'हर असफल प्रेम संबंध रेप नहीं' : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से किया बरी
कोर्ट ने आरोपी को आरोपों से मुक्त किया
प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा कि आपसी सहमति से बालिगों के बीच लंबे समय तक चले शारीरिक संबंधों को शादी का वादा पूरा न होने पर 'रेप' नहीं कहा जा सकता, खासकर तब जब मूल विवाद मुख्य रूप से सिविल और आर्थिक प्रकृति का हो। दो जुड़ी हुई आपराधिक अपीलों को स्वीकार करते हुए जस्टिस संतोष राय की बेंच ने सोमवार को आरोपी (सौरभ पाल सिंह) को आईपीसी की धाराओं 376, 420, 406, 504 और 506, और एस सी / एसटी (अत्याचार निवारण) एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत सभी आरोपों से मुक्त किया।
इस प्रकार कोर्ट ने प्रयागराज के स्पेशल जज (एससी/एसटी एक्ट के उन आदेशों को रद्द किया, जिनमें उसकी डिस्चार्ज अर्ज़ी (आरोपों से मुक्ति की अर्ज़ी) को खारिज कर दिया गया था और उसके खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय किए गए। केस की पृष्ठभूमि अक्टूबर 2020 में शिकायतकर्ता इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रही अनुसूचित जाति की महिला है, उसने एफआईआर दर्ज कराई। उसने आरोप लगाया कि आरोपी ने उसके साथ करीबी संबंध बनाए, उससे शादी करने का वादा किया और उस झूठे भरोसे पर लंबे समय तक उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने रेस्टोरेंट का बिज़नेस शुरू करने के बहाने उसका एटीएम कार्ड, स्कॉलरशिप का पैसा, गहने और 15,00,000 रुपये ले लिए। उसने आगे दावा किया कि बिज़नेस स्थापित होने के बाद उसने उससे शादी करने से इनकार कर दिया, बातचीत बंद कर दी और उसकी पत्नी व परिवार के सदस्यों ने उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी और जानबूझकर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करके उसका अपमान किया। यह भी आरोप लगाया गया कि हालांकि उसने उसे 5-5 लाख रुपये के दो चेक दिए, लेकिन वे बाउंस हो गए।
चार्जशीट दाखिल होने के बाद आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष दंप्रसं की धारा 227 के तहत डिस्चार्ज की अर्ज़ी दाखिल की; हालांकि, उसे खारिज कर दिया गया। इसलिए उसने हाईकोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, भले ही उसे उसकी वास्तविक स्थिति में और पूरी तरह से स्वीकार कर लिया जाए, तो भी उन अपराधों के ज़रूरी तत्व सामने नहीं आते जिनके लिए आरोप लगाए गए। हाईकोर्ट की टिप्पणियां एफआईआर व दंप्रसं की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज बयानों और अन्य दस्तावेज़ी सबूतों को देखने के बाद हाईकोर्ट को अभियोजन पक्ष के मामले में बड़ी कमियां मिलीं।
बेंच ने गौर किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयान में शिकायतकर्ता ने माना कि उसके और अपीलकर्ता के बीच कोई रोमांटिक रिश्ता नहीं था, लेकिन शारीरिक संबंध बने क्योंकि वे दोस्त/जान-पहचान वाले थे। इसके अलावा, कोर्ट ने देखा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत उसके पहले के बयान से पता चलता है कि शारीरिक संबंध 2014 से थे।
मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने दोहराया कि शादी के झूठे वादे के आधार पर किसी व्यक्ति पर रेप का मुकदमा चलाने के लिए यह साबित होना चाहिए कि वादा करते समय ही वह झूठा था और बुरी नीयत से किया गया।
बेंच ने शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए पैसों से जुड़े आरोपों पर भी बात की और देखा कि महिला ने खुद कहा था कि 15,00,000 रुपये खास तौर पर बिज़नेस चलाने के लिए दिए गए। बेंच ने कहा कि बाद में वादा पूरा न कर पाना किसी सिविल लेन-देन को धोखाधड़ी के आपराधिक अपराध में नहीं बदलता है। कोर्ट ने आगे कहा कि ज़्यादा रकम वाले दो चेक बाउंस होने के बावजूद, शिकायत करने वाली महिला ने न तो एन आई एक्ट की धारा 138 के तहत कोई कार्रवाई शुरू की और न ही किसी सक्षम कोर्ट में पैसे की वसूली के लिए कोई मुकदमा दायर किया गया।
न्यायालय ने यह भी साफ़ किया कि सिर्फ़ इसलिए एससी /एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता कि पीड़ित व्यक्ति अनुसूचित जाति से है। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि अपराध खास तौर पर पीड़ित की जातिगत पहचान के आधार पर किया गया था। कोर्ट को रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे जाति-आधारित मंशा या संबंध का पता चले। इसलिए, यह निष्कर्ष निकालते हुए कि ट्रायल कोर्ट ने डिस्चार्ज एप्लीकेशन को खारिज करते समय बिना न्यायिक दिमाग का सही इस्तेमाल किए यांत्रिक तरीके से काम किया, हाईकोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूत प्रथम दृष्टया मामला बनाने के लिए काफ़ी नहीं थे। याचिकाओं को मंज़ूरी देते हुए कोर्ट ने कहा "इसके विपरीत, रिकॉर्ड से पता चलता है कि विवाद मुख्य रूप से दीवानी और वित्तीय प्रकृति का है और शादी के झूठे वादे के आधार पर बलात्कार के आरोप उपलब्ध सबूतों से प्रथम दृष्टया साबित नहीं होते हैं।"
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पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।
