लखीमपुर-खीरी,28 जुलाई(तरुणमित्र)। हर गाँव की मिट्टी में हजारों सपने जन्म लेते हैं। कुछ सपने खेतों की मेड़ों पर चलते-चलते थक जाते हैं, तो कुछ अभावों की धूल झाड़कर इतिहास बन जाते हैं। लखीमपुर खीरी जनपद की मितौली तहसील के ग्राम पंचायत मदारपुर के मजरा नेवलापुर की मिट्टी ने भी एक ऐसा ही बेटा पैदा किया,जिसने गरीबी को अपनी किस्मत नहीं बनने दिया और संघर्ष को अपना साथी बना लिया।
यह कहानी है मोहित वर्मा की—एक ऐसे किसान पुत्र की,जिसकी आँखों में बचपन से ही एक सपना पल रहा था। सपना केवल नौकरी का नहीं, बल्कि भारत माता की सेवा करने का। आज वही सपना सच हो चुका है। केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) में कांस्टेबल पद पर चयनित होकर मोहित ने यह साबित कर दिया कि सपनों की कोई कीमत नहीं होती, कीमत होती है उन्हें पूरा करने के लिए किए गए संघर्ष की।
8 अप्रैल 2005 को जन्मे मोहित वर्मा के पिता रामविलास वर्मा एक साधारण किसान हैं। खेतों में तपती धूप, कड़कड़ाती सर्दी और बरसात की चिंता के बीच उन्होंने अपना पूरा जीवन परिवार के भविष्य के लिए खपा दिया। फसल कभी अच्छी हुई, कभी खराब, लेकिन पिता ने अपने बच्चों के सपनों की फसल कभी सूखने नहीं दी।
चार भाइयों में सबसे छोटे मोहित बचपन से ही बेहद शांत, मेहनती और अनुशासित रहे। जब दूसरे बच्चे खेल के मैदान में घंटों बिताते थे, तब मोहित अपनी किताबों में भविष्य तलाशते थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बैबहा शिशु मंदिर, श्यामालिया प्रसाद से कक्षा आठ तक प्राप्त की और फिर परसेहरा से हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। उसी समय उनके मन में वर्दी पहनने का सपना मजबूत होता चला गया।
लेकिन यह सफर आसान नहीं था। घर की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि तैयारी के लिए हर सुविधा आसानी से मिल जाए। कई बार परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि रास्ता कठिन लगने लगा। फिर भी मोहित ने हार नहीं मानी। उन्होंने ठान लिया था कि अगर पिता खेत में दिन-रात मेहनत कर सकते हैं, तो बेटा भी अपने सपनों के लिए दिन-रात एक कर सकता है।
रोजाना 8 से 12 घंटे की पढ़ाई, नियमित दौड़, कठिन शारीरिक अभ्यास और आत्मविश्वास से भरी तैयारी उनकी दिनचर्या बन गई। कई रातें ऐसी भी थीं, जब नींद से ज्यादा उन्हें अपने सपनों की चिंता रहती थी। उन्हें पता था कि एक दिन की लापरवाही वर्षों की मेहनत पर भारी पड़ सकती है।
मोहित आज भी भावुक होकर कहते हैं कि उनकी सफलता के पीछे सबसे बड़ा हाथ उनके बड़े भाई अमित वर्मा का है। जब हालात कमजोर पड़ते थे, तब भाई उनका हौसला बनकर खड़े रहते थे। जब आत्मविश्वास डगमगाता था, तब भाई कहते थे—"मेहनत करने वाला कभी हारता नहीं, बस उसकी सफलता थोड़ी देर से आती है।" यही शब्द मोहित के जीवन की सबसे बड़ी ताकत बन गए।
जिस दिन चयन की खबर आई, उस दिन वह घर खुशी से भर उठा, जहाँ कभी भविष्य की चिंता रहती थी। किसान पिता रामविलास वर्मा की आँखों में आँसू थे, लेकिन यह आँसू मजबूरी के नहीं, गर्व के थे। माँ ने बेटे को गले लगाया तो वर्षों की दुआएँ जैसे साकार हो गईं। घर का हर कोना मानो कह रहा था—"आज इस घर की मेहनत जीत गई।"
नेवलापुर के बुजुर्गों ने कहा कि यह केवल मोहित की नहीं, पूरे गाँव की जीत है। जिस गाँव की गलियों में कभी मोहित नंगे पाँव दौड़ा करता था, आज उसी गाँव का बेटा भारत की सुरक्षा का प्रहरी बनने जा रहा है। बच्चों की आँखों में अब एक नया सपना है—"अगर मोहित भैया कर सकते हैं, तो हम भी कर सकते हैं।"
युवाओं को संदेश देते हुए मोहित
कहते हैं—
"गरीबी कभी किसी की मंजिल नहीं रोकती, हार मान लेना रोकता है। संघर्ष से दोस्ती कर लीजिए, मेहनत को आदत बना लीजिए और माता-पिता की उम्मीदों को अपनी ताकत बना लीजिए। जिस दिन आपकी सफलता पर आपके माता-पिता की आँखों में खुशी के आँसू आएँगे, उस दिन आपको एहसास होगा कि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत वही पल है।"
भविष्य के बारे में पूछे जाने पर मोहित विनम्रता से कहते हैं कि उनका सपना अभी खत्म नहीं हुआ है। अब उनका जीवन केवल एक उद्देश्य के लिए समर्पित है—पूरी ईमानदारी, अनुशासन और निष्ठा के साथ भारत माता की सेवा करना।
आज नेवलापुर की हवा में गर्व है, मदारपुर की मिट्टी मुस्कुरा रही है और लखीमपुर खीरी का हर युवा इस कहानी से प्रेरणा ले रहा है। यह केवल एक नौकरी मिलने की खबर नहीं, बल्कि उस किसान की जीत है जिसने अपनी इच्छाओं से पहले अपने बच्चों के सपनों को रखा। यह उस माँ की दुआ की जीत है, जिसने हर सुबह भगवान से अपने बेटे की सफलता मांगी। यह उस बड़े भाई के विश्वास की जीत है, जिसने छोटे भाई को कभी टूटने नहीं दिया।
मोहित वर्मा की यह कहानी आने वाली पीढ़ियों को हमेशा याद दिलाएगी कि सपने अमीर-गरीब नहीं देखते, सपने वही पूरे करते हैं जो हर गिरावट के बाद फिर खड़े होने का हौसला रखते हैं। खेतों की मेड़ से निकलकर भारत की वर्दी तक पहुँचा यह सफर केवल मोहित का नहीं, बल्कि हर उस किसान परिवार का सपना है, जो आज भी अपने बच्चों के भविष्य के लिए चुपचाप संघर्ष कर रहा है।