उत्तर प्रदेश में वायु प्रदूषण पर बड़ा शोध प्रोजेक्ट शुरू, 75 जिलों में होगा अध्ययन
क्लीन एयर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट के तहत 15 संस्थानों को जिम्मेदारी, विश्व बैंक की मदद से लैब और मिनी सुपर साइट स्थापित
बढ़ते श्वसन रोगों पर भी होगी विस्तृत रिसर्च
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बढ़ते वायु प्रदूषण, विशेषकर हवा में कार्बन, भारी धातुओं और पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म कणों की बढ़ती मात्रा को देखते हुए राज्य सरकार ने एक बड़ा शोध एवं नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया है। इसके तहत “उत्तर प्रदेश क्लीन एयर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट” लागू किया गया है, जिसका उद्देश्य प्रदूषण के कारणों, प्रभावों और उनके समाधान का वैज्ञानिक अध्ययन करना है। इस परियोजना का वित्तपोषण विश्व बैंक द्वारा किया जाएगा।
इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत प्रदेश के 75 जिलों में 15 प्रमुख शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थानों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। इनमें डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (आगरा, मथुरा, इटावा), सेंटर फॉर द डेवलपमेंट ऑफ ग्लास इंडस्ट्री (फिरोजाबाद, अलीगढ़), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (अलीगढ़, एटा, हाथरस, कासगंज), महात्मा ज्योतिबा फुले रोहिलखंड विश्वविद्यालय (बरेली), राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज (बिजनौर), मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (गोरखपुर), आईआईटी कानपुर, आईआईटी रुड़की, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय (झांसी), हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी (कानपुर), यूपी प्रदूषण नियंत्रण विभाग (लखनऊ), और अन्य प्रमुख संस्थान शामिल हैं। इन संस्थानों को अलग-अलग जिलों में प्रदूषण पर शोध की जिम्मेदारी दी गई है।
ये खबर भी पढ़े : अवकाश पर ड्यूटी कराना अनुचित, उत्पीड़नात्मक कार्यवाहियाँ वापस ली जाएँ: संघर्ष समितिपरियोजना के तहत आगरा, अलीगढ़, गोरखपुर और झांसी में चार मिनी सुपर साइट स्थापित की जाएंगी, जहां वायु गुणवत्ता की विस्तृत निगरानी की जाएगी। इसके अलावा प्रत्येक क्षेत्र में आधुनिक लैब स्थापित की जाएगी, जिनमें कार्बन, पीएम 2.5 और अन्य प्रदूषकों के नमूनों की जांच की जाएगी। इस कार्य के लिए विश्व बैंक द्वारा लैब के लिए 27.9 लाख रुपये तथा मिनी सुपर साइट के लिए 5.20 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता दी जाएगी।
आईआईटी कानपुर इस परियोजना के लिए पर्यावरण संबंधी नए पाठ्यक्रम तैयार करेगा, जिससे छात्रों और शोधकर्ताओं को आधुनिक तकनीकी ज्ञान प्राप्त हो सके। विशेषज्ञ प्रदूषित क्षेत्रों को चिन्हित कर वहां निगरानी उपकरण लगाएंगे और प्रतिवर्ष कम से कम 104 नमूनों की जांच की जाएगी। कुल मिलाकर 525 से अधिक नमूनों का विश्लेषण कर उनकी रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसके आधार पर राज्य सरकार आगे की नीतियां और दिशा-निर्देश तय करेगी।
एसएन मेडिकल कॉलेज के वक्ष एवं क्षय रोग विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार प्रदूषण में लगातार वृद्धि के कारण दमा, सांस संबंधी रोग, टीबी और फेफड़ों के कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। हवा में मौजूद आर्सेनिक, लेड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसे तत्वों का लंबे समय तक संपर्क स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है। ओपीडी में हर महीने लगभग 7500 मरीज आ रहे हैं और हर साल 10 से 12 प्रतिशत तक श्वसन रोगों के मरीज बढ़ रहे हैं। चिंता की बात यह है कि अब युवा वर्ग भी तेजी से इसकी चपेट में आ रहा है।
आगरा में प्रदूषण की स्थिति विशेष रूप से गंभीर है, जहां बीते वर्षों में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 486 तक पहुंच चुका है, जबकि सामान्य स्तर 50 माना जाता है। इस प्रकार यह परियोजना न केवल वैज्ञानिक अध्ययन को बढ़ावा देगी, बल्कि भविष्य में प्रदूषण नियंत्रण और जनस्वास्थ्य सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद है।
संबंधित खबरें
लेखक के बारे में
पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।
