विकास से आगे—कर्तव्य, क्षमता, आत्मनिर्भरता और सभ्यतागत चेतना का भारत
अंबेडकरनगर । 15 अगस्त 2026 भारत की स्वतंत्रता यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह केवल उपलब्धियों के मूल्यांकन का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का क्षण है।भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?मेरा उत्तर स्पष्ट है।भारत को केवल सरकार नहीं, भारत का प्रत्येक नागरिक विकसित करेगा।
मेरे लिए विकसित भारत का अर्थ केवल ऊँची जीडीपी, अधिक आय, चौड़ी सड़कें, ऊँची इमारतें अथवा अत्याधुनिक तकनीक नहीं है। विकसित भारत वह है जहाँ प्रत्येक नागरिक अपनी प्रतिभा, श्रम और समय को राष्ट्र के लिए उपयोगी बनाए; संस्थाएँ अपने दायित्व का ईमानदारी से निर्वहन करें। शासन उत्तरदायी और न्यायपूर्ण हो; विज्ञान मानव कल्याण का साधन बने तथा आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय संतुलन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी सुदृढ़ हों।
1947 में भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की, किंतु स्वतंत्रता आंदोलन के महानायकों के लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन की समाप्ति नहीं था। इसका उद्देश्य ऐसे समाज का निर्माण था जिसमें व्यक्ति सम्मानपूर्वक जीवन जी सके, अपने निर्णय स्वयं ले सके और राष्ट्र-निर्माण में सहभागी बने।
महात्मा गांधी जी के लिए इसका सर्वोच्च रूप स्वराज था। हिन्द स्वराज में उन्होंने स्वराज को केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि अपने ऊपर स्वयं का शासन माना अर्थात व्यक्ति अपनी इच्छाओं, लोभ, भय और स्वार्थ पर नियंत्रण रखे तथा अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी स्वीकार करे।
आज के संदर्भ में स्वराज का अर्थ है।व्यक्ति का आत्म अनुशासन, परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायित्व, आर्थिक आत्मनिर्भरता, संस्थाओं की जवाबदेही तथा राष्ट्रहित को निजी स्वार्थ से ऊपर रखने की क्षमता।
स्वराज से आत्मनिर्भरता और आत्मनिर्भरता से राष्ट्रीय क्षमता की यात्रा ही विकसित भारत की यात्रा है।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने इंडिया 2020 में ऐसे भारत की कल्पना की थी जो विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा और राष्ट्रीय सुरक्षा में सक्षम हो। उनके लिए भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसके युवा और उनके प्रज्वलित मस्तिष्क थे।
उनकी दृष्टि में विकसित भारत के प्रमुख आधार थे।
आधुनिक एवं उत्पादक कृषि।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य।
विश्वसनीय ऊर्जा एवं आधारभूत संरचना।
विज्ञान, तकनीक और नवाचार।रोजगार एवं उद्यमिता। ग्रामीण-शहरी दूरी में कमी। पारदर्शी और उत्तरदायी शासन। गरीबी और अशिक्षा का उन्मूलन।
रणनीतिक आत्मनिर्भरता और
राष्ट्रीय चरित्र एवं उत्कृष्ट कार्य-संस्कृति।
उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है।विकसित भारत कोई सरकारी योजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मिशन है।
स्वतंत्रता के समय भारत के सामने गरीबी, खाद्य संकट, अशिक्षा, कमजोर औद्योगिक आधार और सीमित अवसंरचना जैसी गंभीर चुनौतियाँ थीं। इसके बावजूद देश ने नियोजित विकास, पंचवर्षीय योजनाओं, सार्वजनिक क्षेत्र, आईआईटी, एम्स, वैज्ञानिक एवं अनुसंधान संस्थानों, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष कार्यक्रम, सिंचाई और हरित क्रांति के माध्यम से मजबूत आधार तैयार किया।
1991 के आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए खोला। इसके बाद सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार, सेवा क्षेत्र और डिजिटल क्रांति ने भारत को नई आर्थिक शक्ति प्रदान की।
यह यात्रा किसी एक सरकार या पीढ़ी की उपलब्धि नहीं है। यह किसानों, श्रमिकों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों, चिकित्सकों, उद्यमियों, सैनिकों, प्रशासनिक तंत्र और करोड़ों नागरिकों के सामूहिक परिश्रम का परिणाम है।
अब लक्ष्य केवल विकास नहीं, विकसित भारत है।
भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। किंतु जनसांख्यिकीय लाभांश तभी आर्थिक शक्ति बनेगा जब युवा शिक्षित, स्वस्थ, कुशल और उत्पादक हों।
हमारी दिशा होनी चाहिए,
जनसांख्यिकी ,कौशल रोजगार, उत्पादकता, नवाचार समृद्धि।
भारत को केवल नौकरी खोजने वाली युवा शक्ति नहीं, बल्कि रोजगार सृजित करने वाली, नवाचार करने वाली और विश्वस्तरीय उत्पाद एवं सेवाएँ देने वाली युवा शक्ति तैयार करनी होगी।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, अर्धचालक, जैव-प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष विज्ञान, क्वांटम तकनीक, साइबर सुरक्षा और उन्नत विनिर्माण को शिक्षा और कौशल विकास से जोड़ना होगा।
कृषि का भविष्य केवल अधिक उत्पादन में नहीं, बल्कि अधिक मूल्यवर्धन में है।
खेत , प्रसंस्करण ,ब्रांड , वैश्विक बाजार
मिलेट्स, मसाले, फल, फूल, औषधीय पौधे और पारंपरिक खाद्य उत्पाद विश्व बाजार में भारतीय पहचान बना सकते हैं। इसके लिए कृषि अनुसंधान, जल प्रबंधन, सटीक कृषि, ड्रोन, शीत-श्रृंखला, खाद्य प्रसंस्करण, किसान उत्पादक संगठन और कृषि निर्यात को एकीकृत करना होगा।
भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का विश्वसनीय केंद्र बनना होगा। केवल संयोजन पर्याप्त नहीं है। हमें अनुसंधान, डिजाइन, घटक निर्माण, बौद्धिक संपदा, उत्पादन, परीक्षण और वैश्विक ब्रांड पूरी मूल्य शृंखला में नेतृत्व प्राप्त करना होगा।
अर्धचालक, इलेक्ट्रॉनिक्स, औषधि, वाहन, रक्षा उपकरण, नवीकरणीय ऊर्जा, वस्त्र, रसायन, मशीनरी और उन्नत सामग्री इसके प्रमुख क्षेत्र होंगे।
सूचना प्रौद्योगिकी से आगे बढ़कर भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वित्तीय सेवाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा, परामर्श, विधिक सेवाओं, पर्यटन, डिजाइन, मीडिया, एनीमेशन और डिजिटल सामग्री में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करना होगा।
भारत की प्रतिभा को केवल भारत के लिए नहीं, विश्व के लिए समाधान तैयार करना होगा।
ज्ञान, अनुसंधान और अंतरिक्ष।
21वीं सदी में वास्तविक शक्ति ज्ञान और नवाचार में निहित होगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी, रोबोटिक्स, उन्नत सामग्री, परमाणु एवं स्वच्छ ऊर्जा और अंतरिक्ष विज्ञान में भारत को तकनीक का उपभोक्ता नहीं, सृजक बनना होगा।
विश्वविद्यालय, प्रयोगशाला, उद्योग और सरकार के बीच की दूरी कम करनी होगी। अनुसंधान को केवल प्रकाशन तक नहीं, बल्कि प्रयोगशाला से उत्पाद और उत्पाद से बाजार तक पहुँचाना होगा।
अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की उपलब्धियाँ इसकी क्षमता का प्रमाण हैं। भविष्य में अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, उपग्रह सेवाएँ, पृथ्वी अवलोकन, संचार, आपदा प्रबंधन, कृषि, जलवायु निगरानी और निजी अंतरिक्ष उद्योग को व्यापक आर्थिक शक्ति में बदलना होगा।
विकसित भारत को ऊर्जा-सुरक्षित भारत भी होना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण, विद्युत गतिशीलता और स्मार्ट ग्रिड भविष्य की आधारशिलाएँ हैं।
किन्तु विकास की कीमत प्रकृति नहीं हो सकती।
जल, जंगल, जमीन, जलवायु और जीवन की गुणवत्ता—इन पाँचों का संरक्षण विकास की अनिवार्य शर्त है।
हमें सतत, संतुलित और जलवायु-सक्षम विकास की ओर बढ़ना होगा। भविष्य के शहर केवल बड़े नहीं, बल्कि स्वच्छ, सुरक्षित, सुगम और रहने योग्य होने चाहिए।
भारत ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के माध्यम से विश्व को एक विशिष्ट मॉडल दिया है। अगला चरण डिजिटल शासन से बुद्धिमान शासन का होना चाहिए।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भू-स्थानिक तकनीक का उपयोग प्रशासन, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक सेवाओं में किया जा सकता है।
आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होना नहीं है। इसका अर्थ है—दुनिया से सीखना, दुनिया से व्यापार करना, दुनिया को समाधान देना और अपनी मूलभूत क्षमताओं के लिए असहाय निर्भर न रहना।
भारत की शक्ति केवल अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता में नहीं है। योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन, साहित्य, कला, संगीत, सिनेमा, हस्तशिल्प, खान-पान और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की दृष्टि हमारी विशिष्ट सभ्यतागत शक्ति हैं।
