संत कबीर नगर, 23 अगस्त 2026(सूचना विभाग)।* कृषि विज्ञान केंद्र, संत कबीर नगर द्वारा गाजर घास जागरूकता कार्यक्रम 16 से 22 अगस्त 2026 तक 21वें राष्ट्रीय गाजर घास जागरूकता सप्ताह का आयोजन किया गया। अभियान के समापन अवसर पर 22 अगस्त को कृषि विज्ञान केंद्र पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर इंटर कॉलेज के छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों को गाजर घास के दुष्प्रभाव, नियंत्रण एवं उन्मूलन के प्रति जागरूक किया गया। विद्यार्थियों को गाजर घास के प्रसार को रोकने की शपथ भी दिलाई गई।
*कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. सी.पी.एन., गौतम* ने कहा कि गाजर घास अत्यंत आक्रामक एवं तेजी से फैलने वाला खरपतवार है। विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में तेजी से बढ़ने, फूलने और बीज बनाने की क्षमता के कारण इसका प्रसार लगातार बढ़ रहा है। इससे फसलों की उत्पादकता के साथ पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
*वैज्ञानिक डॉ. देवेश कुमार* ने कहा कि गाजर घास मानव स्वास्थ्य, पशुओं, कृषि फसलों तथा पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है। इसके परागकणों के संपर्क में आने से एलर्जी, त्वचा संबंधी समस्याएं तथा श्वसन संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से अपने घर, विद्यालय और आसपास के क्षेत्रों में गाजर घास की पहचान कर इसके उन्मूलन के लिए लोगों को जागरूक करने की अपील की। कार्यक्रम में विद्यार्थियों को बताया गया कि गाजर घास का पौधा सामान्यतः 3–4 फीट तक लंबा होता है तथा एक पौधा हजारों सूक्ष्म बीज पैदा कर सकता है।
*वैज्ञानिक डॉ. तरुण कुमार* ने बताया कि गाजर घास को फूल आने से पहले उखाड़कर नष्ट करना इसके प्रसार को रोकने का प्रभावी उपाय है। उन्होंने इसके अवशेषों के सुरक्षित प्रबंधन, कम्पोस्ट निर्माण तथा प्राकृतिक खेती में जैविक संसाधनों के उपयोग पर जोर दिया।
*वैज्ञानिक डा दुर्गेश कुमार मौर्य* ने बताया की बीज हवा और पानी के माध्यम से तेजी से फैलते हैं। धान, मक्का, ज्वार, सोयाबीन, मटर, तिल, गन्ना, बाजरा, मूंगफली, सब्जियों एवं उद्यानिकी फसलों में इसका प्रकोप देखा जाता है। कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने गाजर घास के उन्मूलन, पर्यावरण संरक्षण तथा जन-जागरूकता फैलाने का संकल्प लिया। केंद्र की ओर से अपील की गई कि गाजर घास को फूल एवं बीज बनने से पहले उखाड़कर सुरक्षित रूप से नष्ट किया जाए, ताकि इसके प्रसार को प्रभावी ढंग से रोका जा सके।
*वैज्ञानिक डॉ. अभिनव सिंह* ने बताया कि गाजर घास के जैविक नियंत्रण के लिए मैक्सिकन बीटल के संरक्षण एवं संवर्धन को बढ़ावा दिया जा सकता है। उन्होंने इसके उचित प्रबंधन तथा सुरक्षित उपयोग की जानकारी देते हुए बताया कि गाजर घास के अवशेषों को उचित तरीके से कम्पोस्ट में परिवर्तित कर खेत में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ाने में उपयोग किया जा सकता है।
*वैज्ञानिक डॉ. धर्मेंद्र कुमार* ने बताया कि गाजर घास एक अत्यंत हानिकारक एवं आक्रामक खरपतवार है, जो मानव स्वास्थ्य, पशुओं, कृषि फसलों तथा पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
कार्यक्रम के दौरान किसानों, विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को गाजर घास से होने वाले *स्वास्थ्य एवं कृषि संबंधी दुष्प्रभावों, इसकी पहचान तथा सुरक्षित एवं प्रभावी उन्मूलन के तरीकों* के बारे में विस्तार से बताया गया। वैज्ञानिकों ने उपस्थित लोगों से अपील की कि वे अपने खेतों, विद्यालय परिसरों, सड़क किनारों एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों पर गाजर घास के प्रसार को रोकने के लिए सामूहिक प्रयास करें तथा इसके उन्मूलन के प्रति अन्य लोगों को भी जागरूक करें। इस अवसर पर उपस्थित किसानों, विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने गाजर घास उन्मूलन अभियान में सक्रिय सहयोग करने का संकल्प लिया।