सरकारी बैंक कर्मचारियों के यातनाग्रह बन गये हैं- कामरेड आर0 के0 मिश्रा 

बैंक राष्ट्रीयकरण दिवस पर बैंक कर्मचारियों और सेवनिवृत्त बैंक कर्मचारियों की समस्याओं और उनके समाधान पर चर्चा 

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मनोज शर्मा

  • बैंक राष्ट्रीयकरण दिवस पर संगोष्ठी का आयोजन 

बाराबंकी। बैंक राष्ट्रीयकरण दिवस पर एक संगोष्ठी का आयोजन सेवानिवृत्त वरिष्ठ बैंक अधिकारी संतराम मौर्या की अध्यक्षता में उन्हीं के आवास पर किया गया। इस अवसर पर बोलते हुए बैंक ऑफ़ बड़ोदा के पूर्व वरिष्ठ यूनियन लीडर तौकीर जमाल ने कहा कि 19 जुलाई 1969 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने 14बड़े वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था, इसी कारण 19जुलाई को बैंक राष्ट्रीयकरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। 

बाद में 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों का विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े रूप में किया गया जिससे ग्रामीण जनता को भी बैंकिंग सेवाओं का लाभ मिलने लगा। उन्होंने  कहा कि देश के आर्थिक विकास में सरकारी बैंकों का महत्वपूर्ण स्थान है। लेकिन धीरे धीरे बैंकों में राजनितिक हस्तक्षेप बढ़ता गया और आज यह हाल है कि बड़े बड़े पूँजीपति बैंकों का हजारों करोड़ रुपये लेकर विदेश भाग गये हैं और उनसे सरकारी धन की वसूली नहीं हो पा रही है जो चिंता का विषय है। 

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सरकार बैंक कर्मचारियों की सुविधाओं की उपेक्षा कर रही है, बैंक कर्मचारियों की पेंशन रिवीज़न वर्षों से लंबित है जबकि आर बी आई के कर्मचारियों की पेंशन रिवीज़न हो चुकी है फिर अन्य सरकारी बैंकों की पेंशन रिवीज़न क्यों नहीं हो रही? यू पी बैंक ऑफ़ बड़ोदा एम्प्लाइज यूनियन के मीडिया प्रभारी रह चुके कामरेड आर के मिश्रा ने संगोष्ठी में बोलते हुए कहा कि आज सरकारी बैंक, कर्मचारियों के यातना गृह बन गये हैं। 

भारी कार्यबोझ, स्टाफ की कमी, रीजनल मैनेजर और जोनल मैनेजरों के अपमानजनक व्यवहार तथा धमकियों के कारण स्टॉफ डिप्रेशन, एंग्जायटी आदि मानसिक बीमारियों का शिकार हो रहे हैं । छोटी छोटी बातों पर ट्रांसफर की धमकी दी जाती है। देर रात तक महिला कर्मचारियों को भी बैठने के लिए बाध्य किया जाता है, यहां तक कि रविवार या अन्य छुट्टी के दिन भी महिला अधिकारियों को रीजनल या जोनल ऑफिस काम पर आने को कहा जाता है, आदेश न मानने पर सुदूर क्षेत्रों में ट्रांसफर की धमकी दी जाती है। कुल मिलाकर सरकारी बैंक राष्ट्रीयकरण के मूल उद्देश्यों से भटक गये हैं। सरकारी बैंक कर्मचारियों के यातना केंद्र बन गये हैं। न जाने कितने युवा बैंकर्स आत्महत्या करने को मजबूर हुए हैं,इसी यातना के कारण। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

वरिष्ठ सेवानिवृत्त बैंक कर्मी उमेर किदवाई ने संगोष्ठी में बोलते हुए कहा कि बैंक कर्मचारी और सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारी दोनों ही देश की बैंकिंग व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं। कर्मचारियों को सुरक्षित,सम्मानजनक और संतुलित कार्य वातावरण तथा पेंशनभोगियों को सम्मानजनक जीवन, स्वास्थ्य सुरक्षा और सरल सेवाएं उपलब्ध कराना केवल उनके हित में ही  नहीं बल्कि एक मजबूत और विश्वशनीय बैंकिंग प्रणाली के निर्माण के लिए भी आवश्यक है।

अतुल सेठ, एम आई उस्मानी, और सियाराम गुप्ता ने भी अपने अपने विचार रखे। अंत में संतराम मौर्या ने कहा कि आज बैंक की नौकरी कोई करना नहीं चाहता। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी ऐसी शाखाएं हैं जहाँ एक ही अधिकारी है, वही कैश भी संभालता है और अधिकारी का भी काम देखता है। 

सरकार को स्टाफ संख्या बढ़ानी चाहिए और पेंशन रिवीज़न तुरन्त करना चाहिए।उन्होंने कहा कि सरकार, बैंक प्रबंधन, कर्मचारी संगठनों और पेंशन भोगी संघो के समन्वित प्रयासों से इन सभी समस्याओं का प्रभावी समाधान किया जा सकता है। उन्होंने संगोष्ठी में आये हुए सभी बैंकिंग साथियों का आभार व्यक्त किया।

लेखक के बारे में

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हर्षित साहू पिछले करीब दो वर्षों से ‘तरुणमित्र’ से जुड़े हुए हैं और बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। वह लखनऊ में आधारित हैं और समाचार लेखन के माध्यम से समसामयिक, सामाजिक एवं स्थानीय मुद्दों से जुड़ी खबरें लिखते हैं।

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