भारत का वैश्विक नेतृत्व प्रभुत्व का नहीं, सहयोग और सह-अस्तित्व का नेतृत्व होना चाहिए। वैश्विक दक्षिण, जलवायु न्याय, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, आपदा-प्रबंधन और शांति के क्षेत्र में भारत विश्व के साथ अपने अनुभव साझा कर सकता है।
शायद भारत की सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि कार्य-संस्कृति है।
यदि करोड़ों लोग अपने आज के कार्य को कल पर टालते रहें, तो यह व्यक्तिगत विलंब नहीं, राष्ट्रीय उत्पादकता की क्षति बन जाता है।
इसलिए विकसित भारत की शुरुआत एक छोटे संकल्प से हो सकती है।
जो कार्य आज मेरे दायित्व में है, उसे मैं आज ही, पूरी निष्ठा और उत्कृष्टता के साथ पूरा करूँगा।
किसी कार्य को छोटा या बड़ा नहीं कहा जा सकता।
किसान का समय पर खेत तैयार करना, शिक्षक का ईमानदारी से पढ़ाना, चिकित्सक की सेवा, श्रमिक का परिश्रम, वैज्ञानिक का अनुसंधान, उद्यमी का रोजगार सृजन और अधिकारी का समयबद्ध निर्णय—ये सभी राष्ट्र-निर्माण हैं।
राष्ट्र की उत्पादकता केवल प्रत्यक्ष आर्थिक योगदान से नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों के अप्रत्यक्ष योगदान से भी निर्मित होती है।
विकास और अनुशासन एक-दूसरे के पूरक हैं।
स्वच्छ शहर बनाना विकास है, लेकिन नागरिक का कचरा न फैलाना भी विकास है।
डिजिटल शासन बनाना विकास है, लेकिन सही सूचना देना भी नागरिक दायित्व है।
सरकार को जवाबदेह बनाना आवश्यक है, लेकिन नागरिक का अपना कर्तव्य निभाना भी उतना ही आवश्यक है।
2047 तक विकसित भारत के लिए हमारी प्राथमिकताएँ स्पष्ट होनी चाहिए।
मानव पूंजी शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और कौशल।
उत्पादक रोजगार हर सक्षम व्यक्ति के लिए सार्थक कार्य।
विनिर्माण वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में नेतृत्व।
कृषि खेत से वैश्विक बाजार तक। अनुसंधान प्रयोगशाला से बाजार तक।
ऊर्जा सुरक्षित, सुलभ और स्वच्छ ऊर्जा।
अवसंरचना सुदृढ़, समेकित और भविष्य-सक्षम व्यवस्था।
सुशासन उत्तरदायी, पारदर्शी और प्रभावी संस्थाएँ।
पर्यावरण सतत और जलवायु-सक्षम विकास।
नागरिक आचरण अनुशासन, कर्तव्य, निष्ठा और जनभागीदारी।
आठ दशकों की स्वतंत्रता ने भारत को मजबूत आधार दिया है। अब आने वाले दो दशक यह निर्धारित करेंगे कि भारत केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था बनेगा या सक्षम, अनुशासित, न्यायपूर्ण, आत्मनिर्भर और विश्व-प्रेरक राष्ट्र भी बनेगा।
मेरे लिए विकसित भारत का प्रश्न अंततः सरकार से अधिक व्यक्ति का प्रश्न है।
यदि शिक्षक अपने विद्यार्थियों का भविष्य बनाने का संकल्प ले, किसान उत्पादकता बढ़ाने का, वैज्ञानिक विश्वस्तरीय समाधान देने का, उद्योगपति गुणवत्ता और रोजगार का, अधिकारी निष्पक्ष एवं समयबद्ध निर्णय का और युवा कौशल एवं नवाचार का—तो विकसित भारत कोई दूर का स्वप्न नहीं रहेगा।वह हमारे व्यवहार में दिखाई देने लगेगा।
भारत को विकसित होने के लिए 2047 तक प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। 2047 को भारत की विकसित चेतना की औपचारिक घोषणा बनाना चाहिए।
क्योंकि राष्ट्रों का भविष्य केवल योजनाओं से नहीं बनता वह करोड़ों मनुष्यों की दैनिक आदतों, श्रम, अनुशासन और कर्तव्य-बोध से बनता है।
मेरा भारत विकसित भारत।
मेरा दायित्व विकसित भारत।
मेरा संकल्प विकसित भारत।
डॉ. सदानन्द गुप्ता
अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व), वाराणसी
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लेखक के बारे में
पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले शिशिर पटेल वर्तमान में ‘तरुणमित्र’ में पोर्टल इंचार्ज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘स्वतंत्र भारत’ से की और इसके बाद हिंदुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में ब्यूरो चीफ के रूप में काम किया। उत्तर प्रदेश में आधारित रहते हुए उन्हें समाचार संचालन, संपादन और डिजिटल मैनेजमेंट का व्यापक अनुभव है।
