इस फैसले की पुष्टि उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष और इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस राम औतार सिंह ने भी की है। माना जा रहा है कि अगले सप्ताह सरकार औपचारिक रूप से अपील दाखिल करेगी।
क्या कहा था हाईकोर्ट ने?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने 25 जून को दिए अपने महत्वपूर्ण आदेश में कहा था कि जिन प्रावधानों को न्यायालय पहले ही असंवैधानिक मान चुका है, उनके आधार पर ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह 13 जुलाई तक पंचायत चुनाव कराने की रूपरेखा (रोडमैप) प्रस्तुत करे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पंचायत चुनाव समय पर कराना संवैधानिक दायित्व है और इसमें अनावश्यक देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।
सरकार किस कानून के आधार पर करेगी अपील?
राज्य सरकार अपनी अपील का आधार उत्तर प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) को बना रही है। यह प्रावधान अप्रैल 1994 में जोड़ा गया था।इस धारा के अनुसार यदि किसी अपरिहार्य परिस्थिति, प्राकृतिक आपदा या व्यापक लोकहित के कारण पंचायत का चुनाव समय पर कराना संभव न हो तो राज्य सरकार या उसके अधिकृत अधिकारी को पंचायतों के कार्यों के संचालन के लिए अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था करने का अधिकार है। इसके तहत प्रशासक या प्रशासनिक समिति नियुक्त की जा सकती है।सरकार का तर्क है कि चूंकि यह उपधारा अभी भी कानून की किताब में मौजूद है और इसे विधायी स्तर पर समाप्त नहीं किया गया है, इसलिए इसका कानूनी अस्तित्व बना हुआ है और इसी आधार पर अपील की जाएगी।
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हालांकि, इससे पहले प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में हाईकोर्ट यह व्यवस्था दे चुका है कि धारा 12(3-ए) का उपयोग पंचायत चुनावों को अनिश्चितकाल तक टालने या प्रशासकों का कार्यकाल मनमाने तरीके से बढ़ाने के लिए नहीं किया जा सकता।अदालत ने स्पष्ट किया था कि पंचायत चुनाव कराना राज्य निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायित्व है और राज्य सरकार प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर चुनाव में अनावश्यक विलंब नहीं कर सकती।यही कारण है कि वर्तमान विवाद अब एक बार फिर न्यायिक व्याख्या के केंद्र में आ गया है।
ये खबर भी पढ़े : जौनपुर में फर्नीचर शोरूम में भीषण आग, 14 से अधिक दमकल गाडियों ने घंटों की मशक्कत के बाद पाया काबूओबीसी आयोग को पक्षकार बनाने पर भी सरकार की आपत्ति
हाईकोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ता को उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग को भी पक्षकार बनाने की अनुमति दी थी। इस पर भी राज्य सरकार और आयोग ने आपत्ति जताई है।आयोग के अध्यक्ष जस्टिस राम औतार सिंह का कहना है कि कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट की धारा-9 के अनुसार किसी जांच आयोग को इस प्रकार किसी मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया जा सकता। इसलिए सरकार इस आदेश को भी अपनी अपील में चुनौती देगी।
ओबीसी आरक्षण तय करने में जुटा आयोग
उधर पंचायत चुनाव में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण तय करने की प्रक्रिया भी जारी है। राज्य सरकार ने 18 मई को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया था।आयोग का दायित्व प्रदेश में ओबीसी आबादी, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति और पिछड़ेपन का वैज्ञानिक अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार करना है, ताकि आरक्षण का निर्धारण संवैधानिक मानकों के अनुरूप किया जा सके।
75 जिलों का होगा सर्वे, नवंबर तक आएगी रिपोर्ट
आयोग के अध्यक्ष के अनुसार प्रदेश के सभी 75 जिलों के जिलाधिकारियों से ओबीसी आबादी से संबंधित आंकड़े प्राप्त कर लिए गए हैं। आयोग अब इन आंकड़ों का जमीनी सत्यापन कर रहा है।अब तक मेरठ, हापुड़ और बागपत जिलों का दौरा किया जा चुका है। आयोग की टीमें ब्लॉक और गांव स्तर तक जाकर आंकड़ों का मिलान कर रही हैं। इसके बाद प्रदेश के सभी जिलों का दौरा किया जाएगा।जस्टिस राम औतार सिंह के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया में लगभग छह महीने का समय लगेगा और आयोग अपनी अंतिम रिपोर्ट नवंबर 2026 तक राज्य सरकार को सौंप सकेगा।
पंचायत चुनाव की समयसीमा पर बढ़ी नजरें
हाईकोर्ट के आदेश, सरकार की प्रस्तावित अपील और ओबीसी आयोग की लंबी प्रक्रिया को देखते हुए पंचायत चुनावों की समयसीमा अब पूरी तरह न्यायिक और प्रशासनिक घटनाक्रम पर निर्भर करती दिखाई दे रही है।यदि सरकार की अपील पर राहत मिलती है तो चुनाव कार्यक्रम आगे बढ़ सकता है, जबकि यदि हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रहता है तो राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग पर जल्द चुनाव कराने का दबाव बढ़ जाएगा। ऐसे में आने वाले कुछ सप्ताह उत्तर प्रदेश की पंचायत राजनीति और चुनावी प्रक्रिया के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं।
लेखक के बारे में
पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।
