गोल्डन ओक प्रमोटर्स काे हाईकाेर्ट से राहत, वसूली की कार्यवाही रद्द
प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने गोल्डन ओक प्रमोटर्स एंड डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ विकास प्राधिकरण द्वारा जारी वसूली नोटिस और कुर्की की कार्यवाही रद्द कर दी है।
याचिकाकर्ता कंपनी ने वर्ष 2006 में अपने प्रोजेक्ट के लेआउट प्लान की मंजूरी के लिए आवेदन किया था, जिसे प्राधिकरण ने कई शर्तों के साथ स्वीकृत किया, जिसमें बाह्य विकास शुल्क जमा करने की शर्त शामिल थी।
कंपनी ने प्रारंभिक 25फीसदी राशि जमा कर दी, लेकिन शेष 75 फीसदी राशि जमा नहीं कर सकी, जिसके चलते उसका प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो पाया।
इसके बाद 5 अप्रैल 2018 को प्राधिकरण ने 4,25,53,761 रूपये की वसूली और संपत्ति की कुर्की व नीलामी की कार्यवाही शुरू कर दी, जिसे चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की गई थी।
कहा कि कंपनी अब इस प्रोजेक्ट को जारी नहीं रखना चाहती और मानचित्र स्वीकृति रद्द करने तथा जमा राशि जब्त करने के लिए सहमत है।
उन्होंने तर्क दिया कि प्राधिकरण ने स्वयं क्षेत्र में बाह्य विकास कार्य नहीं किया, जिसके कारण प्रोजेक्ट अगम्य बना रहा और आर्थिक नुकसान हुआ।
न्यायालय ने कहा कि उ.प्र. शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 15 के तहत शुल्क जमा न करने का स्वाभाविक परिणाम मानचित्र स्वीकृति का निरस्तीकरण होना चाहिए था, न कि सीधे भू-राजस्व बकाया के रूप में वसूली की कार्यवाही।
कोर्ट ने पाया कि आज तक स्वीकृति रद्द करने का कोई आदेश पारित नहीं किया गया, और प्राधिकरण यह दिखाने में असफल रहा कि अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान है जिसके तहत सीधे वसूली की जा सके।
न्यायालय ने पाया कि प्राधिकरण द्वारा बाह्य विकास कार्य नहीं कराया गया और प्रोजेक्ट याचिकाकर्ता द्वारा त्याग दिया गया है।
इन परिस्थितियों में वसूली नोटिस व संबंधित कार्यवाही को बरकरार रखना उचित नहीं माना गया। अतः कोर्ट ने आदेश दिया कि विवादित मांग नोटिस तथा उसकी वसूली से जुड़ी सभी कार्यवाहियां रद्द की जाती हैं।
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