परिवेदना या औपचारिकता? स्थानांतरण विवाद में निष्पक्ष न्याय पर उठे गंभीर सवाल
प्रकाश चन्द्र शर्मा
'न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।' लोकतांत्रिक व्यवस्था की यह कसौटी तब धुंधली पड़ जाती है, जब शिकायतों की सुनवाई उसी तंत्र के हाथों सौंप दी जाए, जिसके निर्णय स्वयं विवादों के घेरे में हों। राजस्थान शिक्षा विभाग में हाल ही में हुए स्थानांतरण और उनके बाद गठित परिवेदना समितियों ने प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर ऐसा ही प्रश्न खड़ा कर दिया है। यह विवाद केवल तबादलों का नहीं बल्कि उस भरोसे का है जिस पर पूरी प्रशासनिक व्यवस्था टिकी होती है।
स्थानांतरण किसी कर्मचारी के लिए महज़ कार्यालय बदलने का आदेश नहीं होता। यह उसके परिवार की दिनचर्या, बच्चों की पढ़ाई, वृद्ध माता-पिता की देखभाल और सामाजिक जीवन से जुड़ा संवेदनशील निर्णय होता है। इसलिए अपेक्षा रहती है कि पूरी प्रक्रिया शीशे की तरह पारदर्शी, नियमों के अनुरूप और न्यायपूर्ण हो। किंतु इस बार जिस प्रकार स्थानांतरण आदेश जारी हुए, उसने कई कर्मचारियों के मन में यह धारणा पैदा कर दी कि कहीं नियमों की पतवार छोड़ प्रशासनिक विवेक की नाव तो नहीं चला दी गई।
ये खबर भी पढ़े : यूपी एसटीएफ का बड़ा एक्शन: 171 दुर्लभ कछुओं के साथ अंतरराष्ट्रीय तस्कर गिरफ्तार, चीन तक फैला था नेटवर्ककई मामलों में वर्षों से चयन प्रक्रिया के माध्यम से अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में कार्यरत प्रधानाचार्यों और शिक्षकों को हटाकर अन्य कार्मिकों को पदस्थापित किए जाने पर भी सवाल उठे। इससे यह संदेश गया कि स्थापित प्रक्रिया की अपेक्षा प्रशासनिक निर्णय अधिक प्रभावी साबित हुए। जब नियमों की चौखट पर अपवादों की दस्तक बढ़ने लगे, तब स्वाभाविक रूप से व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगने लगते हैं।
सबसे अधिक चिंता उन कर्मचारियों को लेकर व्यक्त की जा रही है जो सेवा नियमों के अनुसार विशेष संरक्षण के पात्र हैं। विधवा, परित्यक्ता, तलाकशुदा, एकल महिला तथा गंभीर बीमारियों से जूझ रहे अनेक कर्मचारियों के दूरस्थ स्थानों पर स्थानांतरण की शिकायतें सामने आईं। यदि संवेदनशील वर्गों के लिए बनाए गए प्रावधान व्यवहार में प्रभावी न दिखें, तो वे केवल सरकारी पुस्तकों के पन्नों तक सीमित होकर रह जाते हैं। जैसा कि कहा जाता है, 'हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और।'
विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष परिवेदनाओं के निस्तारण को लेकर सामने आया। हजारों शिकायतों की सुनवाई के लिए जिन समितियों का गठन किया गया, उनमें उन्हीं स्तर के अधिकारियों को शामिल किया गया जिनके स्तर पर मूल स्थानांतरण आदेश जारी हुए थे। राजस्थान की लोकभाषा का प्रसिद्ध मुहावरा 'दूध की रखवाली पर बिल्ली को बैठा देना' इस स्थिति को सहज ही अभिव्यक्त करता है। जब निर्णय की समीक्षा उसी व्यवस्था के भीतर सीमित हो जाए, तो निष्पक्षता का विश्वास स्वतः डगमगाने लगता है।
यदि समिति किसी परिवेदना को स्वीकार करती है तो यह संकेत होगा कि मूल निर्णय में त्रुटि थी और यदि सभी शिकायतें अस्वीकार होती हैं तो कर्मचारियों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कहीं सुनवाई केवल औपचारिकता भर तो नहीं थी। दोनों ही परिस्थितियां व्यवस्था की साख को प्रभावित करती हैं। आखिर भारतीय न्याय व्यवस्था का यह स्वर्णिम सिद्धांत यूं ही नहीं बना कि कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता। यही प्राकृतिक न्याय की आत्मा है और यही लोकतांत्रिक प्रशासन की रीढ़ भी।
सरकार का उद्देश्य निस्संदेह कर्मचारियों को राहत देना और व्यवस्था में विश्वास बनाए रखना है। किंतु विश्वास आदेशों से नहीं बल्कि निष्पक्ष प्रक्रियाओं से जन्म लेता है। आवश्यकता इस बात की है कि स्थानांतरण प्रक्रिया को स्थायी, पारदर्शी और स्पष्ट नीति पर आधारित बनाया जाए। संवेदनशील श्रेणियों के मामलों की पृथक समीक्षा हो, प्रत्येक निर्णय का कारण अभिलेखों में दर्ज किया जाए तथा परिवेदनाओं की सुनवाई ऐसे स्वतंत्र अधिकारियों द्वारा की जाए जिनका मूल निर्णय से प्रत्यक्ष संबंध न रहा हो। तभी कर्मचारी यह महसूस करेगा कि उसकी बात केवल सुनी ही नहीं गई बल्कि उस पर निष्पक्ष विचार भी हुआ।
अन्यथा यह पूरी कवायद केवल फाइलों के एक मेज़ से दूसरी मेज़ तक पहुँचने की कहानी बनकर रह जाएगी और शिक्षा जगत में यह सवाल गूंजता रहेगा कि न्याय का दीपक जल रहा है या केवल उसकी लौ का भ्रम दिखाया जा रहा है।
समापन की पंक्तियां—
मुंसिफ़ भी वही, मुल्ज़िम भी वही, गवाह भी वही दरबार,
फिर कैसे निकले सच, जब फैसला लिखे खुद सरकार।
दूध की रखवाली बिल्ली करे, न्याय करे दरबार,
फिर मत पूछो क्यों रोता है, शिक्षा जगत लाचार।
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